– ज्ञानेन्द्र रावत*
निपाह वायरस: 40–75% संक्रमण दर वाला खामोश खतरा
भारत में निपाह की पुष्टि से कई देशों में अलर्ट
देश में निपाह वायरस ने एक बार फिर दस्तक दे दी है। वर्ष 2026 के शुरुआती दो सप्ताहों में पश्चिम बंगाल के बारासात और कोलकाता में दो स्वास्थ्य कर्मियों के इस घातक वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। इसके बाद राज्य में अब तक कुल पांच मामले सामने आ चुके हैं। संक्रमितों में डॉक्टर और नर्स शामिल हैं। इनमें से एक मरीज की हालत अत्यंत गंभीर है और वह कोमा में चला गया है, जबकि दो मरीज वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं। पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी ने संक्रमण की पुष्टि कर दी है।
संक्रमण की श्रृंखला को रोकने के लिए 10 लोगों को क्वारंटीन किया गया है। बर्दवान और नादिया जिलों में जिन होटलों में ये लोग ठहरे थे और जिन-जिन लोगों के संपर्क में आए थे, उन कुल 120 लोगों को होम क्वारंटीन कर दिया गया है। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों को सतर्कता बरतने के लिए विशेष निर्देश जारी किए हैं और पश्चिम बंगाल में गहन जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। केंद्र सरकार ने इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है। पड़ोसी राज्यों में भी एहतियातन पूरी सतर्कता बरती जा रही है। वहां के स्वास्थ्य मंत्रालयों ने सभी जिला प्रशासन को गाइडलाइन जारी कर दी हैं और सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि इस स्थिति के कारण अन्य राज्यों में दहशत का माहौल है और लोग एक बड़ी महामारी की आशंका से सहमे हुए हैं।
भारत में निपाह वायरस की पुष्टि के बाद पाकिस्तान से लेकर मलेशिया तक हड़कंप मच गया है। दक्षिण एशियाई देशों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। सिंगापुर, हांगकांग, थाईलैंड और मलेशिया सहित कई देशों ने अपने हवाई अड्डों पर तापमान जांच और स्वास्थ्य स्क्रीनिंग जैसे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, ताकि इस घातक वायरस के प्रसार को रोका जा सके। सिंगापुर और हांगकांग में भारत से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डों पर गहन जांच की जा रही है। थाईलैंड में निपाह प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले विमानों के लिए अलग से पार्किंग बे तय किए गए हैं और यात्रियों के लिए स्वास्थ्य घोषणा अनिवार्य कर दी गई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने निपाह वायरस को एक गंभीर बीमारी माना है, क्योंकि यह जानवरों से इंसानों में फैलने वाला संक्रमण है। यह विशेष रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों और सूअर जैसे जानवरों से इंसानों में फैलता है। यह वायरस कोविड की तरह हवा से नहीं फैलता। इसका संक्रमण चमगादड़ों और सूअरों के संपर्क में आने, उनकी लार, मूत्र या मल से दूषित भोजन के सेवन और संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है। नजदीकी संपर्क के जरिये व्यक्ति से व्यक्ति में संक्रमण संभव है।
निपाह वायरस मस्तिष्क और फेफड़ों में सूजन तथा तेज बुखार जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनता है। डब्ल्यूएचओ ने आशंका जताई है कि यह बीमारी महामारी का रूप ले सकती है। इस रोग की संक्रमण दर 40 से 75 प्रतिशत तक बताई गई है। मौसमी संक्रमणों की तुलना में इसकी मृत्युदर कहीं अधिक है। सबसे खतरनाक और चिंताजनक स्थिति यह है कि इस बीमारी से बचाव के लिए फिलहाल कोई टीका उपलब्ध नहीं है और न ही इसका कोई विशेष इलाज मौजूद है।
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गौरतलब है कि निपाह वायरस अपनी उच्च मृत्युदर के कारण वैश्विक स्वास्थ्य के लिए लगातार खतरा बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर अब तक इसके 754 मामले सामने आए हैं, जिनमें 435 लोगों की मौत हो चुकी है। इस खतरनाक वायरस की पहचान सबसे पहले वर्ष 1999 में मलेशिया और सिंगापुर में हुई थी। उस समय सूअर पालने वाले किसानों में यह बीमारी दिमागी बुखार और सांस लेने में परेशानी के रूप में सामने आई थी। इसके बाद दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश, फिलीपींस और कुछ अन्य देशों में भी इसके मामले दर्ज किए गए।
