लोनी नदी के पुनर्जीवन की राह तलाशेंगे शोधार्थी
प्रयागराज: प्रयागराज जिले के शंकरगढ़ ब्लॉक की मौसमी लोनी नदी आज अपने अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रही है। कभी वर्ष भर बहने वाली यह नदी अब केवल बरसात के दिनों में ही दिखाई देती है। गाद जमाव, घटते भूजल स्तर और मानवीय हस्तक्षेपों के कारण सिकुड़ती जा रही इस नदी की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, झूंसी के शोध छात्र रामबाबू तिवारी के नेतृत्व में दर्जनों छात्र शीघ्र ही एक विस्तृत नदी अध्ययन यात्रा पर निकलेंगे।

रामबाबू तिवारी, जो जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं, ने बताया कि लोनी नदी टोंस नदी की सहायक है और वर्तमान में अपनी अविरलता और निर्मलता दोनों खो चुकी है। यह नदी प्रयागराज जिले के शंकरगढ़ क्षेत्र में लगभग 32.5 से 35 किलोमीटर की लंबाई में प्रवाहित होती है और करीब 14 ग्राम पंचायतों व गांवों से होकर गुजरती है। स्थानीय लोग इसे शंकरगढ़ क्षेत्र की “जीवन रेखा” मानते हैं, क्योंकि पहले यह खेती और भूजल पुनर्भरण का प्रमुख आधार थी। अब यह एक मौसमी नदी बनकर रह गई है, जो मुख्यतः वर्षा ऋतु में ही प्रवाहित होती है। नदी के सूखने का सीधा असर इन लगभग 14 ग्राम पंचायतों की खेती, पशुपालन और पेयजल उपलब्धता पर पड़ रहा है।
नदी अध्ययन यात्रा के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर शासन और प्रशासन को सौंपी जाएगी। इसके पश्चात नदी के पुनरुद्धार के लिए “नदी जन-जागरण यात्रा” निकालने की भी योजना है। इस अभियान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, एमएनआईटी तथा गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान सहित अन्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र स्वयंसेवक के रूप में भाग लेंगे।
इस नदी अध्ययन यात्रा को सामाजिक संस्थाओं का भी सहयोग मिलेगा। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (नई दिल्ली), मंगल भूमि फाउंडेशन (बांदा) और हेस्को संस्थान (देहरादून) सहित कुछ संगठनों ने इसके लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी है।

भौगोलिक दृष्टि से लोनी नदी शंकरगढ़ क्षेत्र के पहाड़ी पठारी इलाके (पाठा) से निकलती है। बरसात के मौसम में पहाड़ों की छोटी-छोटी धाराओं का जल गाढ़ा कटरा गांव के ऊपर बने एक चेक डैम में एकत्र होता है और वहीं से एक धारा के रूप में बहते हुए यह देवरा टोंस नदी में मिल जाता है। यह नदी गाढ़ा कटरा से होकर बेनीपुर, शिवराजपुर, जोरवट, कपारी और पगुवार जैसे गांवों से गुजरती हुई आगे बढ़ती है।

स्थानीय निवासी लोला पटेल बताते हैं कि पहले यह नदी वर्ष भर बहती थी और तब कोई चेक डैम नहीं था। अब स्थिति यह है कि बरसात में आने वाला पानी तेजी से पहाड़ों से बहकर सीधे टोंस नदी में चला जाता है और वर्षा समाप्त होते ही लोनी नदी सूख जाती है। जहां-जहां चेक डैम बने हैं, वहीं उनके आसपास कुछ मात्रा में जल रुक पाता है।
नदी अध्ययन यात्रा से पहले किए गए प्रारंभिक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि उद्गम स्थल पर गाद की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है, जिससे नदी का क्षेत्रफल लगातार कम हो रहा है और आसपास के खेतों का रकबा बढ़ता जा रहा है। नदी किनारे ट्यूबवेल और बोरवेल की संख्या अधिक होने से भूजल स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। वर्तमान में नदी अपने उद्गम स्थल पर ही लगभग सूख चुकी है।

उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में लोनी नदी के पुनर्जीवन के लिए मनरेगा योजना के तहत गाद निकासी, तटों को मजबूत करने, अतिक्रमण हटाने और वृक्षारोपण जैसे कार्य भी शुरू किए गए हैं। यह अध्ययन यात्रा इन सरकारी प्रयासों के प्रभाव का मूल्यांकन करने और उन्हें अधिक प्रभावी बनाने के सुझाव देने पर भी केंद्रित होगी, ताकि नदी का प्राकृतिक प्रवाह लौट सके और आसपास के गांवों में भूजल स्तर सुधर सके।
डॉ. श्रवण मिश्रा ने बताया कि यह नदी अध्ययन यात्रा होली के बाद निकाली जाएगी और इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। आयोजकों का कहना है कि यह पहल केवल एक शैक्षणिक अभ्यास नहीं होगी, बल्कि क्षेत्र में जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन को लेकर व्यापक जनचेतना का अभियान भी बनेगी।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
