पुरातात्त्विक संग्रहालय, गोरखपुर
– विवेकानंद सिंह*
गोरखपुर में ब्रिटिश दौर की नामचिह्नित विरासत
उत्तर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी छोर पर नेपाल की सीमा के निकट स्थित गोरखपुर ज़िले का इतिहास केवल प्रशासनिक सीमाओं के परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन परतों से भी निर्मित है जो विभिन्न कालखंडों की राजनीतिक और सामाजिक उपस्थिति को आज तक दर्ज किए हुए हैं। इस क्षेत्र की बसावट, कस्बों और मोहल्लों के नामों में भी अतीत की कई स्मृतियाँ छिपी हैं। विशेष रूप से ब्रिटिश शासन के दौरान यहाँ आने वाले अधिकारियों, ज़मींदारों और व्यापारियों का प्रभाव इतना गहरा रहा कि उनके नामों पर कई स्थान बसाए गए या पुराने नामों को बदल दिया गया। भारत की स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में ऐसे कई कस्बे और बस्तियाँ मौजूद हैं, जिनके नाम ब्रिटिशकालीन व्यक्तियों से जुड़े हुए हैं और जिनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्थानीय इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण संकेत देती है।
ब्रिटिश भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हेनरी राल्फ़ नेविल द्वारा संकलित और 1909 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से प्रकाशित ‘गोरखपुर: ए गज़ेटियर’ के अनुसार गोरखपुर उस समय यूनाइटेड प्रोविंसेस आगरा एंड अवध के उत्तर-पूर्वी कोने में स्थित एक महत्वपूर्ण ज़िला था, जिसका प्रशासनिक मुख्यालय गोरखपुर शहर था। जब इस ज़िले का गठन हुआ, तब इसका क्षेत्र वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत था। उस समय इसके अंतर्गत आज़मगढ़, बस्ती, देवरिया, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, कुशीनगर और संत कबीर नगर के वर्तमान जनपदों के अलावा नेपाल की तराई में स्थित विनायकपुर और तिलपुर के क्षेत्र भी शामिल थे। बाद में 1816 में हुई सुगौली संधि के पश्चात ब्रिटिश शासन ने इन क्षेत्रों को नेपाल को सौंप दिया। वर्ष 1829 में गोरखपुर को ‘द सीडेड एंड कॉन्कर्ड प्रोविंसेस’ के अंतर्गत एक प्रशासनिक डिवीज़न का दर्जा दिया गया, जिसमें गोरखपुर, ग़ाज़ीपुर और आज़मगढ़ का पूरा क्षेत्र सम्मिलित था। 1908 में प्रकाशित ‘द इम्पीरियल गज़ेट ऑफ़ इंडिया’ के अनुसार गोरखपुर शहर में नगरपालिका की स्थापना 4 दिसंबर 1873 को हुई थी और बाद में 1982-83 में इसे नगर निगम का दर्जा प्रदान किया गया।
गोरखपुर का ऐतिहासिक महत्व मुग़ल काल में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अबुल फ़ज़ल इब्न मुबारक द्वारा हिजरी 1006 (लगभग 1597-98 ई.) में लिखित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आइन-ए-अकबरी’ के अनुसार सम्राट अकबर के शासनकाल में गोरखपुर सूबा-ए-अवध की पाँच प्रशासनिक इकाइयों में से एक ‘सरकार’ का मुख्यालय था। उस समय इसके अधीन 24 महाल आते थे, जिनमें कुल 2,44,283 बीघा और 13 बिस्वा उपजाऊ भूमि थी। इस भूमि से 1,19,26,790 दाम का राजस्व प्राप्त होता था। इस राजस्व की वसूली सुनिश्चित करने के लिए यहाँ 1,010 घुड़सवार सैनिकों और 22,000 पैदल सैनिकों की नियुक्ति की गई थी। बाद में 1732 में यह क्षेत्र अवध के प्रथम नवाब सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क के अधिकार में आ गया। फिर 10 नवंबर 1801 को अवध के नवाब वज़ीर सआदत अली ख़ाँ द्वितीय ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि की। इस समझौते के अंतर्गत अवध को अपने खर्च पर लगभग दस हज़ार सैनिकों वाली ब्रिटिश सेना रखनी पड़ी और अपने आधे से अधिक उपजाऊ भूभाग को कंपनी को सौंपना पड़ा। इन्हीं क्षेत्रों में वर्तमान गोरखपुर भी शामिल था, जिसका पुराना नाम मुअज़्ज़माबाद बताया जाता है। इसके बाद इस क्षेत्र को बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत बनाए गए नए प्रशासनिक प्रांत ‘द सीडेड एंड कॉन्कर्ड प्रोविंसेस’ में सम्मिलित कर दिया गया, जिसकी राजधानी आगरा थी।
