— स्वामी प्र.चै. मुकुन्दानन्द गिरि*
प्रयाग का सहज स्नान और धर्म-मर्यादा की रक्षा
1754 ईस्वी में दिल्ली से पेशवा को लिखे अपने पत्र में अन्ताजी मानकेश्वर ने स्पष्ट शब्दों में लिखा—“यवन सन्याशांच्या पालखीस अटकाव करितात, त्यांस शासन करणे अगत्य आहे।” अर्थात्, मुग़ल अधिकारी सन्यासियों की पालकी को रोकते हैं और उन्हें दंडित करना अनिवार्य है।
आज जब प्रशासन ज्योतिष्पीठ की प्राचीन पालकी-मर्यादाओं और प्रोटोकॉल में बाधा उत्पन्न करता है, तब उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानंदः सरस्वती ‘1008’ का अडिग रुख उसी अठारहवीं शताब्दी की पेशवा-कालीन चेतना का आधुनिक रूप है। जैसे कभी अन्ताजी मानकेश्वर ने शास्त्र-मर्यादा की रक्षा के लिए शस्त्र का सहारा लिया था, वैसे ही आज तप, संयम और सत्याग्रह के माध्यम से क्षैतिज-पालकी और छत्र-मर्यादा को जीवंत रखा जा रहा है।
प्रयाग में जब मुग़ल अधिकारियों ने ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य की पालकी को संगम की ओर जाने से रोकने का दुस्साहस किया, तब पेशवा के प्रमुख सेनापति और कूटनीतिज्ञ अन्ताजी मानकेश्वर ने अपनी सेना को स्पष्ट और कठोर निर्देश दिए। उनके पत्रों में दर्ज कथन के अनुसार उन्होंने कहा—यदि मराठा दिल्ली के तख़्त के सामने नहीं झुके, तो जगद्गुरु की पालकी का अपमान कैसे सहन किया जा सकता है। मराठा तोपखाने के सामने मुग़ल सैनिक कुछ क्षण भी टिक न सके और पीछे हट गए। परिणामस्वरूप ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पूर्ण राजकीय वैभव, क्षैतिज-पालकी तथा छत्र-चामर के साथ संगम तक पहुँचे। इतिहास में यह प्रसंग ‘सहज स्नान’ के नाम से जाना गया, जो सनातन की संप्रभुता की सार्वजनिक घोषणा था।
इसी 1750–60 के दशक के कालखंड में, जब ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी रामकृष्ण तीर्थ जी प्रयाग संगम स्नान के लिए पधारे, तब मुग़ल सूबेदारों ने अपनी कुटिलता से उनकी पालकी को रोकने का प्रयास किया। उस समय पेशवा के आदेश पर दत्ताजी शिंदे और मल्हारराव होल्कर ने अपनी सशस्त्र टुकड़ियाँ संगम तट पर तैनात कर दीं। मराठा तोपखाने के भय से मुग़ल सैनिक पीछे हट गए और शंकराचार्य जी ने पूर्ण राजकीय मर्यादा—क्षैतिज-पालकी, छत्र और चामर—के साथ संगम में प्रवेश किया। यह प्रसंग भी ‘सहज स्नान’ की परंपरा का सशक्त प्रमाण बना, जो आज तक ज्योतिष्पीठ की सर्वोच्चता का साक्षी है।
अखंड धर्म-साम्राज्य की पहचान: ज्योतिष्पीठ की पालकी
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ सहित चारों आम्नाय पीठों की मर्यादा सनातन धर्म की अखंडता का मूल आधार रही है। यहाँ पालकी—विशेषतः क्षैतिज-पालकी—छत्र और चामर केवल राजकीय वैभव नहीं, बल्कि उस धर्मसत्ता की संप्रभुता के प्रतीक हैं, जिसे मध्यकाल में मुग़ल सत्ता ने खंडित करने का कुप्रयास किया और अठारहवीं शताब्दी में मराठा पेशवाओं ने अपने शौर्य, नीति और सैन्य बल से पुनः प्रतिष्ठित किया।
यदि इस परंपरा को ‘कल-संख्याने’ अर्थात् कालगणना की शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए, तो अठारहवीं शताब्दी का मध्यकाल सनातन धर्म के पुनरुत्थान का स्वर्ण युग सिद्ध होता है। फरवरी 1735 ईस्वी में, जब पेशवा बाजीराव प्रथम की माता राधाबाई उत्तर भारत की तीर्थयात्रा पर निकलीं, उसी समय मराठा सत्ता ने मुग़ल सम्राटों और स्थानीय नवाबों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि हिंदू धर्माचार्यों की मर्यादा में क्षणमात्र का भी व्यवधान मराठा साम्राज्य को स्वीकार्य नहीं होगा। यही वह ऐतिहासिक रक्षा-सूत्र था, जो समय के साथ और अधिक सुदृढ़ होता गया।
