– डा. संजय राणा*
उत्सव से परे: राम और गंगा की पुकार
भारत में राम नवमी केवल दीपों की रौशनी, शोभा यात्राओं और मंदिरों की भक्ति का त्योहार नहीं है। यह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के उन शाश्वत मूल्यों को हृदय में उतारने का पावन अवसर है — त्याग, कर्तव्य, सत्य, संयम और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान। पूरे देश में इस दिन मंदिरों में भक्ति की मधुर धुन गूँजती है, जय श्री राम के उद्घोष आकाश को छूते हैं और लाखों भक्त राम के आदर्शों में डूब जाते हैं।
फिर भी इस दिव्य उत्सव की चमक के बीच एक कष्टदायक सवाल बार-बार हृदय को छलनी कर देता है — क्या हम वास्तव में राम नवमी मना रहे हैं, या सिर्फ उसका बाहरी रूप निभा रहे हैं?
उन्नीस सौ पचासी में आई फिल्म राम तेरी गंगा मैली का वह प्रसिद्ध गीत आज भी रूह को झकझोर देता है — राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते…। जिस गंगा को भगवान राम के पूर्वज राजा भगीरथ ने अपनी कठोर तपस्या से स्वर्ग से धरती पर लाया, वही माँ गंगा आज गंभीर प्रदूषण की मार झेल रही है। रामायण में भगवान राम ने वनवास के दौरान नदियों, वनों और प्रकृति की रक्षा का जो संदेश दिया, वह आज हमारे सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
गंगा कोई साधारण नदी नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है। गंगा घाटी पर देश की लगभग चालीस प्रतिशत आबादी अपनी जीविका और अस्तित्व के लिए निर्भर है। लेकिन तेजी से बढ़ती आबादी, शहरी विस्तार और औद्योगिक विकास ने इस पवित्र धारा को गहरे संकट में डाल दिया है। अनुमानों के अनुसार गंगा घाटी में प्रतिदिन लगभग बारह हजार मिलियन लीटर गंदा पानी उत्पन्न होता है, जबकि उपलब्ध शोधन क्षमता अभी भी काफी कम है। गंगा के किनारे बसे प्रमुख शहरों से प्रतिदिन हजारों मिलियन लीटर गंदा पानी सीधे नदी में गिर रहा है। औद्योगिक प्रदूषण कुल मात्रा में करीब बीस प्रतिशत है, लेकिन इसमें मौजूद रसायन और भारी धातुएँ नदी के जल-जीव तंत्र को बहुत गहरा नुकसान पहुँचा रही हैं।
जो समाज गंगा को माँ कहकर पुकारता है और उसके जल को पापों का नाशक मानता है, उसके लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक और आत्म-प्रश्न खड़ी करती है।
पिछले चार दशकों से गंगा को स्वच्छ बनाने के प्रयास लगातार चल रहे हैं। उन्नीस सौ पचासी के गंगा एक्शन प्लान के बाद दो हजार चौदह में शुरू हुए नामामि गंगे कार्यक्रम ने इसे एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया। अब तक इस कार्यक्रम के तहत सैकड़ों परियोजनाएँ स्वीकृत हुई हैं और इनमें से अधिकांश पूरे हो चुके हैं। नामामि गंगे ने गंदे पानी के शोधन की क्षमता को कई गुना बढ़ाया है। जनवरी दो हजार छब्बीस तक एक सौ तिहत्तर से अधिक गंदा पानी शोधन संयंत्र संचालित हो चुके हैं, जिनकी कुल शोधन क्षमता लगभग तीन हजार नौ सौ छिहत्तर मिलियन लीटर प्रतिदिन है। हजारों गांवों को खुले में शौच मुक्त बनाया गया है और कुछ घाटों पर सफाई का सकारात्मक प्रभाव भी दिखाई दे रहा है।
