– गोपाल सिंह*
अरावली संरक्षण: पानी, जंगल और पर्वत की गाथा
अरावली पर्वतमाला राजस्थान के विशाल भू-भाग पर दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में फैली हुई प्राचीन पर्वत शृंखला है। यह राजस्थान के सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपुर, अलवर, दौसा, करौली, सवाई माधोपुर, भरतपुर, सीकर, झुंझुनूँ, पाली, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, नागौर आदि अनेक जिलों को अपनी छाया में समेटे हुए है। गुजरात के हिम्मतनगर से शुरू होकर यह अरावली राजस्थान को पार करती हुई हरियाणा और दिल्ली तक फैल गई है, कुल चार राज्यों के 37 जिलों को छूती हुई।
स्वतंत्रता के बाद जयपुर शहर की तेजी से बढ़ती आबादी को आवास की भारी जरूरत पड़ी। पत्थर और ईंटों की माँग बढ़ने लगी। जयपुर के सबसे नजदीक पत्थरों का स्रोत झालाना डूंगरी था। पर्यावरण की कोई चिंता किए बिना वहाँ बड़े पैमाने पर खनन शुरू हो गया। इससे जयपुर शहर का वातावरण और स्वास्थ्य दोनों बुरी तरह प्रभावित होने लगे। उस क्षेत्र का तापमान सामान्य से तीन डिग्री अधिक हो गया था।
अरावली संरक्षण के प्रारंभिक प्रयासों में तरुण भारत संघ ने झालाना डूंगरी के अवैध खनन को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। जब खनन पर रोक लगी और उस क्षेत्र में जल-जंगल संरक्षण तथा संवर्धन का काम शुरू हुआ, तो चमत्कार सा हो गया। जहाँ पहले तापमान सामान्य से तीन डिग्री ऊपर था, वहीं अब सामान्य से तीन डिग्री नीचे आ गया। इस एक बदलाव ने पूरे अरावली क्षेत्र में लोगों को पर्वत और जंगल संरक्षण के महत्व का गहरा बोध कराया।
इस सफलता के बाद अरावली संरक्षण अभियान को और विस्तार मिला। 1982 में दौसा क्षेत्र के भावनी, कालीखोर, थली, बोरोदा, नीमला, श्रीनगर, डोगोता आदि गाँवों में युवा शिविरों, ग्राम सभाओं और क्षेत्रीय सम्मेलनों के माध्यम से अरावली चेतना जगाने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज भी निरंतर जारी है।
1985 में अरावली क्षेत्र के अलवर जिले की थानागाजी तहसील के किशोरी-भीकमपुरा गाँव में स्थायी रूप से काम शुरू किया गया। यहाँ रहकर अरावली संरक्षण के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संगठन के कार्य भी जोड़े गए। गोपालपुरा गाँव के श्री मांगू पटेल से वर्षा जल संरक्षण की कला सीखकर अरावली क्षेत्र में पानी के संरक्षण का प्रत्यक्ष काम भी शुरू हो गया। पानी का काम केवल उन गाँवों में किया जाता था, जहाँ स्थानीय लोग स्वयं अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने की पहल करते थे। इस प्रकार अरावली संरक्षण और जल संरक्षण दोनों अभियान एक-दूसरे से जुड़कर चलने लगे। धीरे-धीरे यह प्रयास अरावली पर्वत मालाओं के साथ-साथ मरुस्थलीय क्षेत्रों तक भी फैल गया।
1987-88 के आसपास अलवर जिले के टहला क्षेत्र के खनन प्रभावित गाँवों में जब जल-जंगल-जमीन संरक्षण का काम शुरू हुआ, तो स्थानीय बुजुर्ग किसानों ने एक गंभीर समस्या उजागर की। मार्बल की खदानों की गहराई कुओं से भी अधिक थी। इसलिए कितना भी जल संरक्षण किया जाए, कुओं में पानी नहीं बढ़ पाता था। अतिरिक्त पानी नीचे जाकर गहरी खदानों में चला जाता था। भूजल संकट गहराने पर किसान अपनी खेती छोड़कर खदानों में काम करने लगे। जमीन के मालिक मजदूर बन गए। वे भरपेट भोजन भी नहीं पाते थे। भूखे पेट काम करते-करते कुपोषण और सिलिकोसिस जैसी बीमारियों का शिकार होकर मात्र 35-40 वर्ष की उम्र में ही जीवन समाप्त कर बैठते थे। पूरा क्षेत्र उजड़ने लगा। खनन उद्योग विनाश का कारण बन गया।
1985 से 1990 के बीच सरिस्का के जंगलों को बचाने के प्रयासों में तरुण भारत संघ और वन विभाग के बीच गंभीर विवाद खड़ा हुआ। वन कर्मचारी सरिस्का के गाँवों में बसने वाले लोगों से पशु चराई के नाम पर घी, अनाज और नकद रिश्वत वसूलते थे। जब गाँववालों को सलाह दी गई कि चराई माँगने पर रसीद जरूर माँगें, तो वन कर्मचारी बौखला गए। उन्होंने गाँववालों को तरह-तरह से परेशान करना शुरू कर दिया और उनके सामान का आवागमन बंद कर दिया।
वन विभाग ने तरुण भारत संघ के कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों पर जंगल काटने, जंगली जानवर मारने और उनकी खाल बेचने जैसे झूठे मुकदमे दर्ज कर दिए। एक मामले में तरुण भारत संघ के महामंत्री राजेन्द्र सिंह और एक अन्य कार्यकर्ता पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने देवरी गाँव के जंगल में शिकार किया और जानवरों की खाल बेचने की कोशिश की। संयोग से उसी दिन दोनों अलवर जिले के इन्दोख गांव में चिड़ावतों के गुवाड़े में गाँववालों के साथ बैठक में उपस्थित थे, जिसमें स्थानीय खुफिया ब्यूरो (एल.आई.बी.) पुलिस कक्ष के दो पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। जब राजेन्द्र सिंह जी को आरोप पत्र मिला, तो उन्होंने उस तिथि की बैठक की पुलिस रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी। इससे वन विभाग का असली चेहरा सामने आ गया। वे लज्जित हुए, लेकिन फिर भी तरह-तरह के मुकदमों के जरिए कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों को परेशान करते रहे।
इन चुनौतियों और विरोधों के बावजूद अरावली संरक्षण अभियान और अधिक मजबूत होकर निरंतर आगे बढ़ता रहा।
