— ज्ञानेन्द्र रावत*
पत्रकारिता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का संतुलन
गत दिवस ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट–2026’ के मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका पर बात की, तो उनका स्वर केवल तकनीक के उत्सव का नहीं था, बल्कि आने वाले समय की चेतावनी और संभावना—दोनों का संकेत था। उन्होंने कहा कि आज एआई प्रणालियां पूरी दुनिया में ज्ञान और डाटा का उपयोग कर रही हैं और मानव सभ्यता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एआई केवल नवाचार नहीं रह गई है, बल्कि सार्थक, न्यायसंगत और उपयोगी परिणाम सुनिश्चित कर रही है। नवाचार और समावेशिता के संयोजन से एआई देश के कार्यबल को सशक्त बनाएगी और सही कौशल व तैयारी के साथ युवा भविष्य के कार्य-जगत का नेतृत्व करेंगे।
प्रधानमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि भारत में एआई का “पावर हाउस” बनने की प्रतिभा और उद्यमशील ऊर्जा मौजूद है, इसलिए इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि एआई मानव-केंद्रित बनी रहे और वैश्विक विकास को गति दे।
आज यदि कहा जाए कि कोई भी क्षेत्र एआई के प्रभाव से अछूता नहीं है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। सामाजिक जीवन, विज्ञान, स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, रक्षा और अर्थव्यवस्था—हर जगह इसका हस्तक्षेप दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो आधुनिक सभ्यता अब एआई के बिना सांस ही नहीं ले सकती। किंतु इसी के साथ यह सच्चाई भी सामने आती है कि इसके खतरे कम नहीं हैं और उन पर गंभीर मंथन की आवश्यकता है।
जब यह प्रश्न पत्रकारिता के आंगन में प्रवेश करता है, तब उसका अर्थ और भी गहरा हो जाता है। पत्रकारिता में एआई ने अब केवल दस्तक नहीं दी, बल्कि स्थायी निवास बना लिया है। समाचार की गति बढ़ाने, डाटा विश्लेषण करने और स्वचालित रिपोर्टिंग में एआई लगातार निर्णायक भूमिका निभा रही है। विशेषकर मौसम, वित्तीय सूचनाओं और खेल परिणामों जैसी दैनिक जानकारियों में यह क्षणभर में सटीक तथ्य प्रस्तुत कर देती है। समाचार लेखन, सोशल मीडिया सामग्री के संक्षेपण, अनुवाद और डाटा विश्लेषण में एआई एक दक्ष सहायक के रूप में उभर कर सामने आई है।
फिर भी यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि एआई पत्रकारिता का विकल्प नहीं है, बल्कि एक औजार है। इसकी उपयोगिता पारदर्शिता और नैतिक मूल्यों पर निर्भर करती है। चाहे खोजी पत्रकारिता हो, प्रशासनिक या आर्थिक रिपोर्टिंग हो या सामाजिक सरोकारों से जुड़ी संवेदनशील खबरें—मानवीय संवेदना, करुणा और विवेक की भूमिका वहां अनिवार्य रहती है। इन क्षेत्रों में एआई सीमित है और मानव अनुभव का स्थान नहीं ले सकती।
यह सही है कि समाचार सृजन, संकलन, संपादन और वितरण की प्रक्रिया में एआई ने क्रांतिकारी बदलाव किया है। इससे गति और उत्पादकता दोनों में वृद्धि हुई है। सामान्य लेखन की तुलना में एआई के माध्यम से खबरें कई गुना तेजी से तैयार की जा सकती हैं। इसके टूल्स दावों और सूचनाओं की तथ्यपरक जांच में सहायक होते हैं और कहा जा रहा है कि इसमें लगभग 70 प्रतिशत तक सुधार की संभावना रहती है। यह पाठकों की रुचि के अनुसार समाचार तैयार करने में भी मदद करती है।
रोबोट पत्रकारिता के माध्यम से चौबीसों घंटे समाचार कवरेज, सामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग, स्रोतों की सटीकता की पहचान, समाचार की विश्वसनीयता में वृद्धि, श्रोताओं की प्राथमिकताओं के अनुरूप सामग्री निर्माण और नियमित कार्यों के स्वचालन से पत्रकारों को खोजी रिपोर्ट और गहन विश्लेषण के लिए समय मिल पाता है।
