डेडलाइन के बाद शंकराचार्य का धर्मयुद्ध शंखनाद
81 दिन की गोयुद्ध यात्रा का ऐलान
लखनऊ/वाराणसी: उत्तर प्रदेश सरकार को गौमाता को “राज्यमाता” घोषित करने और राज्य में पूर्णतः गोकशी प्रतिबंधित करने के लिए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा दी गई 40 दिन की समयसीमा समाप्त होने के बाद लखनऊ में किया गया “गोप्रतिष्ठा धर्मयुद्ध शंखनाद” अब राज्य में संत और सत्ता के बीच उभरते टकराव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। समयसीमा पूरी होने तक राज्य सरकार की ओर से इस मांग पर कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं होने के बीच शंकराचार्य ने आंदोलन को अगले चरण में ले जाने का संकेत देते हुए 3 मई से पूरे उत्तर प्रदेश में 81 दिवसीय “समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा” शुरू करने की घोषणा की है।
लखनऊ के मान्यवर कांशीराम स्मृति स्थल मैदान में आयोजित कार्यक्रम में शंकराचार्य ने कहा कि धर्म का पालन जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक अधर्म का प्रतिकार भी है, क्योंकि अन्याय को सह लेने से ही समाज में पाप बढ़ता है। उन्होंने गौरक्षा के प्रश्न को धर्म और अधर्म के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि गौमाता की प्रतिष्ठा और उनके प्राणों की रक्षा के लिए अब व्यापक जनआंदोलन चलाया जाएगा।
‘गविष्ठि’ शब्द की वैदिक व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तावित यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि गौवंश की प्रतिष्ठा के लिए छेड़ा गया एक धर्मयुद्ध है। ऋग्वेद के मंत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस गोयुद्ध में अधर्म रूपी वृत्रासुर के नाश का संकल्प लिया गया है। उनके अनुसार सनातन धर्म का मूल सिद्धांत अन्याय का प्रतिकार है और अपराध को सहना स्वयं अधर्म को बढ़ावा देने के समान है।
अपने संबोधन में शंकराचार्य ने शास्त्रीय उदाहरणों का उल्लेख करते हुए राजा परीक्षित की कथा का संदर्भ दिया, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने गौमाता के आँसू पोंछते हुए कलि को दंडित किया था। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि जिस राज्य में गाय रोती है उसका विनाश निश्चित माना गया है। उन्होंने मनुस्मृति और महाभारत के संदर्भ देते हुए कहा कि केवल गौवध करने वाला ही नहीं, बल्कि उसे अनुमति देने वाला और मौन रहने वाला भी उसी पाप का भागी होता है।

उन्होंने अपने भाषण में वेशधारियों और पद-लोलुप लोगों को भी चेतावनी देते हुए कहा कि योगी या विरक्त का पद और लाभ के लिए लालायित होना दानवी प्रवृत्ति है। गुरु गोरखनाथ की वाणी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग एक ओर गौभक्तों का समर्थन लेते हैं और दूसरी ओर गौहत्या से जुड़े हितों को भी साधते हैं, वे वास्तविक गोरखपंथी नहीं हो सकते। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म की शपथ लेने के बाद धर्मनिरपेक्षता की शपथ लेना विरोधाभासी है और जिन्होंने ऐसा किया है, उन्हें किसी एक मार्ग पर स्पष्ट रूप से स्थिर होना चाहिए।
लखनऊ के प्राचीन नाम ‘लक्ष्मणपुरी’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह शेषावतार लक्ष्मण की भूमि है और गोमती नदी को उन्होंने ‘गोमती विद्या’ का जीवंत स्वरूप बताया। उन्होंने कहा कि लक्ष्मण का बाण कभी व्यर्थ नहीं जाता और धर्म की रक्षा का संकल्प भी अंततः सफल होगा।
कार्यक्रम के अंत में शंकराचार्य ने “शंकराचार्य चतुरंगिणी” नामक संगठन के गठन की घोषणा की, जिसका उद्देश्य उनके अनुसार संत समाज में व्याप्त अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करना है।
शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने आंदोलन को राजनीतिक दलों से ऊपर बताते हुए कहा कि शंकराचार्य किसी भी दल के समर्थन में नहीं हैं और उनका आशीर्वाद केवल उसी को मिलेगा जो गौमाता के प्राणों की रक्षा का संकल्प लेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि देश की लगभग “100 करोड़ सनातनी जनता” इस गौरक्षा आंदोलन से जुड़ रही है।
पाण्डेय ने आरोप लगाया कि स्वयं को हिंदूवादी बताने वाली सरकारों के शासनकाल में भी गोकशी की घटनाएँ बढ़ी हैं और गौरक्षा के मुद्दे को उठाने वाले शंकराचार्य पर विभिन्न प्रकार के आरोप लगाए जा रहे हैं तथा उनके विरुद्ध मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। उनके अनुसार ऐसी शर्तें भी लगाई जा रही हैं जिनसे शंकराचार्य अपनी बात खुलकर न कह सकें, लेकिन गौरक्षा के लिए उठी आवाज को अब रोका नहीं जा सकता जब तक गौमाता को राष्ट्र में “राष्ट्रमाता” और राज्यों में “राज्यमाता” घोषित कर उनकी रक्षा सुनिश्चित न की जाए। उन्होंने कहा कि गोविंद की इस भारतभूमि पर गौमाता का रक्त बहना किसी भी हिंदू के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
लखनऊ में हुए इस कार्यक्रम के समर्थन में वाराणसी के असि घाट पर भी गौभक्तों ने सामूहिक शंखनाद किया। आयोजकों के अनुसार यह शंखनाद लखनऊ में हुए “धर्मयुद्ध शंखनाद” के समर्थन में किया गया और इसके माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि काशी ही नहीं बल्कि देश के अनेक लोग शंकराचार्य द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान के साथ खड़े हैं। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों के अनुसार एक गौमाता भी स्वयं शंखनाद स्थल पर पहुँच गई, जिसे उपस्थित लोगों ने आशीर्वाद का संकेत माना।
असि घाट पर आयोजित कार्यक्रम में महामृत्युंजय मंदिर के महंत किशन दक्षिण, कांग्रेस के नगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे, राकेश पाण्डेय, सरदार सतनाम सिंह, अरुण सोनी, सुनील श्रीवास्तव, प्रमोद वर्मा, पंडित सदानंद तिवारी, संतोष चौरसिया, पुलक त्रिपाठी, हिमांशु सिंह, किशन यादव, के.के. द्विवेदी, शशिकांत यादव, श्रीश तिवारी, सुभाष सिंह, मिर्ची दुबे, आशीष पाण्डेय और प्रदीप पाण्डेय सहित आयोजकों के अनुसार सैकड़ों लोग उपस्थित थे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि शंकराचार्य द्वारा निर्धारित समयसीमा के बाद आंदोलन को सार्वजनिक रूप से तेज करने से गौरक्षा का प्रश्न फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकता है। मुख्यमंत्री स्वयं संन्यासी पृष्ठभूमि से आने वाले एक प्रमुख धार्मिक नेता माने जाते हैं, ऐसे में संत परंपरा के शीर्ष मठाधीशों में से एक द्वारा इस मुद्दे पर सार्वजनिक दबाव बनाना संत समाज और राजनीतिक नेतृत्व के संबंधों की एक जटिल स्थिति को भी सामने लाता है। यदि प्रस्तावित 81 दिवसीय यात्रा वास्तव में राज्य के विभिन्न हिस्सों में व्यापक जनसंपर्क अभियान का रूप लेती है, तो यह गौरक्षा के मुद्दे को नई राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में ला सकती है।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
