डॉ. सेलेम नंजुंदैया सुब्बा राव
संस्मरण: डॉ. सेलेम नंजुंदैया सुब्बा राव (7 फरवरी 1929 – 27 अक्टूबर 2021)
– रमेश चंद शर्मा
भाईजी का कारवां: प्रेम और शांति का पथ
डॉ. सेलेम नंजुंदैया सुब्बा राव (7 फरवरी 1929 – 27 अक्टूबर 2021), जिन्हें हम सब प्यार से भाईजी कहते हैं, एक ऐसी ज्योति थे जिनका प्रकाश हर दिल को छूता था। भाईजी को सादर जय जगत। ऐसे व्यक्ति मरते नहीं—उनके शब्द, बोल, विचार, सर्व धर्म प्रार्थना, गीत, संगीत, अच्छे कर्म, साधना, मौन, श्रम कभी मरते नहीं हैं। कभी विविध कारणों से धुंधले या मंद पड़ सकते हैं, मगर वे हमेशा जिंदा रहते हैं। समय के साथ वे फलते-फूलते रहते हैं, जैसे कोई अमर स्रोत जो लोगों की वाणी में, कंठों में, विचारों में, यादों में, इतिहास में, दिलों में, दिमाग में आते रहते हैं, गूंजते हैं, उभरते हैं, और झरने की तरह फलते-फूलते, फूटते हैं। भाईजी का जीवन एक ऐसी धारा था, जो हर सीमा को लांघकर हर दिल में बस्ती थी। उनके विचार आज भी हमारे बीच सांस लेते हैं, जैसे कोई प्रियजन जो कभी दूर नहीं जाता, बल्कि हर कदम पर साथ चलता है।
सहज, सरल, सुलभ, सादा, साझा जीवन—भाईजी के पास यह सब बहुत सहजता, सरलता, स्पष्टता के साथ उनका अंग बन गया था। सोते-जागते, आते-जाते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, सोचते-विचारते, उनकी कथनी और करनी में यह साफ झलकता रहता था, जैसे स्वच्छ हवा और निर्मल पानी की तरह सबके लिए सहज उपलब्ध। उनका व्यक्तित्व एक चुंबकीय क्षेत्र बनाता था, जिसका आकर्षण हर किसी को अपनी ओर खींचता था। *जिन खोजा तिन पाईंया*—जो उन्हें खोजता, उसे न केवल उनका साथ मिलता, बल्कि एक ऐसा अपनापन मिलता जो जीवन को अर्थ देता था। भाईजी का हर शब्द, हर कर्म, हर मुस्कान एक नन्हा सा दीया थी, जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाती थी।
सबै भूमि गोपाल की—उनका जीवन एक नदी की तरह था, जो सदैव सक्रिय रहती है, कभी थमती नहीं। चाहे पहाड़ हो या धरातल, ऊंचाई हो या ढलान, गांव हो या शहर, बस्ती हो या जंगल, देश हो या विदेश, बंगलौर, दिल्ली हो या चंबल, सुनसान हो या बीहड़—वही स्वभाव, निडरता, पहनावा, सक्रियता, शांति, सौहार्द, साझापन, सद्भावना, श्रमदान, सर्व धर्म प्रार्थना, गीत और खेल। भारत से लेकर अमेरिका तक, भाईजी ने हर जगह अपने प्रेम और शांति के संदेश को बिखेरा। उनकी यात्रा एक ऐसी धारा थी, जो हर दिल को जोड़ती थी, हर सीमा को लांघती थी। चंबल के बीहड़ों में डकैतों के बीच हो या संयुक्त राष्ट्र के मंच पर, भाईजी का संदेश एक ही था—प्रेम, शांति और एकता।

