दादा कान्हा रावत
दादा कान्हा रावत के शहीदी दिवस पर विशेष
– डॉ शिवसिंह रावत*
बलिदान की मिसाल: दादा कान्हा की विरासत
डिजिटल पीढ़ी के लिए दादा कान्हा रावत की शहादत एक सीख
आज की युवा पीढ़ी जब रील्स की दुनिया में खोकर अपनी पहचान की तलाश कर रही है, ट्रेंड्स के पीछे भाग रही है और वर्चुअल दुनिया में लाइक्स व फॉलोअर्स को अपनी सफलता का पैमाना मान रही है, तब इतिहास की गहराइयों से एक आवाज़ उठती है—एक ऐसी आवाज़ जो हमें असली नायकों की ओर लौटने को मजबूर करती है। वह आवाज़ है अमर शहीद दादा कान्हा रावत की, जिनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्र-निर्माण न तो सोशल मीडिया की चमक-दमक से होता है और न ही आभासी दुनिया की भीड़ से, बल्कि दृढ़ चरित्र, अदम्य साहस और गहरी सामाजिक जिम्मेदारी से। यदि कोई समाज अपने उन बलिदानियों को भूल जाए जिन्होंने अपनी जान देकर उसकी आत्मा को बचाया, तो वह समाज धीरे-धीरे अपनी आंतरिक शक्ति खो देता है। दादा कान्हा रावत का जीवन कोई पुरानी कथा मात्र नहीं है; यह आज के समाज के लिए, खासकर युवाओं के लिए, नैतिक दृढ़ता और सिद्धांतों पर अडिग रहने का एक जीवंत उदाहरण है।
सत्रहवीं शताब्दी का उत्तर भारत उस समय गहरी राजनीतिक अस्थिरता और धार्मिक उथल-पुथल से जूझ रहा था। मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के शासन में 1679 में जज़िया कर को फिर से लागू कर दिया गया, जिसने ब्रज, मेवात और आसपास के क्षेत्रों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया। इसी तूफानी दौर में हरियाणा के बहीन गांव (जो आज पलवल जिले में आता है) में 1640 ईस्वी में दादा कान्हा रावत का जन्म हुआ। एक साधारण कृषक परिवार से निकले इस वीर ने कभी कोई राजसिंहासन नहीं संभाला, फिर भी वे जनता के दिलों में राज करते थे। उनकी असली ताकत राजकीय सत्ता में नहीं, बल्कि लोगों के अटूट विश्वास, सामुदायिक एकजुटता और लोक चेतना में निहित थी।
लोक कथाओं और परंपराओं के अनुसार, दादा कान्हा रावत ने जज़िया जैसे अन्यायपूर्ण कर और जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाई। 1669 में जाट नेता गोकुला के विद्रोह के बाद यह क्षेत्रीय तनाव और भी तीव्र हो गया था। ऐसे में उन्होंने खाप पंचायतों और ग्रामीण सभाओं के माध्यम से लोगों को संगठित किया और ग्रामीण स्वाभिमान की रक्षा का पक्का संकल्प लिया। अंततः 1682 में दिल्ली में उनकी शहादत हुई—एक ऐसी शहादत जिसमें न प्रलोभनों ने उन्हें डिगाया, न यातनाओं ने उनका हौसला तोड़ा। उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और अंत तक अडिग रहे।
किसान पृष्ठभूमि से आने वाले दादा कान्हा रावत का संघर्ष केवल धार्मिक पहचान की रक्षा तक सीमित नहीं था; यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गरिमा, आत्मसम्मान और आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई भी थी। आज जब हमारे किसान जल संकट, बाजार की अनिश्चितता, भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाने जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब उनका जीवन हमें संगठित होकर खड़े होने, आत्मनिर्भर बनने और सामुदायिक नेतृत्व की प्रेरणा देता है।
उनका समय वही था जब गुरु तेग बहादुर जी ने धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। दादा कान्हा रावत उसी महान सामाजिक जागरण की एक मजबूत कड़ी थे, जिन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर उस चेतना को और मजबूत किया।
आज के युवाओं के सामने उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट और गहरा है—बिना साहस के कोई परिवर्तन संभव नहीं, बिना संगठन के कोई शक्ति नहीं टिक सकती, और बिना आत्मसम्मान के जीवन अधूरा है। डिजिटल दुनिया में सक्रिय रहना अच्छी बात है, लेकिन उससे कहीं अधिक ज़रूरी है वास्तविक सामाजिक उत्तरदायित्व निभाना। यदि युवा शिक्षा, नैतिक मूल्यों और समाज सेवा को जीवन का आधार बनाएं, तो यही दादा कान्हा रावत के प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जब आज के दौर में छवि और दिखावा को चरित्र से ऊपर रखा जा रहा है, तब दादा कान्हा रावत की अमर विरासत हमें याद दिलाती है कि असली पहचान साहस, सामाजिक समरसता और जिम्मेदारी से ही निर्मित होती है। यदि नई पीढ़ी इन मूल्यों को अपने जीवन में उतार ले, तो उनकी शहादत महज इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं रहेगी—वह भारत के उज्ज्वल भविष्य की नैतिक दिशा बन जाएगी।
दादा कान्हा रावत की पावन स्मृति को जीवित रखने के लिए उनके पैतृक गांव बहीन में स्थित गौशाला में हर साल दो दिवसीय भव्य आयोजन होता है। इस वर्ष यह कार्यक्रम 28 फरवरी और 1 मार्च को हो रहा है, जहां पूरा समाज उनके अद्भुत बलिदान को नमन करता है और नई पीढ़ी को उनके आदर्शों से प्रेरित होने का संकल्प लेता है।
*लेखक सिंचाई विभाग हरियाणा के पूर्व अधीक्षण अभियंता हैं और वाक फार यमुना अभियान के संयोजक हैं।)
