– डॉ राजेन्द्र सिंह*
प्रकृति से विच्छेद और कलियुग का संकट
मशीनों के बीच खोता प्रकृति का संतुलन
कलियुग, जो वर्तमान का युग है, उसमें आपदाओं के समाधान भी अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीनों में खोजे जाने लगे हैं। यह प्रवृत्ति मनुष्य को प्रकृति से ही नहीं, बल्कि परमात्मा से भी दूर ले जा रही है। जब ‘कल’—अर्थात् मशीन—जीवन के केंद्र में आ जाती है, तब प्रकृति का संतुलन टूटने लगता है। यही कारण है कि आज प्रकृति के तीन पाँव टूट चुके हैं और हम उस समय में खड़े हैं जिसे ‘कलियुग’ कहा गया—जटिलताओं, विच्छेद और असंतुलन का युग।
फिर भी इस युग में संभावनाएँ समाप्त नहीं हुई हैं। यदि मनुष्य अपने ‘कृत’ को प्रकृतिमय बना ले, तो यही कलियुग सतयुग में रूपांतरित हो सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने मूल ज्ञान की ओर लौटें और प्रकृति तथा संस्कृति के योग से बने भू-सांस्कृतिक मानचित्र के अनुरूप क्रान्ति, परिवर्तन और विकास की नई रूपरेखा तैयार करें—वैसी ही कार्य-योजना बनाकर, जैसी मैं स्वयं अपनाकर कार्य कर रहा हूँ।
इस समूचे दृष्टिकोण का केन्द्र पंचमहाभूत हैं—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर। यही सृष्टि के वास्तविक निर्माता हैं, यही भगवान, यही नारायण, यही ब्रह्म हैं। नीर—अर्थात जल—जिसे हम ‘ब्रह्म’ मानते हैं, वही ब्रह्माण्ड के सृजन का मूल है। उसी को केन्द्र में रखकर यदि हम विस्थापन, बिगाड़ और विनाश से मुक्त विकास की योजना बनायें, तो सनातन विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। जटिलताओं से मुक्त होकर सहज, सरल और सादगीपूर्ण जीवन में समता और आनन्द का भाव स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होगा—और यही स्थिति हमें पुनः सतयुग की ओर ले जायेगी।
पंचमहाभूतों से निर्मित प्रकृति ही परमात्मा है—यह वह ‘सत्य’ है जिसे भारतीय विज्ञान और अध्यात्म दोनों ने सिद्ध किया था। जब तक हमने इस सत्य को अपने व्यवहार और संस्कार में जिया, तब तक हमारे पास केवल लिखने के लिए नहीं, बल्कि सीखने और दुनिया को सिखाने की क्षमता थी। उसी कारण भारत सिखाने वाली भूमि बनी और हमने स्वयं को विश्वगुरु माना—और वह वास्तविकता भी थी। किन्तु आज हम उस स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि हमने अपने मार्ग के स्थान पर अनुकरण को अपना लिया है।
भारतीय जीवन में संस्कृति और प्रकृति के योग से ही क्रान्ति, परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया चलती थी। मनुष्य स्वयं को प्रकृति का अंग मानकर जटिलताओं से मुक्त जीवन जीता था। इसी प्रकृति के आवर्तन और परावर्तन को समझकर हमने सम्पूर्ण काल-खण्ड को चार युगों—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग—में विभाजित किया।
सत्ययुग में मनुष्य प्रकृति के अन्य अंगों की भाँति सादगी, सहजता और सरलता के साथ अहिंसक व्यवहार करते हुए जीवन जीता था। उस समय लोभ, लालच, क्रोध, मोह और महत्वाकांक्षा का अस्तित्व नहीं था। किसी के मन में विद्वान या राजा बनने का भाव तक उत्पन्न नहीं होता था।
त्रेतायुग में यह भाव जन्म लेने लगा। प्रकृति के चार पाँवों में से एक पाँव टूट गया, तीन शेष रहे—इसीलिए वह ‘त्रेता’ कहलाया। इस युग में कुछ लोग विद्वान बने, कुछ राजा बने, किन्तु वे अभी भी मोह-माया से मुक्त थे और प्रकृति से जुड़े रहे। राजा जनक का उदाहरण—अकाल से मुक्ति के लिए रानी के साथ स्वयं हल चलाना—इस समन्वय का सजीव प्रमाण है।
