आलू के गिरते दाम और गन्ना संकट पर उठी चिंता
आलू निर्यात नीति और नई गन्ना किस्मों की मांग
नई दिल्ली: देश में आलू के गिरते दाम और उत्तर भारत के गन्ना किसानों के सामने उभरते प्रजाति संकट का मुद्दा केंद्र सरकार के समक्ष उठाया गया है। किसानों की ओर से दिए गए एक ज्ञापन में आलू निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष नीति बनाने तथा गन्ने की नई किस्मों को शीघ्र जारी करने की मांग की गई है, ताकि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके और उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान हो सके।

यह मुद्दा भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात के दौरान उठाया। उन्होंने मंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में आलू और गन्ना किसानों की वर्तमान परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कई सुझाव भी प्रस्तुत किए।
ज्ञापन के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों में इस वर्ष आलू का उत्पादन अधिक हुआ है और औसत उत्पादन लगभग इकसठ मिलियन मीट्रिक टन के आसपास बताया गया है। उत्पादन अधिक होने के कारण कई मंडियों में कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है। किसानों का कहना है कि आलू की उत्पादन लागत लगभग बारह रुपये प्रति किलोग्राम पड़ रही है, जबकि मंडियों में प्रथम श्रेणी के आलू का भाव कई स्थानों पर छह से सात रुपये प्रति किलोग्राम तक रह गया है। इस स्थिति में किसानों को अपनी लागत भी नहीं मिल पा रही है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
ज्ञापन में कहा गया है कि घरेलू बाजार में संतुलन स्थापित करने और किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए आलू निर्यात को तत्काल प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है। इसके तहत सुझाव दिया गया है कि आलू को निर्यात के लिए पूरी तरह मुक्त श्रेणी में रखा जाए और इस पर किसी प्रकार की मात्रात्मक सीमा या न्यूनतम निर्यात मूल्य लागू न किया जाए। साथ ही नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे पारंपरिक बाजारों में निर्यात बढ़ाने के लिए विशेष व्यापारिक पहल करने का सुझाव दिया गया है। इसके अतिरिक्त कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के माध्यम से नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तलाश करने की भी बात कही गई है।
ज्ञापन में यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि आलू निर्यात से जुड़े किसानों और किसान उत्पादक संगठनों को परिवहन, कंटेनर और बंदरगाह शुल्क में विशेष रियायत दी जाए। साथ ही फाइटोसैनेटरी प्रमाणपत्र और सीमा शुल्क स्वीकृति की प्रक्रिया को बहत्तर घंटे के भीतर पूरा करने की व्यवस्था की जाए। जिन राज्यों में आलू का उत्पादन अधिक है वहां से सीधे निर्यात की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ड्राई पोर्ट अथवा कंटेनर सुविधाएं विकसित करने का भी सुझाव दिया गया है।
मुलाकात के दौरान उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के गन्ना किसानों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की गई। ज्ञापन में कहा गया है कि राज्य में व्यापक रूप से उगाई जाने वाली गन्ना प्रजाति को शून्य दो तीन आठ में लाल सड़न रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने और शीर्ष छेदक कीट के नियंत्रण में प्रयुक्त कीटनाशक कोराजन के कम प्रभावी होने के कारण खेती की लागत बढ़ गई है और पैदावार में कमी आई है। किसानों का कहना है कि वर्तमान समय में इस प्रजाति का कोई प्रभावी विकल्प उपलब्ध नहीं है।
ज्ञापन के अनुसार इस प्रजाति के बाद जारी की गई कई जल्दी पकने वाली किस्मों से अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पा रहा है। कुछ किस्मों में गन्ना पतला होने के कारण पैदावार कम बताई गई है, जबकि कई स्थानों पर जंगली जानवरों से भी फसल को नुकसान पहुंचने की समस्या सामने आई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, अमरोहा, रामपुर, बरेली और शामली जिलों में लगभग दस से पंद्रह प्रतिशत किसानों के कम उत्पादन और बढ़ती लागत के कारण पॉपलर जैसी वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करने का भी उल्लेख किया गया है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि राज्य की कई चीनी मिलों का पेराई सत्र पहले की तुलना में छोटा होता जा रहा है और कई मिलें मार्च तक ही पेराई समाप्त कर रही हैं, जबकि पहले यह सत्र मई या जून तक चलता था। पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश के अनेक किसानों की आजीविका गन्ने की खेती पर निर्भर होने के कारण इस स्थिति को चिंता का विषय बताया गया है।
किसानों की ओर से यह भी कहा गया है कि अतीत में क्षेत्र की कई लोकप्रिय गन्ना प्रजातियां कोयंबटूर स्थित गन्ना प्रजनन संस्थान के करनाल केंद्र में विकसित की गई थीं। इसी केंद्र में विकसित दो नई जल्दी पकने वाली प्रजातियां को दो शून्य शून्य एक छह और को दो एक शून्य एक दो के बारे में कहा गया है कि वे पैदावार और शर्करा प्राप्ति के मामले में बेहतर पाई गई हैं। यह भी उल्लेख किया गया है कि इन प्रजातियों का परीक्षण कार्य पूरा हो चुका है और भारतीय चीनी मिल संघ द्वारा वित्तपोषित एक अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत इनके परिणाम सकारात्मक बताए गए हैं।
ज्ञापन में अनुरोध किया गया है कि गन्ने की बुवाई के मौजूदा समय को ध्यान में रखते हुए प्रजाति विमोचन समिति की आकस्मिक बैठक बुलाकर इन दोनों प्रजातियों को विशेष परिस्थितियों में शीघ्र जारी करने के निर्देश दिए जाएं, ताकि किसानों को वर्तमान संकट के बीच एक व्यवहारिक विकल्प मिल सके।
मुलाकात के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दोनों विषयों को सुनने के बाद संबंधित अधिकारियों से आवश्यक जानकारी लेकर उचित कार्यवाही करने तथा किसानों से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन दिया।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
