अरावली का दर्द-4: खनन बनाम जीवन की लड़ाई
– डॉ राजेंद्र सिंह*
कौन बचाएगा अरावली?
अरावली भारत की प्राचीनतम प्राकृतिक ढाल है—नदियों की जननी, वर्षा की साधक और सभ्यता की पोषक। सदियों से यह संस्कृति, जल और जीवन के संरक्षण की आधारशिला रही है। पर विडंबना यह है कि आज अरावली पर सबसे बड़ा संकट बाहरी आक्रांताओं से नहीं, बल्कि उसके संरक्षक कहे जाने वालों से ही उत्पन्न हो रहा है। शासन और उद्योग के गठजोड़ ने उसे लाभ की दृष्टि से देखने की परंपरा को इतना मजबूत कर दिया है कि इसके पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और मानवीय मूल्य पीछे धकेल दिए गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में हाल की घटनाएं अरावली के भविष्य पर गहरा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं।
20 नवंबर 2025 को उच्चतम न्यायालय ने सरकारों को ही अरावली में खनन करने हेतु जिम्मेदारी दे दी है। सरकारी अधिकारी, खनन उद्योगपति, व्यापारी और नेता एकजुट होकर इसकी हत्या करने की सारी तैयारी कर चुके हैं। अब चारों तरफ खनन को सुचारू करने में सभी जुटे हैं। इसलिए भारत सरकार का वन, जलवायु मंत्रालय तथा चारों राज्य सरकारें केवल उद्योगपतियों के लाभ हेतु ही ज्यादा चिंतित दिखाई दे रही हैं। इसी कारण अरावली में अन्याय सक्रिय है।
यदि सरकार अरावली पर अरावली की प्रकृति और संस्कृति रूपी विरासत को संरक्षण प्रदान करती, तो इस प्रकार के एफिडेविट और सरकारी रिपोर्ट तैयार नहीं होतीं। 100 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियां कट गईं—ऐसी बुनियादी बात को मान्यता मिलनी चाहिए थी, पर नहीं मिली। सरकारी वकीलों ने केवल खनन उद्योगों के लाभ हेतु ही काम किया है। फरवरी के लोगों, पर्वतमाला के जंगलों, जंगली जानवरों, पेड़-पौधों, घास, मिट्टी के स्वास्थ्य और सुरक्षा का कोई विचार नहीं किया गया है। स्वास्थ्य और सुरक्षा तो अरावली के पुनर्जीवन तथा सतत विकास का रास्ता है। यही रास्ता सभी के लिए शुभ और सुरक्षित है। यदि सरकारें इसी रास्ते पर चलने का प्रयास करतीं, तो न्यायालय में अरावली को न्याय मिल जाता।
सरकारों का “खनन सतत विकास” का नारा सत्य नहीं है—वह हिंसक है। अरावली स्वयं खनन की इजाजत स्वीकृत कर देती, यदि हमारी सरकारें खनन हेतु कुछ एक-दो क्षेत्र चुनकर पर्यावरण सुरक्षा के साथ खनन करतीं—ऐसे क्षेत्र जहां से पश्चिम की रेतीली हवाएं राजधानी क्षेत्र को प्रभावित न करें और दिल्ली का प्रदूषण न बढ़े। खनन सामग्री से चारों तरफ बीमारी, बेकारी या लाचारी नहीं बढ़नी चाहिए—ऐसा आज तक किसी भी खनन क्षेत्र में करके नहीं दिखाया गया है। पूरे भारत में खनन ने मूल निवासियों को उजाड़ने और उन्हें बीमार करने का ही काम किया है। खनन ने सभी राज्यों के प्राकृतिक समृद्धि क्षेत्रों में प्रदूषण, अतिक्रमण और शोषण करके उन्हें उजाड़ दिया है।
बच्चों को जन्म देने वाली स्त्री और नदियों को जन्म देने वाली अरावली — दोनों को एक ही माना गया है। इसलिए अब अरावली को बचाना सबसे पहली प्राथमिकता बननी चाहिए। अरावली के गर्भ से सैकड़ों नदियों का जन्म हुआ है, जो खनन एवं जल-शोषण के कारण सूख गई थीं। तरुण भारत संघ ने पिछले 50 वर्षों में दर्जनों नदियों को पुनर्जीवित किया है। जब नदियाँ सूखती हैं, तभी सभ्यता और संस्कृति भी कमजोर पड़ने लगती है। हमारी सभ्यता, संस्कृति और सरिता का बहुत गहरा संबंध है। इसी संबंध के कारण नर से निर्मित नारी और नदी को एक ही माना गया है।
समुद्र के खारे जल को सूर्य वशीकृत करके भाप बनाता है। बादल भी जल के गैस-रूप ही हैं। बादलों को पुनः जल में बदलने का काम भारत की रेतली अरावली करती है, जो कि एकमात्र आदि पर्वतश्रेणी है। यह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाले बादलों के सामने आदि (आड़े) खड़ी होकर उन्हें वर्षा में परिवर्तित करती है। अरावली भारत के ब्रह्मा-रूपी भगवान मानी गई है, इसलिए भारत के ऋषियों ने अरावली के मध्य पुष्कर में ब्रह्मा सरोवर और ब्रह्मा मंदिर बनाया था। यह पूरे भारत में एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है।