द्वापरयुग में यह संतुलन और अधिक विचलित हुआ। मथुरा का राजा कंस आसपास के क्षेत्रों को लूटने लगा। राजा और विद्वानों में धोखेबाज़ी और कलाबाजियाँ प्रवेश कर गईं। प्रकृति के दो पाँव टूट गए—इसीलिए वह द्वापर कहलाया। फिर भी इस युग में कृष्ण जैसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत का सहारा लेकर अतिवृष्टि से उत्पन्न बाढ़ से लोगों और गायों को बचाया। उस समय भी आपदा का समाधान प्रकृति में ही खोजा जाता था—पहाड़ आश्रय थे, जलवायु के सहायक थे। यहाँ तक कि कंस जैसे लुटेरे भी, जब तक सोना निकालने के लिए पहाड़ों को काटना प्रारम्भ नहीं करते, प्रकृति को ही जीवन का आधार मानते थे।
किन्तु आजकल के युग में, हमने उसी आधार को लगभग भुला दिया है। ‘कल’—अर्थात् मशीन और कला—का वर्चस्व स्थापित हो गया है, और इसी से ‘कलियुग’ की संज्ञा सार्थक होती है। परन्तु यदि हम पंचमहाभूतों को पुनः अपने जीवन का केन्द्र बना लें, अपने शरीर और आत्मा को इनके साथ जोड़कर जियें, तो यही कलियुग सतयुग में परिवर्तित हो सकता है। इसके लिए केवल एक संकल्प पर्याप्त है—प्रकृति को परमात्मा ‘सत्य’ मानकर अहिंसामय जीवन जीना।
वैज्ञानिक दृष्टि भी इस सत्य की पुष्टि करती है। लगभग 3.6 खरब वर्ष पूर्व एक महाविस्फोट में अग्नि के गोले से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन अलग होकर पुनः संयोजन में आये और जल का निर्माण हुआ। इसी जल से जीवन की उत्पत्ति हुई, और उसी जीवन ने धीरे-धीरे मिट्टी का निर्माण किया। मिट्टी और जल के संयोग से भूमि, जलीय जीव-जन्तु, वनस्पतियाँ और अन्य जीव उत्पन्न हुए। जब भूमि, पहाड़ और नदियाँ बनीं, तब इन सबको संचालित करने के लिए वायु ऊर्जा के रूप में प्रकट हुई। सूर्य पहले से ही ऊर्जा का स्रोत था, और गगन में वायु का विस्तार जीवन को गति देने लगा।
प्राचीन भारतीयों ने इस समूची प्रक्रिया को समझकर पंचमहाभूतों को ही अपने अध्यात्म और विज्ञान का आधार बनाया। उन्होंने इन्हीं को भगवान, नारायण और ब्रह्म मानकर उनका सम्मान किया। यह कोई कल्पना नहीं, प्रत्यक्ष सत्य है। वायु को प्राण—अर्थात् आत्मा—माना गया, क्योंकि श्वास ही जीवन है। वायु ही आत्मा है। आयुर्वेद में भी आरोग्य की रक्षा हेतु स्वस्थ श्वास को जीवन का आधार बताया गया है।
वायु की यह विशेषता कि वह कभी नष्ट नहीं होती, निरन्तर चलती रहती है, ‘सनातन’ की अवधारणा को स्पष्ट करती है। ‘‘चरैवेति-चरैवेति’’—यह नित्य नूतन निर्माण की अनन्त प्रक्रिया ही सनातन है, जिसका न आरम्भ है न अंत। यही सत्य भारतीयों ने स्वीकार किया।
किन्तु आज स्थिति यह है कि सभी धर्म इस सत्य को समान रूप से स्वीकार नहीं करते, और जो भारतीय इसे स्वीकारते हैं, वे भी इसे अपने व्यवहार में नहीं जीते। वे स्वयं को ‘सनातनी’ कहने का गौरव अवश्य प्राप्त कर लेते हैं, पर उसे जीवन में उतारते नहीं।
मैं सनातनी हूँ। मैं सनातन को जीता हूँ। मैं प्राकृतिक हिंसा नहीं करता। मैं नदियों को पुनर्जीवित करता हूँ। मैं पहाड़ों को नहीं काटता, क्योंकि पहाड़ हमारी धरती माँ के स्तन हैं—
“समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे।।’’
(अथर्ववेद, भूमि सूक्त)
इन्हें बचाने के लिए, अरावली में खनन को रोकने के लिए, मैंने जीवन भर संघर्ष और सत्याग्रह किया है और आज भी कर रहा हूँ। मेरा सनातन ‘जय जगत्’ है—मैं इसे केवल कहता नहीं, जीता हूँ।
*जल पुरुष के नाम से विख्यात जल एवं पर्यावरण विशेषज्ञ।
