– डॉ. राजेन्द्र सिंह*
अरावली ने उठाई संरक्षण की पुकार
अरबों वर्षों से अपनी हरियाली, स्वच्छ जल, अनाज और स्थिर जलवायु के माध्यम से जीवन देने वाली अरावली आज भी बोल रही है। लेकिन उसके बेटे-बेटियों—त्रिगुट, यानी विधायीपालिका, कार्यपालिका और उद्योगपतियों—के लालच ने इसे जीते-जी लूटने की योजना बना दी है। यदि इसे रोका नहीं गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ अरबों साल की प्राकृतिक विरासत से वंचित हो जाएँगी।
हमारे समाज में संन्यास और वानप्रस्थ का सम्मान है। संन्यास अवस्था केवल त्याग और सेवा की होती है, इसमें कोई लालच या कमाई नहीं होती। बाल्यकाल और युवाकाल में शरीर या अंग टूटने पर उसे पुनः उपयोगी बनाया जा सकता है, लेकिन संन्यास में ऐसा संभव नहीं। अरावली भी इसी संन्यास जैसी है। उसके अंगों, संसाधनों और पारिस्थितिकी का संरक्षण ही उसकी स्थायी शक्ति है।
2026 में अरावली की आवाज़ अब बुलंद हो रही है। संन्यासी की बुलंद आवाज़ अर्थपूर्ण होती है, और अरावली की संन्यास सेवा में लगे लोग अब उसकी अच्छी आवाज़ बन गए हैं। संरक्षणकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने इसे जनता तक पहुँचाया, जिससे त्रिगुट ने सुनकर अपना लालच कम करने का पहला बड़ा कदम बढ़ाया। यह दिखाता है कि संवेदना और प्रतिबद्धता के सामने लालच भी पीछे हट सकता है।
अरावली की सेहत बिगाड़ने वाले कामों पर न्यायपालिका ने अस्थाई रोक तो लगा दी है। यह रोक आज के हालात देखकर समझ में आया है। संन्यास सेवा का भावी शुभ-लाभ समझा दें। अरावली की हरियाली प्रदूषण मुक्त हवा, पीने लायक जल, खाने के लिए अन्न, स्वस्थ रहने हेतु जलवायु परिवर्तन, अरावली को चढ़ते बुखार, मौसम के बिगड़ते मिजाज को ठीक करने के लिए लंबे समय तक संपूर्ण प्रकृति व संस्कृति को समृद्ध एवं पोषित करती रही है। अब अरावली मां से कमाई की चाह रखना भारत की पहचान बदलने या नीचे गिराने जैसा होगा। हम पोषित करने वालों को वृद्ध आश्रम में भेजना पाप समझते हैं। अब अरावली की वानप्रस्थ एवं संन्यास अवस्था में इसके अंगों को काटकर, अपनी लालची लालसा पूरी करना उचित नहीं है। यह शोभनीय एवं लाभकारी नहीं होगा।
अरावली की संतान ने संकल्प लिया है कि मां का अधिकार मां को ही मिलेगा। 1980 से 2004 तक खनन और विधायी दबावों के बावजूद न्यायपालिका की सहायता से अरावली ने अपने अधिकार सुरक्षित रखे। आज भी वर्ष 2026 में यह स्पष्ट संदेश जा रहा है कि संरक्षण ही उसकी स्थायी विरासत को बचा सकता है।
अरावली ने अरबों वर्षों में जो खनिज और प्राकृतिक संसाधन जुटाए हैं—कॉपर, यूरेनियम, लोहा, पीतल, एलुमिनियम, मार्बल, ग्रेनाइट—वे केवल हमारी पीढ़ी के लिए नहीं हैं। इन्हें वैसा ही अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ना हमारी नैतिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। जो मिला उसको वैसा ही अरावली अगली पीढ़ी को नहीं दिया तो अगली पीढ़ी के लोग कृतघ्न कहलाएंगे। ऐसा आरोप हमें नहीं लेना है। अरावली का अधिकार अरावली को देकर जाएंगे। इसलिए विरासत में मिली अरावली को विरासत मानकर जैसी मिली वैसी ही छोड़कर जाएंगे।लालच में इसका उपयोग करना प्रकृति का हनन और हमारी परंपरा का उल्लंघन होगा।
संरक्षणकर्ता और नागरिक संगठन जानते हैं कि केवल देखभाल और संवेदना ही अरावली को जीवित रख सकती है। हरियाली, स्वच्छ जल, अन्न उत्पादन और जलवायु संतुलन इसके अस्तित्व की रक्षा करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करते हैं। अरावली की आवाज़ अब दिन-ब-दिन और बुलंद हो रही है। मां के अधिकार की रक्षा, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पीढ़ियों के लिए विरासत को सुरक्षित रखना ही हमारी प्राथमिकता है।
अरावली की संतान अब पूरी तरह इसके संरक्षण और सुरक्षा में जुट चुकी है। त्रिगुट के दबावों के बावजूद यह स्पष्ट है कि लालच के खिलाफ अरावली की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती। संवेदना, सतत सेवा और प्रतिबद्धता ही अरावली की स्थायी रक्षा सुनिश्चित करेंगे और उसकी विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएंगे।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता। प्रस्तुत लेख उनके निजी विचार हैं।
