— डॉ. राजेन्द्र सिंह*पर्वतों की रक्षा के लिए समर्पित कानून की जरूरत
पर्वत संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम क्यों जरूरी?
भारत में पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण, संवर्धन, सुरक्षा और सतत प्रबंधन के लिए प्रावधान करने, पर्वतों को महत्वपूर्ण पारिस्थितिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक संपदा के रूप में मान्यता देने, पर्वतीय क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को विनियमित करने, आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों के अधिकारों और उनकी सहभागिता सुनिश्चित करने, शासन के लिए संस्थागत तंत्र स्थापित करने तथा इससे संबंधित या आनुषंगिक विषयों को व्यवस्थित रूप से संबोधित करने के लिए एक समर्पित अधिनियम अत्यंत आवश्यक है।
भारत का संविधान अनुच्छेद 48ए के अंतर्गत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का दायित्व देता है, जबकि अनुच्छेद 51ए(ग) प्रत्येक नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार का कर्तव्य सौंपता है। इस संदर्भ में पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र भारत की प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग है, जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए पेयजल, जैव विविधता, जलवायु संतुलन, आपदा प्रतिरोधक क्षमता, सांस्कृतिक पहचान और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
हिमालय, ट्रांस-हिमालय, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, विंध्य, अरावली, नीलगिरि और सतपुड़ा जैसी पर्वत श्रृंखलाएँ आज जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित विकास, वनों की कटाई, खनन, अवसंरचना विस्तार, पर्यटन के बढ़ते दबाव और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति से गंभीर खतरों का सामना कर रही हैं। ये पर्वत पारिस्थितिक रूप से नाजुक, भू-वैज्ञानिक दृष्टि से संवेदनशील, सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए इनके लिए एहतियाती, वैज्ञानिक और सहभागी शासन व्यवस्था की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जाती है। इन क्षेत्रों के दीर्घकालिक संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास के लिए एक व्यापक, पारिस्थितिकी-आधारित और अधिकार-सम्मानजनक विधिक ढाँचा अनिवार्य है।
इस अधिनियम के अंतर्गत “पर्वतीय क्षेत्र” से आशय ऐसे क्षेत्रों से है जिन्हें ऊँचाई, ढाल, भूगर्भीय संरचना, पारिस्थितिक संवेदनशीलता, जलवायु परिस्थितियों, आपदा जोखिम या सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर आधिकारिक रूप से पर्वतीय घोषित किया गया हो, जिसमें तलहटी, जलग्रहण क्षेत्र और स्रोत क्षेत्र भी शामिल हों। “पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र” में वनस्पति, जीव-जंतु, वन, घासभूमि, आर्द्रभूमि, हिमनद, हिम क्षेत्र, मृदा, जल तंत्र और भू-वैज्ञानिक संरचनाएँ सम्मिलित हैं। “संरक्षित पर्वतीय क्षेत्र” वे क्षेत्र होंगे जिन्हें विशेष संरक्षण हेतु अधिसूचित किया गया हो, जबकि “स्थानीय समुदाय” में अनुसूचित जनजातियाँ, पारंपरिक वनवासी, पशुपालक, प्रवासी पशुपालक तथा अन्य निवासी शामिल होंगे जिनकी आजीविका पर्वतीय संसाधनों पर निर्भर है। “सतत विकास” का अर्थ ऐसा विकास है जो वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए पारिस्थितिक संतुलन और भावी पीढ़ियों के हितों से समझौता न करे। “एहतियाती सिद्धांत” यह सुनिश्चित करता है कि संभावित गंभीर पर्यावरणीय क्षति की स्थिति में वैज्ञानिक अनिश्चितता को संरक्षण उपायों को टालने का आधार न बनाया जाए।
अधिनियम के अंतर्गत एक राष्ट्रीय पर्वत संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना की जानी चाहिए, जिसमें केवल सरकारी प्रतिनिधि ही नहीं बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले, पर्वतीय पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील और ज्ञानवान व्यक्तियों को भी शामिल किया जाए। यह प्राधिकरण नीतिगत मार्गदर्शन, योजनाओं की स्वीकृति और उनके प्रभावी क्रियान्वयन एवं निगरानी का दायित्व निभाएगा।
