लेह: छो (झील), जूरा (नाला) और जिंग (तालाब) – ये जल स्रोत नदियों की जननी माने जाते हैं। हर नदी या तो पहाड़ से निकलती है या झील से, और नीचे की ओर बहती है। छो यानी झील प्रकृति द्वारा निर्मित होती है, जहाँ ऊपर का पानी स्वाभाविक रूप से एकत्रित होता है। पहाड़ों में इसे ‘छो’ कहा जाता है। जिंग, जिसे तालाब कहा जाता है, नदियों को पोषण देते रहते हैं। जब मानव बस्तियां नदियों से दूर बसने लगीं, तब पानी की आवश्यकता पूरी करने के लिए मैदानों में तालाब और पहाड़ों में जिंग बनाए गए। ये जल स्रोत हर क्षेत्र में अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं, परंतु इनका उद्देश्य एक ही होता है, जल आवश्यकता की पूर्ति।
छो-जूरा-जिंग यात्रा के दौरान हिमालय की वादियों और लेह-लद्दाख की स्थिति को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यहां पहले बहुत कम लोग आते थे, लेकिन पिछले 10 वर्षों में बड़े मैक्रो प्रोजेक्ट्स के कारण बड़ी संख्या में लोग आने लगे हैं। इस बढ़ती आबादी और निर्माण कार्यों के चलते सीमेंट और कंक्रीट का जंगल तेजी से फैल रहा है, जिससे हिमालय पर अत्यधिक बोझ पड़ रहा है। इस दबाव से हिमालय की हरियाली और उससे निकलने वाली जलधाराएं प्रभावित हो रही हैं, जिससे बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं।
लेह-लद्दाख की यात्रा के दौरान वहां आई बाढ़ और विनाश को निकट से देखा गया। गेंगस वैली पहुंचने पर यह अनुभव हुआ कि, यह क्षेत्र जो कभी हरा-भरा था, अब बर्बादी की ओर अग्रसर है। यहां के लोग पहले ‘जिंग यूरा टोपो’ जैसी पारंपरिक जल संरचनाएं बनाते थे, जिनसे पहाड़ों में बाढ़ नहीं आती थी। अब वह हरियाली समाप्त होती जा रही है, और लद्दाख के पहाड़ बिल्कुल नंगे नजर आने लगे हैं। विकास के नाम पर जो निर्माण हो रहा है, उसने इस क्षेत्र को कंक्रीट के जंगल में बदल दिया है।
लद्दाख अब सीमेंट और कंक्रीट से बना एक नया रूप ले चुका है। इस क्षेत्र में इंडस वैली दो प्रमुख घाटियों से मिलकर बनी है गैंग्लेस वैली और फ्यांग वैली। दोनों घाटियों का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक चरित्र है। गैंग्लेस वैली, जो गैंग्लेस गांव की सीमाओं में लगभग 70 वर्ग किलोमीटर में फैली है, वहां जल संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। इस घाटी की आबादी एक समय में हजार से कम थी, लेकिन वर्ष 2000 से 2010 के बीच यह संख्या दोगुनी हो गई। यहां के मूल निवासी अपनी पारंपरिक खेती छोड़कर अन्यत्र चले गए और हाइड्रो पावर परियोजनाओं में कार्यरत बाहरी लोगों और पर्यटकों की संख्या बढ़ती गई।
गैंग्लेस वैली की आबादी लगभग 2 हजार और फ्यांग वैली की आबादी लगभग 3 हजार है। यहां दूर-दूर तक घर फैले हुए हैं। ये दोनों वैली मिलकर संस्कार नदी को जन्म देती हैं, जो आगे चलकर इंडस वैली की उपनदी बनती है। स्थानीय पहाड़ी भाषा में घाटी को “फूदो“ कहा जाता है। ये दोनों घाटियां अत्यंत सुंदर हैं। ग्लेशियर के नीचे से निकलने वाली जलधारा पूरे वर्ष बहती रहती है, लेकिन कुछ धाराएं सूखती जा रही हैं। पानी की कमी वाले चूशल क्षेत्रों में जल संकट को दूर करने के लिए आइस फोम और आइस इस्थूपा जैसी तकनीकों के माध्यम से जल संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, यहां की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों जैसे जुरा, टोपो और जिंग को फिर से विकसित करने की कोशिश बहुत कम हो रही है। सरकार द्वारा बनाए गए डिज़ाइन यहां की सांस्कृतिक आवश्यकताओं से मेल नहीं खाते।