राजस्थान में जहाँ बादल उठते थे, वहीं अरावली के जंगल उन्हें बरसाते थे। खनन के कारण अरावली का तापमान 3 से 5 डिग्री तक बढ़ जाता है। पहले जयपुर की झालाना डूंगरी में खनन के कारण दोपहर बाद, जयपुर के अन्य हिस्सों की तुलना में, वहाँ का तापमान 1 से 3 डिग्री अधिक रहता था। सर्दियों में भी झालाना का तापमान जयपुर से अलग रहता था।
खनन अरावली की प्रकृति और संस्कृति — दोनों के विरुद्ध है। इससे हमारी पारिस्थितिकी बिगड़ती है। हाँ, कुछ खनन-मालिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, परंतु अधिकतर लोगों को सिलिकोसिस जैसी भयानक बीमारियाँ हो जाती हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है और फिर बीमारी के कारण आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगती है।
अरावली की हरियाली ही हमारी अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी का आधार है। जैसे हमारे शरीर का आधार हमारी रीढ़ है, वैसे ही अरावली भारत की रीढ़ है, इसलिए इसकी सुरक्षा आवश्यक है। अरावली को खनन-मुक्त करना ही भारत की समृद्धि का मार्ग है। समृद्धि केवल आर्थिक ढाँचा ही नहीं है; हमारे जीवन-ज्ञान ने हमें 200 वर्ष पूर्व तक 32% जीडीपी तक पहुँचाया था, तब भारत में बड़े पैमाने पर खनन नहीं था। हमारी खेती, संस्कृति और प्रकृति ने ही हमें समृद्ध बनाए रखा था।
अब अरावली की समृद्धि का ढाँचा खनन में नहीं, बल्कि हरियाली में है। हरियाली से बादल रूठकर बिना बरसे कहीं और नहीं जाते; अरावली में ही अच्छी वर्षा करते हैं। वर्षा का पानी खेतों में खेती करने हेतु रोजगार के अवसर देता है। अरावली के जवानों को अरावली के जल के सहारे खेती-किसानी करने का अवसर मिलेगा।
अब अरावली के भी बुरे दिन आते दिखाई दे रहे हैं। अरावली को बुरे दिनों से बचाने का काम यहां की जनता को बिना डरे ही करना होगा—जैसे पहले भी किया था। अब एक बार फिर से यह काम शुरू करना होगा। अरावली की सच्चाई समझकर काम करने से ही शुरुआत होगी। जब हम अरावली की पीड़ा की सच्चाई समझेंगे, तभी दूसरों को समझा सकेंगे। फिर संगठन शक्ति ही अरावली को सहेजने वाला सत्याग्रह आरंभ कर सकती है। हमारे सामने अरावली की प्रकृति और संस्कृति को मिटाने वाली चुनौती है—और इसका सामना हम सब मिलकर ही कर सकते हैं।
अरावली को न्याय दिलाने हेतु 7 दिसंबर को जयपुर में एक न्यायिक प्रक्रिया शुरू करने का विचार है। खनन किसी स्थान की पानी और जवानी—दोनों को बर्बाद करता है। अरावली को भारत की ‘ढाल’ इसलिए माना जाता है क्योंकि यह भारत की शान—जिसमें पानी और जवानी का संरक्षण रहा है—को बचाती आई है। खनन से अरावली में क्षरण होता है। पानी बह जाता है। क्षरण और कटाव के कारण खेती-किसानी मिट जाती है, जवानी बेरोजगार हो जाती है। तब अरावली में न तो स्त्री-माँ जैसा पोषण करने की शक्ति बचती है, और न ही नदियों-सरिताओं को शुद्ध सदानीरा बनाए रखने वाले जलस्रोत बचे रहते हैं।
जहां-जहां खनन हुआ, वहां के सभी झरने सूख गए थे। जब खनन बंद हुआ तो सभी झरने पुनः पुनर्जीवित होकर बहने लगे। चरनों से जहाजवाली नदी, बागनी, सरस, अरावली, रूपारेल, महेश्वर, शेरनी, देवरा, मनोहर, मतदार आदि नदियां शुद्ध सदानीरा बनकर बह रही हैं। खनन से अरावली बांध बन जाती है। अरावली की प्राकृतिक उत्पादकता बहुत है। इसे बनाए रखने हेतु प्राकृतिक संरक्षण, संवर्धन और कलेक्शन की बहुत जरूरत है। इसकी अनदेखी अब उचित नहीं है।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक। प्रस्तुत लेख उनके निजी विचार हैं।