बांग्लादेश में वर्ष 2001 में देश के पश्चिमी भाग मेहरपुर में इसका पहला मामला सामने आया। वर्ष 2004 में वहां सबसे अधिक 67 मामले दर्ज किए गए। तब से हर साल निपाह वायरस के मामले सामने आते रहे हैं। 2001 से 2024 के बीच बांग्लादेश में कुल 342 मामलों में निपाह वायरस से 245 मौतें हुई हैं।
भारत में निपाह वायरस का पहला मामला वर्ष 2001 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में सामने आया था। 2007 से 2021 के बीच देश में कुल 90 मामले दर्ज किए गए। वर्ष 2018, 2019 और 2021 में देश के सबसे दक्षिणी राज्य केरल में भौगोलिक रूप से अलग-अलग स्थानों पर इसके मामले सामने आए। 2018 में केरल में कुल 19 मामले सामने आए, जिनमें 17 घातक सिद्ध हुए। 2023 में सामने आए छह मामलों में दो लोगों की मौत हो गई थी। निपाह वायरस के लिए केरल को हॉटस्पॉट माना जाता है।
निपाह वायरस से संक्रमित व्यक्ति में बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, थकान और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ मामलों में खांसी, सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया जैसे लक्षण भी सामने आते हैं। गंभीर स्थिति में भ्रम, होश में बदलाव, दौरे पड़ना और कोमा की अवस्था भी उत्पन्न हो सकती है। इसमें बिना लक्षण वाले संक्रमण से लेकर गंभीर श्वसन रोग तक की स्थिति देखी जाती है। इसका सबसे खतरनाक असर मस्तिष्क पर पड़ता है, जिसे एन्सेफेलाइटिस कहा जाता है। कुछ मामलों में मैनिन्जाइटिस भी हो सकता है।
चूंकि यह एक अत्यंत घातक जूनोटिक संक्रमण है, इसलिए डब्ल्यूएचओ ने इसे हाई रिस्क पैथोजन करार दिया है। दरअसल, कुछ वायरस अचानक सुर्खियों में आ जाते हैं, लेकिन निपाह वायरस चुपचाप फैलता है। इसकी शुरुआत हल्के बुखार से होती है और कुछ ही दिनों में यह जानलेवा रूप ले सकता है। निपाह वायरस की सबसे बड़ी चिंता इसकी तेजी से फैलने की क्षमता नहीं, बल्कि यह है कि यह कितनी जल्दी जानलेवा साबित हो सकता है। गौरतलब है कि कोरोना की तरह ही इस वायरस का स्रोत चीन को ही बताया जा रहा है।
इस बीमारी के इलाज के लिए फिलहाल कोई विशेष दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इसका उपचार मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर किया जाता है। सबसे पहले बुखार और सांस लेने में आ रही दिक्कत का इलाज किया जाता है। इससे ठीक होने के लंबे समय बाद भी कई लोगों में न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे बार-बार दौरे पड़ना और व्यवहार में बदलाव देखे गए हैं। कुछ मामलों में इसका असर महीनों और वर्षों बाद भी दिखाई देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब इलाज उपलब्ध नहीं है तो बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है। कच्चा खजूर का रस या ऐसे फल जिन पर चमगादड़ के काटने या गंदगी के निशान हों, उनका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। किसी भी फल का उपयोग करने से पहले उसे अच्छी तरह धोना चाहिए और छिलका उतारने के बाद ही खाना चाहिए। बीमार व्यक्ति या जानवर के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से बचना चाहिए। संक्रमित व्यक्ति के करीब बिना सुरक्षा उपायों के नहीं जाना चाहिए और हाथों की सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
सरकार इस दिशा में हरसंभव प्रयास कर रही है ताकि इस वायरस के प्रसार पर तेजी से अंकुश लगाया जा सके। कोरोना जैसी महामारी पर अंकुश भारत सरकार के प्रयासों का जीता-जागता उदाहरण है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार भी समय रहते निपाह वायरस पर काबू पा लिया जाएगा। फिर भी, वर्तमान परिस्थिति में सही जानकारी, सजगता और सावधानी ही इस खतरनाक संक्रमण से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
