अरावली के आंसू – 50 वर्षों की कहानी (भाग – 1)
– डॉ राजेंद्र सिंह*
पिछले 50 वर्षों से अरावली के नंगेपन एवं बिगड़ते स्वरूप से दुःखी व चिन्तित हैं। पहले तो जगह-जगह शिविर-सम्मेलन करके अरावली की पारिस्थितिकी सुधार हेतु वृक्षारोपण, भू-संरक्षण व जंगल-संरक्षण के लिए जयपुर में 1975 से 1980 तक युवाओं को तैयार करने का काम करता रहा। 1982 में जमुवारामगढ़ के सानकोटड़ा में खनन के लिए कटते जंगलों को देखा था। वहाँ इस बरबादी को रोकने हेतु भावनी, कालीखोर, थली, बोरोदा, नीमला, श्रीनगर, डिगोता आदि गाँवों में बहुत से शिविर युवाओं के साथ आयोजित किये थे। 1980 से 1985 तक जयपुर के दौसा – जमुवारामगढ़ क्षेत्र डिगोता खान्या वस्सी में क्षेत्र के युवाओं को खनन के दुष्प्रभाव सेलिकॉसीस आदि बीमारी से बचने के उपाय भी सिखाए ।
1985 में अलवर जिले के थानागाजी, भीकमपुरा, गोपालपुरा, किशोरी, सूरतगढ़ माण्डलवास, भांवता, देवरी, राडा आदि गाँवों में जल-जंगल-जमीन संरक्षण का सृजनात्मक कार्य शुरू किया। 1987-88 में राजगढ़ तहसील के तिलवाड़ी, तिलवाड़, गोवर्धनपुरा, मल्लाना तथा पालपुर गाँव में खनन कार्यों में लगे मजदूरों के साथ रहकर काम करने का अवसर मिला। इनसे ही सीखा और खनन से बचाव की चर्चा करते रहे।
पहले तो हम यह मानते थे कि खनन से केवल पर्यावरण का मामूली सा नुकसान होता होगा, लेकिन गरीब लोगों को रोजगार देता है, राष्ट्र विकास के लिए पूँजी निर्माण करता है। इसलिए खनन जरूरी काम है, लेकिन खनन में लगे परिवारों में रहने उनके जीवन के कष्टों को समझने से हमारा विचार बदला।
हमने देखा खनन में लगे मजदूर तो मालिक थे अब ये मजदूर बन गये हैं। मजदूर भी भरपेट खाने वाले नहीं बल्कि भूखे पेट काम करने से कुपोषण का शिकार होकर 35-40 वर्ष की उम्र में ही अपने जीवन को समाप्त करने वाले बन गये हैं। जिन क्षेत्रों में खनन चल रहा है, वहाँ का परिवेश तथा पर्यावरण दोनों ही बिगड़ गये हैं। बिगड़ते-बिगड़ते ऐसे हालात हो गये हैं, जहाँ से वापस लौटना मुश्किल है, बिगड़े हालात को सुधारना मुश्किल है। यह सब आगे भी ऐसे ही बिना सोचे-समझे धापं-धुपं इसी प्रकार चला तो सब कुछ नष्ट हो जायेगा।
1988-89 में इस सब पर विचार हेतु नीलकण्ठ में एक शिविर आयोजित किया। गाँव में अखण्ड रामायण पाठ आयोजित करके जंगलात विभाग के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश किया। विभाग एक तरफ जंगल की जमीन पर खनन कराने हेतु पेड़ काटने तथा खनन पट्टों के लिए स्वीकृति दे रहा था दूसरी तरफ जंगल में रहने वाले लोगों को जंगल से बाहर निकालने के लिए कार्यवाही कर रहा था। इस सब पर सरिस्का वन क्षेत्र में बसे 22 गाँवों तथा इसके वफर तथा पैरीफैरी क्षेत्र में बसे 165 गाँवों के साथ खुलकर लम्बी चर्चा हुई।लोगों ने जब इस सब पर सवाल खड़े किये तो विभाग ने 377 ग्रामीण व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी थी।
ग्रामीण तथा विभाग में दूरी बढ़ने लगी। इसे कम करने के लिए गाँव-गाँव में रामायण पाठ आयोजित हुए, इनमें विभाग के वनकर्मी तथा ग्रामीण दोनों ने समान रूप से शिरकत की, आपस में बातचीत हुई तो अपनें आपसी वैर-भाव भुलाकर दोषी व्यवस्था को ठीक करने का संकल्प लिया गया। इस संकल्प को साकार करने हेतु 14 जनवरी से 21 जनवरी 1990 तक भर्तृहरि जंगल में संरक्षण यज्ञ का आयोजन हुआ। इस यज्ञ में पहाड़ों तथा जंगल की रक्षा हेतु जंगल क्षेत्रों में चल रहे खनन को बन्द कराने का संकल्प हुआ।