पर्वतीय क्षेत्रों की पहचान और अधिसूचना केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों और वैज्ञानिक संस्थानों के परामर्श से की जानी चाहिए, जिसमें पारिस्थितिक संवेदनशीलता, आपदा जोखिम, जैव विविधता और सांस्कृतिक महत्व को प्रमुख आधार बनाया जाए। अधिसूचित क्षेत्रों को मुख्य संरक्षण क्षेत्र, विनियमित बफर क्षेत्र और सतत उपयोग क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए, जिसके लिए स्पष्ट मापदंड निर्धारित हों।
मुख्य संरक्षण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन, खदान संचालन, रेत उत्खनन, वनों की कटाई और पारिस्थितिकी तंत्र के रूपांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। बड़े बाँधों या उच्च जोखिम वाली अवसंरचनाओं का निर्माण न किया जाए तथा खतरनाक अपशिष्टों का निपटान भी प्रतिबंधित हो। हिमनदों, अल्पाइन घासभूमियों और वन्यजीव आवासों को क्षति पहुँचाने वाली गतिविधियों पर रोक हो तथा किसी भी परियोजना को स्वीकृति देने से पूर्व भूगर्भीय, भूकंपीय और सामाजिक प्रभाव आकलन के साथ जनसुनवाई अनिवार्य की जाए।
संरक्षण और जलवायु अनुकूलन को प्राथमिकता देते हुए जैव विविधता और वन्यजीव गलियारों की रक्षा, हिमनदों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण, मृदा अपरदन और भूस्खलन की रोकथाम तथा क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही जलवायु परिवर्तन के अनुरूप अनुकूलन योजनाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा इस अधिनियम का महत्वपूर्ण आधार होना चाहिए। वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत प्राप्त अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए पारंपरिक ज्ञान को मान्यता और प्रोत्साहन दिया जाए तथा स्थानीय समुदायों को योजना निर्माण, क्रियान्वयन और निगरानी में भागीदारी दी जाए। पर्यटन और संसाधनों से प्राप्त लाभों में उनका उचित हिस्सा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
प्रवर्तन के लिए सशक्त तंत्र स्थापित किया जाए, जिसमें निरीक्षण और कार्रवाई हेतु अधिकारियों की नियुक्ति हो तथा उल्लंघनों को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध बनाया जाए। दंड के रूप में पाँच वर्ष तक का कारावास और दस लाख रुपये तक का जुर्माना, तथा गंभीर मामलों में पचास लाख रुपये तक का जुर्माना निर्धारित किया जाए। पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति “प्रदूषक भुगतान सिद्धांत” के आधार पर लागू की जाए।
वित्तीय प्रावधानों के अंतर्गत पर्वत संरक्षण कोष की स्थापना की जाए, जिसका उपयोग संरक्षण और सतत विकास के कार्यों में किया जाए। साथ ही “भारतीय पर्वत स्थिति रिपोर्ट” प्रतिवर्ष संसद में प्रस्तुत की जाए। शिकायत निवारण के लिए प्रत्येक व्यक्ति या समुदाय को अधिकार दिया जाए और अपील की व्यवस्था राष्ट्रीय हरित अधिकरण में सुनिश्चित की जाए। केंद्र सरकार को नियम और दिशा-निर्देश बनाने की शक्ति प्राप्त हो तथा यह अधिनियम अन्य कानूनों पर प्रभावी हो। सद्भावना में की गई कार्रवाइयों के लिए अधिकारियों को संरक्षण प्रदान किया जाए।
अंततः, हिमालय, ट्रांस-हिमालय, काराकोरम, लद्दाख, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, अरावली, विंध्य, सतपुड़ा और नीलगिरि जैसी प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं के संरक्षण के लिए एहतियाती सिद्धांत, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, अंतर-पीढ़ी समानता, सामुदायिक सहभागिता और वैज्ञानिक प्रबंधन को आधार बनाया जाना चाहिए। साथ ही खनन, विस्फोटक उपयोग, वनों की कटाई, हिमनदों के व्यावसायिक उपयोग और अपशिष्ट निपटान जैसी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। 20 कमरों से बड़े होटलों, 3500 मीटर से अधिक ऊँचाई पर सड़क निर्माण और 10 मेगावाट से अधिक जलविद्युत परियोजनाओं पर सीमा निर्धारित कर प्रतिबंध लगाया जाए, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा, सुरंग निर्माण और रक्षा अवसंरचना को सशर्त अनुमति दी जा सकती है, जिनकी हर पाँच वर्ष में समीक्षा की जानी चाहिए।
*जल पुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक।
