कॉप-30 सम्मेलन में भारत का पक्ष रखते केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव
– ज्ञानेन्द्र रावत*
बेलेम पैकेज: आधी जीत, पूरी चुनौती बरकरार
ब्राजील के बेलेम में अमेजन के किनारे दो हफ्ते तक चले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप-30 का समापन हो चुका है। जिस बात की आशंका थी, ठीक वही हुआ। अंतिम घंटों में एक बार फिर वही पुराना जुमला दोहराया गया कि “आने वाले समय में सभी देश मिल-जुल कर काम करेंगे”। पिछले तीस वर्षों के कॉप सम्मेलनों का इतिहास गवाह है कि यह जुमला जितनी बार बोला गया, उतनी ही बार खोखला साबित हुआ। खास तौर पर जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का प्रस्ताव पहले ड्राफ्ट में स्पष्ट रूप से मौजूद था, लेकिन आखिरी दिन जिस तरह की खींचतान और आपाधापी हुई, उससे वह संशोधित ड्राफ्ट से पूरी तरह गायब हो गया। इस एक बदलाव ने साफ कर दिया कि कोयला, तेल और गैस का मुद्दा अभी कई सालों तक अनसुलझा रहेगा। 11 नवम्बर को जब सम्मेलन शुरू हुआ था, तब थोड़ी-बहुत उम्मीद बंधी थी कि इस बार दुनिया के 194 देश ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कोई ठोस और बाध्यकारी नतीजे पर पहुँच जाएँगे। लेकिन जिस धीमी रफ्तार से वार्ताएँ चलीं और जिस रवैये का प्रदर्शन देशों ने किया, अंत में सम्मेलन ठीक उसी मुकाम पर पहुँचा जहाँ पिछले सम्मेलन पहुँचते रहे हैं—यानी “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” वाली कहावत फिर चरितार्थ हो गई।
फिर भी, इस सम्मेलन को पूरी तरह नाकाम या निरर्थक कहना सरासर अन्याय होगा। क्योंकि 194 देशों ने अमेरिका की गैर-मौजूदगी, तमाम तरह के मतभेदों-तनावों और पुरानी जिदों के बावजूद एक ऐसे व्यापक पैकेज पर सहमति जता दी, जिसे “बेलेम पॉलिटिकल पैकेज” की संज्ञा दी जा रही है। इस पैकेज की सबसे बड़ी खूबी यह है कि पहली बार इतनी स्पष्टता से स्वीकार किया गया कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण का मसला नहीं रहा, न ही सिर्फ नैतिकता का सवाल रह गया है, बल्कि यह आर्थिक सुरक्षा, रोजगार, व्यापार और विकास का भी सवाल बन चुका है। यही वह मूल कारण रहा जिसकी वजह से इस बार अप्रत्याशित रूप से एक नया सहयोगात्मक और बहुपक्षीय रवैया उभरा। बड़े देश हों या छोटे, विकसित हों या विकासशील, सभी एक मंच पर बराबरी के साथ बैठे और कम से कम जलवायु के इस एक मुद्दे पर एकमत दिखाई दिए। यह दृश्य अपने आप में अभूतपूर्व था और इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं और यह कटु सत्य भी है कि आज पूरी दुनिया भीषण और गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। फिर भी अधिकांश देश वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और आदर्श रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करने में उदासीन बने हुए हैं। यह विडंबना ही कही जाएगी। कार्बन उत्सर्जन और तापमान दिनों-दिन तेजी से बढ़ रहे हैं और मानव अस्तित्व के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण विकसित देशों का अपनी प्रतिबद्धताओं पर खरा न उतरना है। वे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के वायदों को पूरा नहीं कर पा रहे। यही हमारे पर्यावरण, वनों और जलवायु के लिए भीषण खतरा है और मानव अस्तित्व की रक्षा के लिए भीषण चुनौती बनकर सामने खड़ी हो गई है। होना तो यह चाहिए था कि विकसित देश निर्धारित समय से पहले ही नेट जीरो लक्ष्य हासिल कर लेते, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन इन्हीं देशों ने किया है। अतिरिक्त जिम्मेदारी भी इन्हें ही उठानी चाहिए थी।