साथ ही साथ खनन क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूरों के विषय में भी गम्भीरता से विचार किया गया। मजदूरों का संगठन बनाना उनके स्वास्थ्य परीक्षण आदि का काम शुरू हुआ। खान मालिकों ने इस प्रयास को निष्फल करने के सभी प्रयास किये। तरुण भारत संघ के महामंत्री, कार्यकर्ताओं की हत्या तक के प्रयास किये। लेकिन मजदूर दिखाने के लिए खान मालिकों के साथ थे, मन से हमारा साथ दे रहे थे। इसीलिए खान मालिकों का कोई दुष्प्रयास सफल नहीं हुआ।
मजदूरों ने ही मल्लाणा गाँव में तथा आसपास में जिस वनभूमि पर खनन चल रहा था, उसे बन्द कराने हेतु ’सत्याग्रह’ किया था। पालपुर में भी लोगों ने सड़क रोककर खनन बन्द किया था । इससे हमारा उत्साह बढ़ा। खनन बन्द होने पर विकल्प रोजगार के लिए वृक्षारोपण हेतु वन विभाग पर दबाव बनाकर क्लोजर बनवाने का काम किया था। साथ ही साथ ज़ोहड़ व चैक डैम, खेत सुधार का काम शुरू किया।
खनन के कारण बिगड़े खेतों में भी चैक डैम, एनिकट, बाँध-जोहड़ आदि का निर्माण कार्य किया। यहाँ के सफल प्रयोग ने यहाँ के समाज के मन में एक उत्साह पैदा किया। अरावली क्षेत्र में चल रही पत्थरों की लूट-खसोट से जो अरावली पर्वत मालायें निर्वस्त्र हो गई थी, रोने लगी र्थी। अरावली के आँसू इसी कहानी को प्रकट करते है।
तरुण भारत संघ ने 1985 से जनवरी 2026 की शुरुआत तक 15,800 से अधिक जल संरचनाओं का निर्माण कर 23 सूखी और मृतप्राय नदियों को पुनर्जीवित किया। इस प्रयास से लगभग साढ़े बारह लाख लोगों को, जो पानी के अभाव, बेरोज़गारी, बीमारी और बेबसी के कारण अपने गाँव छोड़ने को मजबूर हो गए थे, दोबारा अपनी भूमि पर लौटकर खेती करने का अवसर मिला। ये वे लोग थे जो खनन बंद होने के बाद बेरोज़गार हो गए थे।
पिछले पचास वर्षों में तरुण भारत संघ ने 10,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण, वन संरक्षण तथा प्रकृति और संस्कृति के समन्वय से एक ऐसा कार्य किया, जो दुनिया में अनोखा है। नदियों के पुनर्जीवित होने से समाज में नई चेतना आई और लोगों ने अपनी भूमि को सुधारकर खेती फिर से शुरू की। इस व्यापक परिवर्तन से हरियाली बढ़ी और उसी हरियाली ने जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और उसके प्रभावों के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जहाँ पहले वर्षा नहीं होती थी, बादल आकर बिना बरसे लौट जाते थे, वहीं अब अच्छी बारिश होने लगी है। जिन क्षेत्रों में पहले एक भी फसल नहीं होती थी, वहाँ अब तीन फसलें उगाई जा रही हैं। हमने अपने काम की शुरुआत खनन बंद करवाने से की और अरावली पर्वतमाला को पुनर्जीवित कर उसे फिर से हरा-भरा बनाने का प्रयास किया। इससे अरावली क्षेत्र के लोगों को सुख, समृद्धि और शांति की ओर अग्रसर होने का मार्ग मिला।
इस कार्य का अध्ययन विश्व के अनेक बड़े वैज्ञानिकों ने किया है। विभिन्न विश्वविद्यालयों के दर्जनों विद्यार्थियों ने इस विषय पर पीएचडी की है और पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि हमारा तरुण भारत संघ दुनिया का एकमात्र ऐसा संस्थान है जिसने यह सिद्ध किया कि जल ही जलवायु है और जलवायु ही जल है। स्थानीय और पारंपरिक आदिज्ञान के आधार पर जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन का यह कार्य सफलतापूर्वक किया गया। तरुण भारत संघ ने इसी आदिज्ञान से सीख लेकर समाज को स्वावलंबन, स्वाभिमान और स्वराज्य के मार्ग पर आगे बढ़ाया है।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरण विशेषज्ञ।