ब्रिटिश प्रशासन की स्थापना के शुरुआती वर्षों में गोरखपुर की स्थिति अत्यंत अव्यवस्थित थी। ज़िले के पहले कलेक्टर जॉन राउटलेज नियुक्त किए गए। हेनरी राल्फ़ नेविल के अनुसार जब राउटलेज ने यहाँ प्रशासनिक कार्यभार संभाला तो उन्होंने क्षेत्र की दयनीय स्थिति देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। उनके पास कोई भरोसेमंद अधीनस्थ अधिकारी नहीं था, पुलिस व्यवस्था लगभग अस्तित्वहीन थी और राजस्व का आकलन या वसूली करने के लिए कोई व्यवस्थित साधन भी उपलब्ध नहीं था। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में ऐसे सैनिक और अधिकारी क्षेत्र में सक्रिय थे जिन्हें पहले सेवा से हटाया जा चुका था और जो स्थानीय निवासियों को लूटने में लगे रहते थे। इन परिस्थितियों में प्रशासन स्थापित करना अत्यंत कठिन कार्य था।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मिर्ज़ा सईद-उज़-ज़फ़र चगताई ने अपनी पुस्तक ‘मेमोरी ऑफ़ थ्री कॉन्टिनेंट्स’ में उल्लेख किया है कि लगातार प्रयासों के बाद ही राउटलेज इस क्षेत्र में व्यवस्था स्थापित कर पाए। अपने शिविरों की सुरक्षा के लिए उन्होंने हाथियों का घेरा बनवाया और जंगली हाथियों को दूर रखने के लिए चारों ओर आग जलाने की व्यवस्था की जाती थी।
ब्रिटिश भारत की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों का विश्लेषण करने वाली रमेश दत्त की 1902 में लंदन से प्रकाशित पुस्तक ‘द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया’ में भी गोरखपुर का उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि 1801 में लॉर्ड वेलेस्ली द्वारा किए गए समझौते के तहत गोरखपुर जैसे कई ज़िले ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिए गए थे। वेलेस्ली ने 1803 और 1805 के बीच इन सौंपे गए और जीते गए क्षेत्रों में स्थायी बंदोबस्त लागू करने का वादा किया था, किंतु यह वादा कभी पूरा नहीं हो सका। पुस्तक में डॉ. बुकानन के विवरण का हवाला देते हुए कहा गया है कि शुजा-उद-दौला के शासनकाल में यह ज़िला अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में था। किंतु जब कर्नल हैनी को लगान वसूली का ठेका दिया गया तो उन्होंने वसूली के लिए इतने कठोर उपाय अपनाए कि आबादी घट गई और अनेक कृषि क्षेत्र उजड़कर जंगल या बंजर भूमि में बदल गए। बाद में अंग्रेज़ प्रशासन के दौरान मेजर राउटलेज ने अनेक किलों को ध्वस्त कर कानून का अधिकार स्थापित किया, जिससे निम्न वर्गों को पहले की तुलना में सुरक्षा मिली और अन्य क्षेत्रों से लोग यहाँ आकर बसने लगे। हालांकि बंदोबस्त की अवधि कम रखने जैसी नीतियों के कारण ज़मींदारों के साथ अनुचित व्यवहार होने की शिकायतें भी सामने आईं।
1801 से 1858 तक ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके बाद 1947 तक ब्रिटिश क्राउन के शासनकाल में गोरखपुर तथा आसपास के क्षेत्रों में अनेक अंग्रेज़ अधिकारी, ज़मींदार, नील और गन्ना उत्पादक तथा व्यापारी आते-जाते रहे। इन अंग्रेज़ों और उनके परिजनों की कब्रें आज भी गोरखपुर के पैडलेगंज स्थित कब्रिस्तान में मौजूद हैं, जहाँ कब्रिस्तान प्रबंधन की ओर से हर वर्ष एक बार प्रतीकात्मक रूप से मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बाद भी गोरखपुर और उसके आसपास कई स्थान ऐसे हैं जिनके नाम ब्रिटिश अधिकारियों या ज़मींदारों से जुड़े हुए हैं। स्थानीय इतिहास, पुरालेखों और नागरिकों से प्राप्त जानकारी इन नामों के पीछे की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती है।
अहिरौली निवासी तथा सेल्स टैक्स विभाग (अब कमर्शियल टैक्स विभाग) के पूर्व सहायक आयुक्त गजेंद्र बहादुर सिंह के अनुसार गोरखपुर के बेतियाहाता चौक के निकट स्थित ‘रीड साहब की धर्मशाला’ का इतिहास मुग़ल काल तक जाता है। उन्होंने बताया कि 1680 में औरंगज़ेब द्वारा नियुक्त गोरखपुर के चकलादार क़ाज़ी ख़लील-उर-रहमान ने यहाँ मुग़ल सेनानायकों के निवास के लिए एक किले का निर्माण कराया था। बाद में 1839 में तत्कालीन कलेक्टर ई. ए. रीड ने स्थानीय रईसों और व्यापारियों के आर्थिक सहयोग से 5,880 रुपये खर्च कर इस किले को धर्मशाला में परिवर्तित करवा दिया। फरवरी 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस भवन को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया ताकि इसे ऐतिहासिक विरासत के रूप में सुरक्षित रखा जा सके।