परंतु इसी उजाले के साथ कई परछाइयाँ भी जुड़ी हैं। एआई एल्गोरिदम पर अत्यधिक निर्भरता, रोजगार का संकट, डाटा की गोपनीयता, पूर्वाग्रह और जवाबदेही जैसी चुनौतियां पत्रकारिता के सामने खड़ी हो गई हैं। एआई के आउटपुट में सहानुभूति, नैतिक विवेक और सामान्य मानवीय समझ का अभाव रहता है। यदि सावधानी न बरती जाए तो डाटा आधारित परिणाम भ्रामक और समाज के लिए हानिकारक हो सकते हैं। पारदर्शिता की कमी, तथ्यात्मक जवाबदेही और डाटा एनालिटिक्स से उपजी नई चुनौतियां भविष्य की पत्रकारिता की परीक्षा लेंगी।
यह सच है कि एआई रिपोर्टिंग की प्रक्रिया में बड़े बदलाव ला रही है, लेकिन यह मानव पत्रकारों का स्थान नहीं ले सकती। यह कार्य-प्रवाह को सुव्यवस्थित कर पत्रकारों को विश्लेषण पर केंद्रित होने में सहायता तो कर सकती है, किंतु जटिल व्याख्या, साक्ष्य आधारित रिपोर्ट और सामाजिक संदर्भों की समझ के लिए मानव उपस्थिति अनिवार्य है। इस कमी को एआई कभी पूरी तरह नहीं भर सकती।
जहां तक जेनरेटिव एआई का प्रश्न है, उसका सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि वह दिखाई कम देती है, लेकिन असर गहरा डालती है। इससे ऐसी सामग्री उत्पन्न हो रही है जो मीडिया, इंटरनेट और राजनीतिक संवाद को भ्रामक सूचनाओं और निरर्थक बकवास से भर देती है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म के एक अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में आधे से कम पत्रकार सप्ताह में कम से कम एक बार पेशेवर रूप से एआई का उपयोग करते हैं, जबकि लगभग 62 प्रतिशत इसे खतरे के रूप में देखते हैं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क का मानना है कि युद्ध, जलवायु अराजकता, बढ़ते सामाजिक विभाजन और तेजी से बदलते डिजिटल परिदृश्य के बीच स्वतंत्र प्रेस पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। स्वतंत्र प्रेस ही समाज को आलोचनात्मक सोच और संवाद की दिशा देती है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि एआई सूचना के सृजन, वितरण और उपयोग के तरीकों को पूरी तरह बदल रही है। आज कई देश पत्रकारों और उनके स्रोतों की ऑनलाइन निगरानी के लिए एआई का प्रयोग कर रहे हैं, जो निजता के अधिकार का उल्लंघन है और मीडिया कर्मियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसलिए संवाद, समाचार संकलन और स्रोतों की प्रामाणिकता को लेकर पत्रकारों को पहले से कहीं अधिक सतर्क रहना होगा।
मूल रूप से एआई विचारों, प्रौद्योगिकी और तकनीक के एकत्रीकरण का परिणाम है, जिसकी सफलता सामान्य मानवीय बुद्धिमत्ता पर निर्भर करती है। इसके बिना समाचार की प्रामाणिकता संदिग्ध हो सकती है। यह सच है कि एआई से समाचार जगत की भूमिका में बड़े बदलाव आ रहे हैं, परंतु इसका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से होना चाहिए, पूर्ण निर्भरता के रूप में नहीं।
इस संदर्भ में इंफोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति का वक्तव्य उल्लेखनीय है, जो उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित ‘लीडर्स टॉक’ के अवसर पर दिया। उन्होंने कहा कि एआई काम में भले ही तेज हो, लेकिन इंसानी मस्तिष्क से बेहतर कुछ नहीं। युवाओं को चाहिए कि वे “थिंक विद एआई, बिल्ड विद एआई” के सिद्धांत पर एआई को सहयोगी बनाएं। एआई एक उपयोगी टूल हो सकती है, पर उसे प्रशिक्षित करना मानव के हाथ में है और अंतिम नियंत्रण मानव बुद्धि के पास ही रहेगा।
समाचार संप्रेषण और साझेदारी के क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। यहां एआई पर नहीं, बल्कि अपने विवेक पर भरोसा करना होगा। पत्रकारिता केवल लाभ का साधन नहीं, बल्कि समाज और देश की भलाई का माध्यम है। हम सभी इसके अंग हैं और हमारा दायित्व किसी एक व्यक्ति या समूह के प्रति नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के प्रति है। इसी दायित्व-बोध के साथ अपने पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करना ही सच्ची पत्रकारिता है और यही उसका मूल कर्म भी है।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