फिर भी चुनौतियाँ अभी भी बाकी हैं। हालिया नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट में उत्तराखंड सहित कई क्षेत्रों में गंदे पानी प्रबंधन, निगरानी और संयंत्रों के संचालन में गंभीर कमियाँ उजागर हुई हैं। कुछ जगहों पर कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा कई गुना बढ़ गई है और कई संयंत्रों से बिना पूर्ण शोधन का पानी नदी में जा रहा है। दो हजार पच्चीस के महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में भी कुछ घाटों पर जल की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे थे। ये तथ्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि केवल योजनाएँ और बजट ही पर्याप्त नहीं हैं। उनकी सही निगरानी, नियमित रखरखाव और पूर्ण सामाजिक भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
दरअसल समस्या केवल नदी की नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक चरित्र की भी है। भगवान राम का जीवन त्याग और मर्यादा का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने भाइयों के साथ जो प्रेम, त्याग और समर्पण दिखाया, वह आज भी भारतीय परिवारों के लिए सर्वोच्च आदर्श है। लेकिन आज कितने परिवारों में भाइयों के बीच छोटी-छोटी संपत्ति के विवाद अदालतों तक पहुँच जाते हैं? हम सड़कों पर जय श्री राम के नारे लगाते हैं, पर अपने रोजमर्रा के जीवन में सत्य, संयम और कर्तव्य जैसे आदर्शों को अपनाने से कतराते रहते हैं।
आज धर्म के नाम पर दिखावा भी बढ़ता जा रहा है। हम गंगा की भव्य आरती करते हैं, लेकिन उसी नदी में कचरा, गंदा पानी और प्लास्टिक बहा देते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाले फूल, कपड़े और अन्य सामग्री नदियों में प्रवाहित कर दी जाती है। कई उद्योग सामाजिक उत्तरदायित्व के नाम पर दान देते हैं, पर उनका प्रदूषित पानी उसी माँ गंगा में गिरता रहता है। हमारे पूर्वज सीताराम कहकर राम और सीता के संयुक्त आदर्श को याद करते थे — जो परिवार, प्रेम और संतुलन का सुंदर प्रतीक था। आज जय श्री राम का उद्घोष भले ही जोरदार सुनाई दे, लेकिन अक्सर उसमें राम की करुणा और मर्यादा की वह गहराई कम दिखाई देती है।
राम नवमी का सच्चा उत्सव केवल उत्सव मनाने से कहीं आगे है — यह आत्ममंथन और वास्तविक परिवर्तन का अवसर है।
अगर हम सचमुच भगवान राम का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें व्यक्तिगत स्तर पर कदम उठाने होंगे। घर से प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करना, आरती में फूल न बहाना, पड़ोस में जागरूकता फैलाना और गंगा किनारे सफाई अभियानों में भाग लेना चाहिए। परिवार में प्रेम और त्याग को फिर से जीवंत करना होगा। धर्म को दिखावा नहीं, बल्कि दैनिक आचरण का अभिन्न अंग बनाना होगा। राजनीति, व्यापार, समाज और हर एक नागरिक को मिलकर पर्यावरण संरक्षण और नैतिक मूल्यों की जिम्मेदारी निभानी होगी।
समय आ गया है कि हम अपने आप से पूरी ईमानदारी से पूछें — क्या हम सचमुच राम नवमी मना रहे हैं? जब तक राम के आदर्श हमारे विचारों, व्यवहार और पूरे समाज में गहराई से नहीं उतरते, और माँ गंगा फिर से निर्मल और पावन नहीं होती, तब तक यह उत्सव अधूरा ही रहेगा।
उत्सव की रौनक से आगे बढ़कर अब हमें आत्मचिंतन, छोटे-छोटे दैनिक बदलाव और सामूहिक प्रयास की राह अपनानी होगी। तभी राम के आदर्श साकार होंगे, गंगा फिर से स्वच्छ और पवित्र बनेगी, और हम राम नवमी का वास्तविक अर्थ समझ सकेंगे।
*लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद् हैं।