औपनिवेशिक प्रभाव की एक झलक गोरखपुर शहर के बर्डघाट मोहल्ले में भी दिखाई देती है। इसका नाम ब्रिटिश अधिकारी रॉबर्ट मर्टिन्स बर्ड के नाम पर पड़ा, जो 1829 में गोरखपुर डिवीज़न के राजस्व और सर्किट आयुक्त थे। इसी दौर में शहर के साहूगंज मोहल्ले का नाम बदलकर साहिबगंज कर दिया गया।
पीपीगंज कस्बे का इतिहास भी ब्रिटिशकालीन नामकरण की परंपरा से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्र पत्रकार सिद्धार्थ श्रीवास्तव के अनुसार इसका मूल नाम ‘पेप्पेगंज’ था, जो ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे के नाम पर रखा गया था और समय के साथ स्थानीय उच्चारण में बदलकर पीपीगंज हो गया। लंदन स्थित रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के लाइब्रेरियन डॉ. एडवर्ड विच के अनुसार पेप्पे का जन्म 1852 में भारत में ही हुआ था और उनके पिता विलियम पेप्पे उत्तरी भारत में बर्डपुर एस्टेट के प्रबंधक थे। एबरडीन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद डब्ल्यू. सी. पेप्पे 1873 में अपने पिता की सहायता के लिए भारत लौट आए और 1880 के दशक की शुरुआत में बर्डपुर एस्टेट के प्रबंधक बन गए। 1897 की वसंत ऋतु में उन्होंने पिपरहवा में खुदाई करवाई, जिसमें लाल पकी हुई ईंटों से बना लगभग 130 फुट व्यास का एक विशाल गुंबदाकार ढांचा मिला। बाद में प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञ विन्सेंट स्मिथ ने इसे एक प्राचीन बौद्ध स्तूप बताया, जो संभवतः सम्राट अशोक के काल का था।
महाराजगंज ज़िले का बृजमनगंज कस्बा भी औपनिवेशिक इतिहास से जुड़ा हुआ एक उदाहरण है। लेहड़ा एस्टेट के अंग्रेज़ अनुदानग्राही जॉन हॉल ब्रिजमैन के नाम पर बसे इस कस्बे को पहले साहिबगंज कहा जाता था। 1892 में ब्रिजमैन की मृत्यु के बाद उनकी ज़मींदारी उनके पूर्व प्रबंधक और दामाद जे. जे. होल्ड्सवर्थ को मिली, जबकि एस्टेट की देखरेख एफ. हॉवर्ड करते थे। वर्ष 2020 में बृजमनगंज को नगर पंचायत घोषित किया गया और यहाँ का रेलवे स्टेशन भी इसी नाम से जाना जाता है, जिसका निर्माण 1890 में हुआ था। गोरखपुर के राप्तीनगर निवासी रविकांत सिंह के अनुसार इस कस्बे के पड़ाव क्षेत्र में स्थित रामलीला मैदान में 1885 से दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रामलीला और मेले का आयोजन होता आ रहा है।
सिद्धार्थनगर ज़िले के नौगढ़ तहसील में स्थित बर्डपुर कस्बे का नाम भी एक ब्रिटिश अधिकारी से जुड़ा है। यह नाम आर. एन. बर्ड के सम्मान में पड़ा, जो 1829 में गोरखपुर के कमिश्नर थे। 1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अवध पर अधिकार किए जाने से पहले ही गोरखपुर क्षेत्र में अंग्रेज़ों ने कई ज़मींदारियाँ स्थापित कर ली थीं, जिनमें बर्डपुर, नेउरा ग्रांट, दुल्हा कोठी, अलीदापुर और सरौली प्रमुख थीं। बर्डपुर एस्टेट की स्थापना 1832 में हुई थी और इसके ज़मींदार जे. जे. मैकलाचलन थे।
गोरखपुर ज़िले का कैंपियरगंज कस्बा भी ब्रिटिश प्रशासनिक उपस्थिति की याद दिलाता है। यहाँ के रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर विलियम कैंपियर हार्गलस थे और उनके नाम पर ही इस कस्बे का नाम कैंपियरगंज पड़ गया।
इसी प्रकार बस्ती ज़िले का वाल्टरगंज कस्बा ब्रिटिश नील उत्पादक मॉक वॉल्टियर के नाम पर पड़ा। वह लगभग 1867 के आसपास इस क्षेत्र में आए थे और उन्होंने यहाँ नील की खेती को बढ़ावा दिया। समय के साथ स्थानीय लोगों के प्रयासों से इस स्थान को अब श्रीपालपुर और गोविंदनगर नामों से भी जाना जाने लगा है।
इन उदाहरणों के बीच यह प्रश्न भी उठता है कि क्या ब्रिटिश शासन की याद दिलाने वाले इन स्थानों के नाम बदल दिए जाने चाहिए। कई विद्वानों का मत है कि यदि नाम बदले भी जाएँ तो इतिहास को मिटाया नहीं जाना चाहिए। उनके अनुसार उन भवनों और ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित रखना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपने अतीत को समझ सकें और यह जान सकें कि भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके पूर्वजों ने किन कठिन परिस्थितियों और संघर्षों का सामना किया।
*पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र में 1764 से लेकर 1947 तक की तमाम घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भों पर शोध, लेख एवम् पुस्तक लेखन।