सम्मेलन पूरे समय तीन मूल सवालों के इर्द-गिर्द घूमता रहा: क्लाइमेट एक्शन को कैसे आगे बढ़ाया जाए, तकनीक और वित्तीय सहायता उन देशों तक कैसे पहुँचाई जाए जो सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, और जलवायु कार्रवाई को समग्र रूप से कैसे लागू किया जाए। इन सबके बीच यह बात भी स्वीकार की गई कि विकासशील देशों के हितों को प्राथमिकता देना समय की मांग है, क्योंकि जलवायु संकट में उनका योगदान नगण्य या लगभग शून्य है, फिर भी वे इसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहे हैं। इसी संदर्भ में सबसे सराहनीय फैसला यह रहा कि गरीब और प्रभावित देशों के लिए अनुकूलन फंड को 2035 तक कम से कम तीन गुना करने पर सर्वसम्मति बनी। अमीर देशों से अपील की गई कि वे गर्म होती दुनिया में ढलने के लिए दी जाने वाली राशि को तीन गुना कर दें, क्योंकि समुद्र का बढ़ता जलस्तर, भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और तूफान से निपटने के लिए इन देशों को तुरंत धन की जरूरत है। यह एकता दिखाने की कोशिश तो थी, पर अमीर और विकासशील देशों के बीच तथा तेल-गैस-कोयला उत्पादक देशों के बीच पुरानी सोच फिर सामने आ गई और वे अपने रवैये से टस से मस नहीं हुए। जंगलों की सुरक्षा का मुद्दा भी आम सहमति न बन पाने की वजह से लटका ही रह गया।
भारत ने अपना पक्ष बुलंद और स्पष्ट रखा। उसका दृढ़ मत यही रहा कि विकसित देशों को तय समय से पहले नेट जीरो तक पहुँचना चाहिए और अतिरिक्त जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी चाहिए। भारत ने फिर दोहराया कि वह विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ-साथ लेकर चल रहा है और 2070 से पहले ही नेट जीरो हासिल कर लेगा। उसने सम्मेलन को यह भी आश्वासन दिया कि 2035 तक संशोधित एनडीसी समय पर घोषित कर देगा। यह बात अलग है कि भारत में रिकॉर्ड गर्मी के कारण बिजली की मांग बेतहाशा बढ़ी और कोयले पर निर्भरता भी बढ़ी, पर समय से पहले आए मानसून और नवीकरणीय ऊर्जा के तेज विस्तार ने कोयले की खपत को कुछ हद तक नियंत्रित रखा—यह संतोष और राहत की बात है।
जीवाश्म ईंधन का मसला छोड़ दें तो हकीकत यही है कि जलवायु संकट बढ़ाने में कोयला, गैस और तेल अभी भी सबसे बड़े खलनायक हैं। उम्मीद थी कि इस बार जीवाश्म ईंधन की मजबूत लॉबी फेज-आउट के रोडमैप में अड़ंगा नहीं लगा पाएगी, पर वह अपने मकसद में कामयाब रही और मुद्दा लटका रह गया। फिर भी कुल मिलाकर सम्मेलन का निष्कर्ष प्रेरणादायक है। “ग्लोबल इम्प्लीमेंटेशन एक्सिलरेटर” की शुरुआत एक अहम कदम है, जिसके तहत अगले दो साल में देशों की मौजूदा जलवायु योजनाओं और 1.5 डिग्री लक्ष्य के बीच के अंतर को तेजी से पाटने का फास्ट ट्रैक शुरू होगा। दूसरा सराहनीय प्रयास “जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म” से जुड़ा है। बेलेम से यह साफ संकेत मिला कि दुनिया की ऊर्जा की कहानी अब पहले जैसी नहीं रहेगी, वह बदल रही है। दक्षिण कोरिया का ऐलान कि वह कोयले से बहुत जल्द बाहर निकलेगा, दुनिया के लिए अच्छा संकेत है।
बेलेम से निकली हवा ने यह साफ कर दिया कि दुनिया भले पहले से कहीं ज्यादा विभाजित और ध्रुवीकृत हो, लेकिन जलवायु कार्रवाई पर बनी सहमति यह संकेत देती है कि साझा संकट साझा समाधान मांगता है। जीवाश्म ईंधन का सवाल अभी लटका है, जंगलों की सुरक्षा पर सहमति नहीं बनी, पर साझा संकट ने साझा समाधान की गुंजाइश को फिर से जिंदा कर दिया है। अभी बहुत कुछ बाकी है, बहुत कुछ करना है, पर कम से कम रास्ता अब पहले से थोड़ा साफ और उम्मीद भरा दिखने लगा है।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