सबके भाईजी—हर आयु वर्ग, हर स्थान के लोगों से भाईजी संपर्क और संवाद साधने की विशेष क्षमता रखते थे। चाहे गांव की सभा हो या संयुक्त राष्ट्र संघ, वे हर मंच पर अपनी सादगी और प्रेम से सबके दिल जीत लेते थे। एक तरफ बच्चों के लिए उनकी जेब से गुब्बारा निकलता, जो उनके चेहरों पर मुस्कान बिखेरता, तो दूसरी तरफ किशोर, युवा, जवान और अधेड़ आयु के लिए गीत, खेल, श्रम और प्रेरक संदेश। वे हर व्यक्ति की समझ और क्षमता के अनुसार सार्थक और उपयोगी संदेश देना जानते थे। उनकी यह कला उन्हें हर दिल का प्रिय बनाती थी, जैसे एक बड़े भाई का आलिंगन जो हर दुख को भुला देता था।
संवाद और संपर्क की व्यापकता ऐसी थी कि आज भी बड़ी संख्या में लोगों के पास भाईजी का लिखा हुआ निवास, शिविर, सभा, सम्मेलन, प्लेटफॉर्म, रेल, प्रवास से लिखा हुआ पत्र, अंतर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड आसानी से मिल जाएगा। ये पत्र उनके प्रेम और अपनत्व की अनमोल निशानी हैं। आधुनिक समय में भी वे फोन करके हालचाल पूछते, बात करते, और हर किसी के दिल में एक गर्माहट छोड़ जाते। उनके पत्र और बातचीत में वह गहरा मानवीय स्पर्श था, जो हर किसी को यह अहसास कराता था कि वे अकेले नहीं हैं।
हर परिवार उनका परिवार बन गया। जवानी में आह्वान पर अपना बंगलौर का घर छोड़कर दिल्ली आए, मगर देश-दुनिया में उनके इतने घर बन गए कि आज उनकी गिनती करना कठिन है। भाईजी ने हर जगह अपनापन बांटा, हर परिवार को अपना बनाया। चाहे गांव की गलियां हों या शहर की सड़कें, उनका परिवार हर जगह फैलता गया। उनका घर केवल एक भौतिक स्थान नहीं था, बल्कि एक भावना थी, जो हर दिल में बस्ती थी।
डॉ. सेलेम नंजुंदैया सुब्बा राव व्यक्ति नहीं, समूह और संगठन का प्रतीक थे। उन्होंने राष्ट्रीय युवा योजना नामक संगठन बनाया, जो उनके स्वभाव के कारण कम संगठन और अधिक एक परिवार की तरह विकसित हुआ। इसकी यह बड़ी विशेषता थी—ना सदस्यता रजिस्टर, ना सदस्यता शुल्क, ना विशेष बंधन, ना शर्तें। यह एक व्यापक सोच, समझ और विचारों वाला परिवार था, जिसके दरवाजे सबके लिए खुले थे। सबका स्वागत था, कोई पराया नहीं था। इस परिवार में लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। छात्र जीवन से ही भाईजी सामाजिक कार्यों में सक्रिय थे। वे कांग्रेस सेवा दल में राष्ट्रीय मुख्य संगठक रहे, गांधी शांति प्रतिष्ठान के आजीवन सदस्य बने, गांधी शताब्दी के दौरान बड़ी और छोटी लाइन की गांधी दर्शन रेलगाड़ी में निदेशक के रूप में शामिल हुए। उन्होंने महात्मा गांधी सेवा आश्रम की स्थापना की, चंबल शांति मिशन और समिति में योगदान दिया, चंबल शांति कार्य और पुनर्वास में सक्रिय रहे। आंतर भारती के कार्यक्रम, बाल महोत्सव, बाल मेला, राष्ट्रीय युवा योजना, भारत जोड़ो अभियान और सद्भावना रेल के माध्यम से देशभर में जागरूकता फैलाई। भाईजी व्यापक संपर्क और संवाद में शामिल रहे, विभिन्न गतिविधियों, सभाओं, सम्मेलनों और बैठकों में हिस्सा लिया। उनके साथ साथी जुड़ते गए और उनका कारवां बढ़ता गया। भाईजी जहां भी पहुंचे, वहां परिवार बनता गया और उनका दायरा और व्यापक होता गया। सभी भाईजी को अपने समीप पाते, अपनापन महसूस करते—सबके भाईजी। उनकी उपस्थिति एक ऐसी गर्माहट थी, जो हर दिल को सुकून देती थी।
महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा की स्थापना भाईजी ने जौरा, मुरैना, चंबल, मध्यप्रदेश में अपने गांधी शताब्दी रेल के साथियों के साथ मिलकर की। प्रारंभिक काल में श्री पी.वी. राजगोपाल ने आश्रम में सबसे ज्यादा समय बिताया, और बाद में श्री रणसिंह परमार ने कमान संभाली, जो आज भी सक्रियता, समर्पण, संकल्प, स्पष्टता और निष्ठा के साथ अपनी साधना में लीन हैं। यह आश्रम भाईजी के विचारों का एक जीवंत मंदिर है, जहां शांति और सेवा की लौ निरंतर जलती है।
बागी पुनर्वास भाईजी का एक ऐसा कार्य था, जिसने हिंसा के अंधेरे में फंसे लोगों को शांति का रास्ता दिखाया। बागी परिवारों से संबंध स्थापित करना, उनकी देखभाल करना, खुली जेल में बागियों से मिलना, उनकी समस्याओं का समाधान करना और विभिन्न विभागों से संबंधित कार्यों को साधना—यह कोई आसान काम नहीं था। भाईजी ने 600 से अधिक डकैतों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास में योगदान दिया, जो चंबल के बीहड़ों में शांति की एक नई सुबह लेकर आया। उनकी यह पहल प्रेम और करुणा की ताकत का जीवंत उदाहरण थी, जिसने साबित किया कि मानवता का स्पर्श सबसे कठोर दिलों को भी पिघला सकता है।
वकील ही वकील की परंपरा में भाईजी एक चमकता सितारा थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर भाईजी तक, वकीलों की एक बड़ी श्रृंखला रही है, जिन्होंने आजादी की लड़ाई से लेकर राष्ट्र निर्माण तक अपना सर्वस्व समर्पित किया। देश के लिए जिए और देश के लिए मरे। इनके नाम लिखने लगें तो कितने ही पन्ने भर जाएंगे। इनमें से अधिकांश ने न्यायालय की अदालत के बजाय जन-जन में न्याय, समता, एकता, शांति, सद्भावना, सौहार्द और जागरूकता के लिए अपने जीवन को खपाया। *बदला नहीं, बदलाव चाहिए*—इस मंत्र के साथ उन्होंने शांति, अहिंसा, करुणा और प्रेम से समाज में बदलाव लाने का कार्य किया। भाईजी, जो स्वयं एक वकील थे, ने 13 वर्ष की आयु में क्विट इंडिया मूवमेंट में जेल यात्रा की और बाद में अन्यायपूर्ण मुकदमों को ठुकराकर समाज सेवा को चुना। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि सच्चा वकील वही है जो जनता की अदालत में न्याय और प्रेम की वकालत करता है।
*नौजवान आओ रे* का उनका आह्वान दिलों में गूंजता था। नए समाज की रचना में तरुणाई का योगदान उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा थी। किसी भी समाज या देश में बदलाव की असली ताकत युवा पीढ़ी होती है। भाईजी ने युवाओं को दिशा देने, उनकी दशा सुधारने के लिए सतत प्रयास किए। युवाओं को रचना और निर्माण से जोड़ा। बाल मेले, बाल महोत्सव के माध्यम से बालपन से ही बच्चों को शांति, एकसाथ रहने, रचना, निर्माण और सद्भावना के लिए संस्कारित किया। कहानियां, किस्से, गीत, नाटक, भाषण, अंताक्षरी, खेल, चित्रकला, पेपर कार्य, मिट्टी कार्य और विभिन्न भाषाओं को सीखने के अवसर प्रदान किए। अलग-अलग घरों में रहकर बच्चों को विविधता में एकता का संदेश दिया। भाईजी स्वयं अनेक भाषाएं समझते, बोलते और जानते थे, जो उनकी संवाद क्षमता को और गहरा बनाता था। *भारत की संतान* गीत के माध्यम से विभिन्न भाषाओं को सुनने का अवसर मिलता था, जो एकता, मिलकर रहने और अनेकता में एकता का संदेश प्रसारित करता था। इस गीत ने देश की सांस्कृतिक विविधता को एक सूत्र में पिरोया, और हर सुनने वाले के दिल में एकता की भावना जगा दी।
भाईजी की कामना सद्भावना थी। देश में कहीं भी हिंसा, मारपीट या दंगे हुए, भाईजी के आह्वान पर उनके नेतृत्व में सैकड़ों युवा और साथी शांति और सद्भावना के लिए पहुंच जाते थे। कश्मीर से कन्याकुमारी, अरुणाचल से द्वारका—पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप तक—भाईजी का संदेश हर जगह पहुंचा। उनकी यह सक्रियता देश को एकता के सूत्र में बांधने का एक अनुपम उदाहरण थी। उनका हर कदम, हर शब्द, हर गीत एक प्रार्थना था—शांति और प्रेम की प्रार्थना।
ऐसे व्यक्ति का पंचतत्व का भौतिक शरीर भले ही जाता हो, लेकिन उनका विचार, चिंतन, मनन, संस्कार और काम अनेक लोगों में रमकर, बसकर, आगे बढ़ता रहता है। अब भी भाईजी ऐसे जिंदा हैं, जिंदा रहेंगे। उनके विचार हमारे दिलों में धड़कते हैं, उनकी आवाज हमारे कानों में गूंजती है, और उनकी प्रेरणा हमारे कदमों को रास्ता दिखाती है। आओ, मिलकर आगे कदम उठाएं, बढ़ें, बिना रुके, बिना झुके, क्योंकि भाई सुब्बा राव हमारे साथ हैं। उनका नेतृत्व अब और ज्यादा व्यापक हो गया है। अब भाईजी से मिलने कहीं नहीं जाना पड़ेगा—जहां हैं, वहीं भाईजी का नेतृत्व उपलब्ध है। उनकी प्रेरणा को समझें, सोचें, अपनाएं और पहले से अधिक सक्रियता, सावधानी, सतर्कता, समझदारी, संकल्प, समर्पण, स्पष्टता, उत्साह और हिम्मत के साथ पतवार संभालें।
त्याग और प्रेम के पथ पर चलकर मूल ना कोई हारा,
हिम्मत से पतवार संभालो फिर क्या दूर किनारा।
नौजवान आओ रे, नौजवान गाओ रे,
लो कदम मिलाओ रे, लो कदम बढ़ाओ रे।
जय जगत पुकारे जा, सर अमन पर वारे जा,
सबके हित के वास्ते, अपना सुख बिसारे जा।
भाईजी की स्मृति को हार्दिक सादर जय जगत। उनके विचार आज भी जिंदा हैं, और आगे भी रहेंगे। उनकी श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा और संकल्प से समर्पित साथी इस धारा को आगे बढ़ाने में मददगार साबित होंगे। भाईजी का नारा—एकजुटता और भाईचारा—हमारे दिलों में गूंजता है। उनकी स्मृति एक ऐसी लौ है, जो हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी। आइए, उनके सपनों को साकार करें, उनके दिखाए रास्ते पर चलें, और उनके प्रेम और शांति के संदेश को हर कोने तक पहुंचाएं।
*लेखक प्रख्यात गाँधी साधक हैं।