इस क्रम की सबसे निर्णायक कड़ी मई 1751 ईस्वी में जुड़ी, जब पेशवा नाना साहब (बालाजी बाजीराव) ने फर्रुखाबाद के नवाब अहमद ख़ान बंगश को पराजित किया। इस विजय के उपरांत हुई संधि ने प्रयाग और काशी को मुग़ल सूबेदारों के चंगुल से मुक्त कराया। इसी अवसर पर एक ऐतिहासिक ‘सनद’ जारी की गई, जिसमें ज्योतिष्पीठ के आचार्यों की पालकी-मर्यादा को अक्षुण्ण रखने का लिखित वचन दिया गया। सनद में स्पष्ट उल्लेख था— “जगद्गुरुंची पालखी व लवाजमा यांची मर्यादा प्राचीन रीतीप्रमाणे चालावी।” अर्थात्, जगद्गुरु की पालकी और लवाजमा की मर्यादा प्राचीन रीति के अनुसार ही चलेगी।
मराठी शब्द ‘लवाजमा’ का प्रयोग पेशवा-कालीन सनदों में अत्यंत व्यापक और गौरवपूर्ण अर्थ में हुआ है। यह अरबी शब्द ‘लवाज़िम’ का अपभ्रंश है, जिसका सामान्य अर्थ आवश्यक वस्तुएँ है, किंतु राजकीय और ऐतिहासिक संदर्भ में इसका आशय कहीं अधिक व्यापक है। इसमें छत्र और चामर जैसे सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक, अब्दागीर—सूर्य की किरणों से रक्षा करने वाला विशेष राजकीय छाता, निशान और ध्वज, छड़ी और भाले शामिल थे, जिन्हें भालदार और चोपदार धारण करते थे। साथ ही यह उन सभी व्यक्तियों—सन्यासी, ब्रह्मचारी, अंगरक्षक, वाद्य यंत्र बजाने वाले और पालकी उठाने वाले—का भी द्योतक था, जो जगद्गुरु की मर्यादा को मूर्त रूप देते थे। मराठी दस्तावेज़ों में “जगद्गुरुंचा लवाजमा” का सीधा अर्थ उस पूर्ण प्रोटोकॉल से है, जिसे राजकीय मान्यता प्राप्त थी और जो शंकराचार्य के पद को सम्राट के तुल्य प्रतिष्ठा प्रदान करता था।
अठारहवीं शताब्दी में, जब मुग़ल सत्ता अपनी जड़ता और कट्टरता के चरम पर थी, तब हिंदू धर्माचार्यों की इस राजकीय गरिमा को तोड़ने के प्रयास भी तेज़ हुए। प्रयाग संगम पर स्नान के लिए हिंदुओं से जज़िया-सदृश अपमानजनक तीर्थ-कर वसूला जाता था। साथ ही ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य की क्षैतिज-पालकी तथा उनके छत्र-चामर के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया गया, ताकि धर्मसत्ता को राजसत्ता के अधीन दिखाया जा सके।
इन घटनाओं के साक्ष्य पुणे स्थित पेशवा दफ्तर (एसपीडी ) के अभिलेखों में सुरक्षित हैं। एसपीडी खंड 2, पत्र क्रमांक 66 में पेशवा की माता राधाबाई की उत्तर भारत यात्रा तथा प्रयाग-काशी में तीर्थ-कर समाप्त कराने के प्रयासों का विवरण मिलता है। वहीं एसपीडी खंड 21, पत्र क्रमांक 61 के अनुसार, अन्ताजी मानकेश्वर ने मुग़ल अधिकारियों को यह कठोर चेतावनी दी थी कि जगद्गुरु की पालकी का अपमान स्वयं पेशवा का अपमान माना जाएगा। यहाँ उनकी कार्यशैली में ‘शासु अनुशिष्टौ’—अर्थात् राजसत्ता को धर्मसत्ता के अनुशासन में रखने—का सिद्धांत स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
स्पष्ट है कि ज्योतिष्पीठ की पालकी की रक्षा केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि सनातन धर्म की संप्रभुता और गरिमा की रक्षा है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परमाराध्य द्वारा किया जा रहा मर्यादा-रक्षण उसी ऐतिहासिक चेतना का पुनर्जागरण है। इतिहास स्वयं को दोहराता है—यह सिद्धांत यहाँ साकार होता दिखाई देता है। जिस मर्यादा को मुग़ल सत्ता भी भंग नहीं कर सकी, यदि वही मर्यादा आज तथाकथित हिंदू राज्य में खंडित होती है और समाज मौन रहता है, तो यह इतिहास के समक्ष एक कलंक होगा। यह लेख इस बात का साक्षी है कि ज्योतिष्पीठ की पालकी कोई सामान्य सवारी नहीं, बल्कि अखंड धर्म-साम्राज्य की पहचान है। मुग़लों द्वारा लगाया गया प्रतिबंध कल भी अधर्म था और आज की बाधाएँ भी उसी मानसिकता का विस्तार हैं।
*शंकराचार्य के दीक्षित दण्डित सन्यासी शिष्य।