दोनों घाटियों की यात्रा करने पर यह समझ में आता है कि पहले के समय में यहां के लोग अपने पुरखों से सीखकर जीवन जीते थे। उन्हें किसी बाहरी गुरु की आवश्यकता नहीं होती थी। वे अपने पूर्वजों को ही गुरु मानते थे और उन्हीं की परंपराओं को आगे बढ़ाते थे। जल प्रबंधन भी बहुत अच्छा था, और समाज में सेवा भाव प्रबल था। लेकिन आधुनिक शिक्षा ने इस भाव को कमजोर कर दिया है, जिससे लोगों का प्रकृति से जुड़ाव भी कम होता जा रहा है।
पूर्वजों के समय में प्रकृति, पशुपालन और कृषि से जुड़े ज्ञान को बहुत आदर दिया जाता था। आज के समय में यह आदर धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है, और स्थानीय लोग पारंपरिक ज्ञान के स्थान पर आधुनिक जीवन शैली अपनाकर बेहतर भविष्य की तलाश में बाहर की ओर पलायन कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, पहाड़ों की जवानी, किसानी और पानी नीचे मैदानों की ओर बह रहे हैं, जिससे शहरों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है।
लद्दाख बनने से पहले फ्यांग वैली में 500 वर्ष पुरानी एक मोनस्ट्री थी। फ्यांग एक पुराना गांव है जहां वर्तमान में एक विद्यालय है और लगभग 30 लामा रहते हैं। पहले यहां तीर्थ क्षेत्र के रूप में बहुत खेती होती थी, लेकिन अब यह पर्यटक क्षेत्र बन चुका है। यहां के घर अब अतिथि गृह (होमस्टे) बन गए हैं।
फ्यांग गांव के निवासी सोनम गेलसन ने अपने घर में पूर्वजों की कुछ पारंपरिक वस्तुएं जैसे हल, कपड़ा बनाने की तकनीक आदि को संजो कर रखा है। हालांकि अब यह चीजें तीर्थ के भाव से नहीं, बल्कि पर्यटक आकर्षण के रूप में प्रस्तुत की जा रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हिमालय का तीर्थ अब एक पर्यटक स्थल बन गया है। जब गेलसन से पूछा गया कि उन्हें खेती अच्छी लगती है या तीर्थ, तो उन्होंने कहा कि वे अपने पुरखों की सभी चीजों को बचाकर रखना चाहते हैं और उन्हीं से सीखकर आगे बढ़ना चाहते हैं। उन्होंने मिट्टी और पत्थर के पुराने बर्तन दिखाते हुए बताया कि उनके पास के गांव किरकी में मिट्टी के बर्तन बनते थे, तुकतुक में पत्थर के बर्तन बनते थे। याक के बालों से कपड़े बनाए जाते थे और लकड़ी के बर्तनों का उपयोग बीजों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था क्योंकि लकड़ी के बर्तन में बीज खराब नहीं होते। उन्होंने खुलक (सत्तू) के बारे में बताया कि मटर को पीसकर यह बनाया जाता है और इसे चाय में मिलाकर पीया जाता है। चाय की पत्ती डालकर पानी उबालने के बाद उसमें थोड़ा घी और फिर खुलक मिलाया जाता है, जिससे यह स्वादिष्ट बनती है। उनके घर पर बैल, गधा, जोमो और यार्क अभी भी मौजूद हैं। उनके दो बैल हैं जो पर्यटकों के आने के समय तक उनके पास रहते हैं और बाकी समय खुले छोड़े जाते हैं। तीन महीने बाद वे स्वयं लौट आते हैं। उनके खेत में अखरोट, टमाटर, आलू जैसी फसलें होती हैं। वे अपने स्थानीय लोक गीत भी गाते हैं।
हालांकि अब परंपरागत चीजों को केवल दिखाने योग्य बनाकर पर्यटन के दृष्टिकोण से रखा गया है, न कि आस्था या परंपरा के रूप में। पुराने समय में इस गांव में “फासून“ की परंपरा थी, जिसका अर्थ होता है एक-दूसरे की मदद करना। इसी सामूहिक सहयोग से खेती होती थी और साथ मिलकर काम करते हुए बहुत सुंदर गीत गाए जाते थे। फ्यांग टोपो, इंडस नदी की सबसे ऊपरी झील है, जिसे स्थानीय भाषा में “चंगमंचन गुप्पा जिमलो“ कहा जाता है और झील को “छो“ कहा जाता है। सोनम गेलसन ने अपनी बातचीत के माध्यम से इन सब बातों को दिल से साझा किया।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक



