अरावली के आंसू – 50 वर्षों की कहानी (भाग – 2)
– डॉ राजेंद्र सिंह*
किससे कहूँ, मुझे सबने उजाड़ा !
राजस्थान की जीवन-रेखा अरावली पर्वत विश्व के सबसे प्राचीन पर्वतों में से एक है। एक जमाना था जब अरावली कच्छ के रण से लेकर तिब्बत के पश्चिमी भाग से होते हुए चीन, तुर्किस्तान तक विस्तृत था। अपने यौवन काल में अरावली लगभग 10 हजार फुट ऊंचा था। तब इसकी चोटियाँ सदा बर्फ से ढकी रहती थीं। उस समय न तो विंध्याचल पर्वत था, न ही हिमालय। हिमालय तो इस वृद्ध-जर्जर अरावली के सामने कल का बच्चा है। अरावली ने इसे घुटनों चलते देखा है।
लेकिन, जैसा कहा गया है, परिवर्तन सृष्टि का अटल नियम है। तुलसीदास का कथन सब पर लागू होता हैः
घरा को प्रमान यही तुलसी, जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना।
यह कहावत अरावली पर भी अक्षरशः चरितार्थ होती है। कभी भारत का ही नहीं, विश्व का सिरमौर रहने वाला अरावली भी प्रकृति के प्रकोपों से नहीं बच सका। इस उन्नत पर्वत की चोटियों से बड़े-बड़े ग्लेशियर सरकते रहे। इन ग्लेशियरों ने अरावली के विशाल पत्थर-खंडों को दूर-दूर तक फैलाया। आज जैसलमेर में पाये जाने वाले प्रस्तरखंड इसके प्रमाण हैं। साथ ही, तापमान में घटा-बढ़ी, पवनों, इसी पर्वत से निकलने वाली नदियों, हिम, पाले आदि ने इसके शरीर को जर्जर करना शुरू कर दिया। जो कुछ बचा-खुचा रहा, इसके जंगलों, पहाड़ियों को स्वार्थी लोगों ने साफ कर दिया। परिणाम यह रहा कि आज अरावली एक नग्न पहाड़ी के रूप में रह गया है।
इस अरावली पर्वत का उदय भी एक सागर से हुआ है। आज जहाँ थार का विशाल रेगिस्तान है, वहां कभी एक सागर हिलोरें लेता था। प्रकृति की भू-परिवर्तनकारी शक्तियों ने उस सागर से अरावली को ऊपर उठाना शुरू किया। तब थार का रेगिस्तान भी धीरे-धीरे जंगलों से आच्छादित होता गया। कालान्तर में ये सभी जंगल अरावली से कट-छंट कर आये मलवे के नीचे दबते गये। समय के साथ थार का रेगिस्तान बढ़ता गया। उस क्षेत्र में खड़े जंगल इन सबके नीचे दबते गये। आज जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह करोड़ों वर्ष पूर्व की कहानी का आखिरी अध्याय है। उन्हीं जंगलों के जमीन में दब जाने के कारण उनका कार्बनिक अवशेष आज भी जैसलमेर और उसके इर्द-गिर्द के क्षेत्र में प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम के रूप में घरातल से हजारों फुट की गहराई में दबा पड़ा है। कोई आश्चर्य नहीं, किसी दिन जब इन क्षेत्रों की गहरी खुदाई हो तो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के अथाह भंडार मिलें। लेकिन आज तो वह सारी सम्पदा अथाह बालुका-राशि के नीचे दबी पड़ी है।
उन दिनों अरावली पर्वत की जो विशाल घाटियाँ थीं, वे आजकल इस पर्वत श्रेणी के स्थान-स्थान पर गैपों के रूप में उभर आई हैं। ये गैप जो किसी जमाने में ग्लेशियरों या हिमनदों के रास्ते थे, आजकल बढ़ते रेगिस्तान के लिए रास्ते बन गये हैं जिनसे होकर थार के रेगिस्तान का पूर्वी हिस्सा प्रतिवर्ष कुछ न कुछ पूरब की और सरकता आ रहा है, राजस्थान की उर्वरा भूमि को रेतीला बनाने के काम में जुटा है।
लेकिन यह इतिहास तो आज से लगभग 10 लाख वर्ष पहले का है। उस समय हिमालय भी एक सागर से ऊपर उठ रहा था। कैसी विडम्बना है कि जिस हिमालय को हिमालय बनाने में अरावली ने अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े किये, उसी हिमालय के उत्थान के कारण अरावली और भी जर्जर होता गया। थार क्षेत्र की हरियाली रेगिस्तान में बदलती गई। क्रमशः गंगा-सिंध का उपजाऊ मैदान बनता गया और इधर रेत की भरमार होती गई। कहीं-कहीं रेतीले टीलों ने अरावली की बची-खुची छोटी पहाड़ियों को भी अपने नीचे दबा लिया। कहीं-कहीं इसी अरावली से निकली नदियों और वर्षा के जल ने पथरीली जमीन या चट्टानों को इतना नीचे दबा लिया कि आज उदयपुर और चित्तौड़गढ़ के क्षेत्र में नीचे पहाड़ी चट्टानें हैं, तो ऊपर उपजाऊ मिट्टी। लोग मिट्टी खोद-खोदकर पत्थर निकालते हैं। सवाई माधोपुर के समीप इस पर्वत माला की चट्टानें जमीन में इतनी धंस गई हैं कि नदियों की तलेटी में पत्थर ही पत्थर हैं।
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आज इस अरावली का जो स्वरूप दिखाई पड़ता है, उसकी लम्बाई कुल में 692 किलोमीटर रह गई है जो उत्तर-पश्चिम में दिल्ली के समीप महरौली से लेकर राजस्थान के दक्षिण-पश्चिम में गुजरात तक ही सीमित है। राजस्थान में इसकी लम्बाई लगभग 550 किलोमीटर है। दिल्ली से लेकर झुंझुनूं जिले के खेतड़ी कस्बे तक यह कटी-फटी है। कहीं पर्वत हैं, तो कहीं मैदान। खेतड़ी के समीप यह एक स्पष्ट पर्वत श्रेणी के रूप में उभर कर आती है। सांभरझील के समीप से निकलती हुई अजमेर से आगे यह स्पष्ट रूप से अनेक समानान्तर श्रेणियों बनाती है। यहाँ से आगे इसकी चौड़ाई भी बढ़कर लगभग 50 किलोमीटर हो जाती है। इसके बाद यह डूंगरपुर और उदयपुर की ओर फैलना प्रारम्भ कर देती है। माउण्ट आबू की गुरुशिखर चोटी हिमालय और दक्षिण भारत के नीलगिरि पर्वतों के बीच सबसे ऊँची है। यहाँ इसकी ऊँचाई 1727 मीटर है। यह गुरुशिखर आज भी इतना ऊंचा है कि गर्मियों के दिन में भी आप इस चोटी के नीचे देखिए तो बादल छाये नजर आते हैं और कालिदास की हिमालय के बारे में कही पंक्ति तरोताजा हो जाती है।
आमेखलां संचरितां घनानां छायामधः सानुगुतां निषेव्य ।
उद्देजिता वृष्टिभिराश्रयन्ते श्रृंगाणि यस्यातपवन्ति सिद्धाः ।।
(हिमालय की चोटियों की कमर तक ही बादल छाये रहते हैं। वर्षों आने पर नीचे की घाटियों से ऋषि-मुनि ऊपरी चोटियों पर चले जाते हैं जहाँ धूप रहती है।)
आप उदयपुर के इतिहास प्रसिद्ध गोगुन्दा कस्बे में जाइए। वहाँ मई-जून की गर्मियों में भी पंखे नहीं चलते थे, कूलर नहीं लगाये जाते थे। ऊँचाई के कारण स्वतः ही तापमान कम रहता है। गोगुन्दा की ऊंचाई आबू पर्वत से कुछ ही कम है। लेकिन अब वहाँ भी पहाड़, नंगा होने के कारण बहुत गर्मी पड़ने लगी है।
अरावली की यह गाथा प्राचीन है, अति प्राचीन; किन्तु आधुनिक काल में भी इतिहासकार बताते हैं कि सिकन्दर के आक्रमण के समय भी राजस्थान आज की तरह सूखा नहीं था। काफी हरियाली थी।
आज अरावली पर्वत और इसकी छोटी-मोटी शाखाएं राजस्थान के 19 जिलों में फैली हैं। इसे हम अरावली क्षेत्र के नाम से जानते हैं। इस भू-भाग का कुल क्षेत्रफल 43,000 वर्ग किलोमीटर है।
अरावली कच्छ के रन से पूर्वी तुर्किस्तान तक के बिस्तृत आकार को तो प्राकृतिक शक्तियों ने छिन्न-भिन्न कर आज एक पहाड़ी के रूप में कर दिया है। फिर भी यह पहाड़ी अपनी गोद में बसने वालों के लिए अभी कल तक जीवनदायिनी रही है, लेकिन सभ्यता के विकास के दौरान चन्द स्वार्थी लोगों ने इसके बचे खुचे स्वरूप को भी बिगाड़ना और इसकी गोद में बसे आदिवासियों को उजाड़ना शुरू कर दिया है। ऐसा करते समय न तो इन स्वार्थ-लोलुपों को यह ही ध्यान रहा कि बेसहारा लोगों को उजाड़ने, अरावली के जंगलों को काट-काटकर उसे नंगा कर देने, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के संतुलन को बिगाड़ने से उन्हें क्या मिल जायेगा । क्षणिक सुख के प्रलोभन में सुख के स्रोत को ही समाप्त करने में कौन-सी नैतिकता है? कौन-सी बुद्धिमानी है? भविष्य को बिगाड़ने में उनके कौन-से स्वार्थ निहित हैं? यह तो ठीक वैसा ही है, जैसे रोज सोने का एक अण्डा देने वाली मुर्गी को, सभी अण्डे एक साथ ही प्राप्त करने के मूर्खतापूर्ण लालच में, मुर्गी को ही हलाल कर देना।
सरकार और धनपतियों की मिलीभगत से आज अरावली का जो सर्वनाश किया जा रहा है, उसी का यह परिणाम है कि राष्ट्रीय वन-नीति की अनुपालना भी नहीं की जा रही। राष्ट्रीय वननीति का यह स्पष्ट कथन है कि पहाड़ी क्षेत्रों में 66 प्रतिशत भूमि पर वन होने चाहिए। इस नीति का उल्लंघन करने का ही परिणाम है कि आज अरावली क्षेत्र में मात्र 6 प्रतिशत भूमि पर जंगल शेष हैं। आज अरावली के पहाड़ लुट गये हैं।
इस युग में अरावली के विनाश की कहानी आजादी के बाद से प्रारम्भ होती है। आजादी से पहले अरावली आज से कहीं अधिक हराभरा था। अपने निवासियों की सभी आवश्यकताएँ पूरी करने में समर्थ था। आजादी के बाद से जब ’गरीबी हटाओ’, ’विकास की गंगा बहाओ’ जैसे लुभावने नारे लगने लगे, तबसे अरावली का सर्वनाश भी बड़ी तेजी से होने लगा। आज अरावली को उजाड़ बनाने के लिए सरकार के पास भी दो ही रास्ते रह गये हैं- (1) खनन और (2) पेड़ों की अंधाधुंध कटाई।
जहाँ तक खनन का प्रश्न है, अरावली क्षेत्र खनिजों का अपार भंडार है। इन खनिजों में लौह अयस्क, सीसा व जस्ता-सांद्र, टंगस्टन, तांबा, बेरिलियम, राक फास्फेट, जिप्सम, अभ्रक, एस्बेस्टास, फेल्स्पार, पन्ना, तामड़ा या गारनेट, बेराइट्स, कैल्साइट, सिलिका सैंड, संगमरमर, अन्य इमारती पत्थर, लिग्नाइट (कोयला), खनिज तेल प्रमुख हैं।
इन खनिजों में से अधिकांश अरावली के पहाड़ी क्षेत्र में हैं जिनका दोहन कानूनी तथा गैरकानूनी ढंग से किया जा रहा है। परिणाम यह है कि लोगों को उनके घरों से उजाड़ा जा रहा है। उन्हें उन्हीं खानों में मजदूरी कर अपना जीवन नष्ट करने, महिलाओं की अस्मत लुटाने, बीमारियों से जूझने तथा बच्चों का भविष्य अंधकारमय करने को विवश किया जा रहा है।
वनस्पति की दृष्टि से भी अरावली क्षेत्र भरपूर रहा है और आज भी है। इसमें सभी तरह के वन पाये जाते हैं, जिनसे इस क्षेत्र. के निवासी अपना जीवन-यापन करते थे। इन वनों में खेजड़ी, जाल, बबूल, कैर, रोहिड़ा से लेकर आम, गूलर, खेर, बरगद, जामुन, धोकड़ा, सरेस, अम्बरतरी, रोहिड़ा, पीपल, कुरौंदा, आंवला, बांस, बहेड़ा, खिरनी, धमल, तेंदू, सेमल, नीम, सालर, सागवान, महुआ, पारस आदि के वृक्ष मिलते हैं, जिनसे दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति यहां के निवासी करते आये।
इनके अतिरिक्त वनों की प्रमुख गौण उपजें हैं- गोंद, शहद तथ मोम, कत्था, आवल (इसकी छाल का उपयोग चमड़ा साफ करने के काम आता है), बांस के उत्पादन, तेंदू की पत्तियाँ, खस आदि।
वनों की अंधाधुंध कटाई से उनमें रहने वाले आदिवासियों का जीवन अंधकारमय किया जा रहा है। विकास के नाम पर यहाँ के जंगल, जमीन और जीवन को विनाश की ओर धकेला जा रहा है। इस विनाशोन्मुख प्रक्रिया में वन-विभाग भी कम दोषी नहीं। अरावली क्षेत्र में हरिबाली लाने के नाम पर या खनन आदि के नाम पर व्यर्थ खर्च किया जा रहा है। इस कार्य के लिएभवनों, नई गाड़ियों, नई सड़कें बनाने, नये यंत्रों की खरीद से एक विशेष सुविधा सम्पन्न लोगों को ही लाभ मिल रहा है। यहाँ के निवासी तो बेघर हो रहे हैं। साथ ही वनों की अंधाधुंध कटाई से बढ़ते रेगिस्तान को और आगे बढ़ने का खुला निमंत्रण मिल रहा है। पर्यावरण बिगड़ रहा है। वर्षा का औसत घट रहा है। पहले जहाँ इस क्षेत्र में वर्षों साल के 120 दिन होती थी, अब मात्र 30-40 दिनों तक सीमित रह गई है। मौसम की कठोरता बढ़ रही है। वनों के फूहड़पन से बेइन्तहा विनाश से यहां के आदिवासियों का जीवन खतरे में पड़ गया है। ये बन जो कभी श्रद्धा की दृष्टि से देखे जाते थे, जहां प्राचीन काल में धार्मिक स्थलों की स्थापना हुई, आज अंग्रेजियत के विलासिता और कुकृत्यों के गढ़ बनते जा रहे हैं। कथोड़िया जैसी कई वन्य जातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। वन्य जीवों की संख्या निरन्तर घटती जा रही है। अब वे चन्द इने-गिने अभयारण्यों तक सीमित होते जा रहे हैं। बनों से प्राप्त होने वाली कीमती इमारती लकड़ी, जड़ी-बूटियों, व्यापारिक उत्पादों आदि का स्रोत ही समाप्त किया जा रहा है।
लोगों, स्थानीय नेताओं, प्रबुद्ध वर्ग, सरकारी अधिकारियों ने जो सहयोग दिया, जो उत्साह दिखाया और जो संकल्प लिए उनको देखते हुए यह आशा बंघती है, उत्साह बढ़ता है कि लोकतंत्र में लोक की आवाज अपना स्वर बुलंदी से उठायेगी और एक न एक दिन राजस्थान के जन-जीवन को समुन्नत बनाने, यहाँ के पर्यावरण और पारिस्थितिकी का संतुलन बनाये रखने वाले और अरावली को पुनः हराभरा करने का निर्णय लेकर जो लोग आज कदम बढ़ा रहे हैं, उनके आगे निहित स्वार्थों, चाहे सरकार के हों या चन्द चांदी के टुकड़े बटोरने वाले हों, को नतमस्तक होना पड़ेगा। पर इन सारी बातों का दोष केवल सरकार के मत्थे मढ़ना ही ठीक नहीं। लोग भी क्षणिक भुलावे में आकर अपना भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरण विशेषज्ञ।
