बैतरणी नदी
भुवनेश्वर: बैतरणी नदी, जो ओडिशा के केदुझर जोड़ा क्षेत्र की जीवनरेखा है, को बचाने और पुनर्जनन के लिए 24 मई 2025 एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में केदुझर जोड़ा क्षेत्र के लोगों ने एकजुट होकर नदी के संरक्षण का संकल्प लिया। बैतरणी, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, और आर्थिक धरोहर है, आज खनन कंपनियों की गतिविधियों के कारण खतरे में है। सम्मेलन में स्थानीय लोगों ने नदी को लोहे और पत्थर के पाउडर की स्लरी पाइपलाइन के माध्यम से समुद्र तक पहुंचाने के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया।
स्थानीय निवासियों ने स्पष्ट किया कि बैतरणी केवल एक नदी नहीं, बल्कि उनकी मां है, जो उनकी जीविका और संस्कृति को पोषित करती है। सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने कहा, “हमारी नदी को लोहे और पत्थर का मैला ढोने के लिए नहीं छोड़ा जाएगा। यह नदी हमारे पापों को नष्ट करने वाली और पवित्रता को बढ़ाने वाली है।” नदी के पानी को खनन कार्यों के लिए उपयोग करने की सरकारी नीतियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया।
स्थानीय लोगों ने नदी को अपनी मां बताते हुए इसके सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, और आर्थिक महत्व को रेखांकित किया। किसानों ने चेतावनी दी कि यदि खनन कंपनियां नदी में पाइपलाइन डालने का प्रयास करेंगी, तो वे संगठित होकर इसका विरोध करेंगे। यहां का चासी किसान नदी सूख जाने से सबसे अधिक प्रभावित होगा और बहुत भयानक समस्या उत्पन्न होगी। चासी (किसान) समुदाय ने कहा, “नदी सूखने से हमारी आजीविका नष्ट हो जाएगी। यह हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर है, जिसे हम किसी भी कीमत पर बचाएंगे। यदि यह कंपनियां आगे पाइप लाइन डालेंगे तो हम चासी (किसान) संगठित होकर हटा देंगे।”
सम्मेलन में यह भी तय किया गया कि इस महीने के अंत से नदी यात्रा शुरू की जाएगी, जिसके माध्यम से लोगों को जोड़ा जाएगा और बैतरणी के संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाई जाएगी। इस अभियान का एक श्वेत-पत्र तैयार करने की जिम्मेदारी सुदर्शन दास और व्रतींदी जना को सौंपी गई। श्वेत-पत्र में नदी की वर्तमान स्थिति, जल की उपलब्धता, और सरकार से स्पष्ट नदी नीति लाने की मांग शामिल होगी। इसके अतिरिक्त, पूर्व में जल की उपलब्ध और वर्तमान स्थिति की तुलना के साथ, राज्य सरकार एक स्पष्ट नदी नीति लाने, बैतरणी नदी के शुद्ध जल का स्लरी पाइपलाइन के माध्यम से उपयोग न करने, पूर्व सरकार द्वारा उद्योगों को जल आपूर्ति हेतु किया गया समझौता रद्य करने, उद्योगों और खनिज कंपनियों का कचरा नदी में न डालने जैसी कई मांगे शामिल है। उद्योगों द्वारा नदी में कचरा डालने और पूर्व में किए गए जल आपूर्ति समझौतों को रद्द करने की मांग भी उठाई गई है।
सम्मेलन में प्रफुल्ल सामंतरा ने अपील करते हुए कहा, “बैतरणी हमारी मां है। मां के साथ मां जैसा व्यवहार करें, तो वह हमें पोषित करेगी। नदी को अपनी जमीन पर बहने और सूरज-हवा के स्पर्श के साथ जीने का अधिकार है।” इस कार्यक्रम का आयोजन प्रफुल्ल सामंतरा, सुदर्शन दास, व्रतींदी जना, और अशोक ठक्कर ने किया।
इसके बाद, सिक्किम की राजधानी गैंगटोक में सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रो. अनिल मिश्रा और प्रो. भरत ने ‘पुनर्जनन सैरनी-पार्बती’, ‘पुनर्जनन नेहरो नदी’, और ‘पुनर्जनन तेवर नदी’ पुस्तकों का विमोचन किया। ये पुस्तकें नदियों के पुनर्जनन और संरक्षण के लिए प्रेरणा प्रदान करती हैं।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक




