रश्मिरथी हीरक जयंती और जल पुनर्जीवन की गाथा
– डॉ. राजेंद्र सिंह*‘मानव जब जोर लगाता है’: जल संरक्षण का जीवंत उदाहरण
जब कविता बनी संकल्प: पत्थर से पानी तक की कथा
‘‘है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में?
खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।’’
रश्मिरथी की प्रत्येक पंक्ति एक महामन्त्र है। इसने सदैव मुझे प्रभावित किया है। सबसे अधिक श्री रामधारी सिंह दिनकर जी के वीरता के महामन्त्रों ने तो मेरे जीवन में नई जान ही डाल दी थी। जब बे-पानी होकर गाँव उजड़ रहे थे, वह 70-80 का दशक था। मैं पानी से अनजान नहीं था। आयुर्वेद में इस शब्द से खूब आत्मसात् हुआ था, परन्तु इसके लिए क्या करना है? यह नहीं आता था। यद्यपि गोपालपुरा गाँव के माँगू काका ने मुझे पानी का काम सिखा दिया था, पर यह कठिन काम कैसे होगा? मन में असमंजस ही था। तभी श्री दिनकर जी की रश्मिरथी की पंक्ति ‘‘मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है’’ ने मेरे विश्वास को जगा दिया और मन को पक्का कर दिया। बस! हम पानी के काम में जुट गए। हमारे ग्रामीणों के साथ मेरे पसीने से विभिन्न गाँवों के सैकड़ों स्थानों पर सही में पत्थरों से पानी निकल कर बहने लगा। पानी के काम से चम्बल की दर्जनों नदियों में तपती गर्मी के बावजूद पत्थरों से पानी निकल कर झरनों के रूप में बहने लगा और नदियाँ सदानीरा हो गईं। अब इस क्षेत्र की 23 नदियाँ पुनर्जीवित होकर राजस्थान के चम्बल व मत्स्य क्षेत्र में आज मार्च 2026 में भी अविरल बह रही हैं।
पानी के आरम्भिक काम में मैंने सबसे पहले अपनी क्षमता व कुशलता को अनदेखा कर, शक्ति व साधन का मूल भी खोजना बन्द करके अपनी श्रमनिष्ठा से सीधे गोपालपुरा गाँव के चौंतरे वाला जोहड़ व मेवालों का बाँध का काम शुरू किया था। काम करते हुए बिना किसी ऊँच-नीच के भेद को माने, पानी के काम को दया-धर्म का काम मान लिया। बिना किसी डर या लोभ-लालच के, केवल त्याग-तपस्या व श्रम-निष्ठा से इन जल संरचनाओं का काम हो गया। यद्यपि प्रारम्भिक जल संरचना निर्माण प्रक्रिया के दौरान मुझ पर यहाँ किसी को भी विश्वास नहीं था, पर मैंने भी विश्वास बनाने हेतु बातें नहीं की, केवल काम ही करता रहा। काम का परिणाम स्वाभाविक रूप से ग्रामीणों को और मुझे अपनी नंगी आँखों से धरती पर भी दिखने लगा। जब सूखे कुओं में पानी आया, तो गाँव के वे लोग, जो जल संकट के कारण पलायन कर गये थे, वे वापस लौटने लगे और अपनी खेती करने लगे। खेती का काम करते हुए ही उन्होंने अपने जंगल, पहाड़ व खनन का कटान भी रुकवाया। खनन कार्य में लगे श्रमिकों से खनन कार्य छुड़वा कर उन्हें जल संरक्षण के नये रोज़गार में लगाया। खनन के बन्द होने तथा जल संरक्षण के काम करने से क्षेत्र में हरियाली आई और पलायन होकर गये सब लोग वापस अपने घर आकर खेती के काम में लग गये। ये पुनर्वास और स्वावलम्बन के काम ग्राम स्वराज्य की राह पकड़ने लगे।
इस प्रकार गाँवों का पुनर्वास होने पर एक नया इतिहास बनना शुरू हो गया। सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबन्धन के किये गये पानी के इन कामों के कारण 2001 में एशिया का रेमन मैगसेसे पुरस्कार मिल गया। धीरे-धीरे जहाँ-जहाँ पानी के काम होते गये, वहाँ नदियाँ पुनर्जीवित होकर बहने लगीं। 2015 तक 9 नदियाँ शुद्ध सदानीरा होकर बहने लगीं। देश-दुनिया के लोग इन्हें देखने समझने के लिए आने लगे। तभी जल के क्षेत्र में ‘‘स्टॉकहोम वाटर प्राइज़’’ भी मिल गया। यह सब जन प्रेरणा हेतु शिक्षण, जल संरक्षण की रचना व जल, जंगल जमीन बचाने हेतु संगठन का काम खनन माफिया द्वारा लगाये आरोपों और विघ्नों के बीच होता रहा।
संयोग ऐसा रहा कि जितना बड़ा विघ्न आता, उतना ही बड़ा सम्मान प्राप्त होता रहा। सत्य का पथ सत्याग्रह साध्य बनता गया। प्रेम, शिक्षण, रचना व संगठन के कामों की प्रक्रिया साधना बन गई। सुख-दुःख का अन्तर मन से मिट गया, अमीरी-गरीबी तो दिखना ही बन्द हो गई। दिन-रात की मेहनत ने साधना शुद्धि प्रदान कर दी, सुख-दुःख दोनों ही राह दिखाने वाले बन गये।
बस! मेहनत में ही मज़ा आने लगा। इस मेहनत की मुस्कान से प्रभावित होकर लोग हम पर विश्वास करने लगे। द्वेष की आग बुझकर लोगों के प्रति प्रेम की लौ जलने लग गई। बोलना बन्द, बस! काम ही काम आगे बढ़ने लगा। जिस काम को 1990 तक लोगों ने समझा ही नहीं था, वही काम मेरे जीवन का साध्य बन गया है। साध्य सिद्धि का लक्ष्य नहीं था, लेकिन सत्याग्रह ने सिद्धि दिला दी। सिद्धि से श्रम-निष्ठा, ज्ञान वीरता और व्यावहारिक कामों की त्वरा बढ़ती गई, तो नदी पुनर्जीवित करने की विश्व सिद्धि प्राप्त हो गई। विघ्नों से भरे जीवन के बावजूद संघर्ष, श्रम-निष्ठा व सच्ची लगन के कारण ये सब सिद्धियाँ मिलती ही चली गईं, बस! कभी भी किसी से डरे नहीं।
लोभी-लालची कभी बने नहीं, इसलिए किसी से बँधे भी नहीं। बस! आजाद होकर एक सहज, समर्पित कार्यकर्ता की तरह समर में डटे ही रहे। आज भी उसी प्रकार डटे हुए हैं। बड़े-छोटे में भेद नहीं, इसलिए चारों तरफ से छोटे ही बड़े और सुंदर दिखाई देने लगे।
एक बड़े बाँध के मुकाबले में हमने सौ छोटे-छोटे बाँधों को संगठित करके भिड़ा दिया। अन्त में एक हज़ार छोटे बाँधों ने बिना बिगाड़, बिना विस्थापन, बिना विनाश किये सनातन पुनर्जीवन प्रक्रिया चला कर विजय प्राप्त कर ली। दुनिया का बड़े से बड़ा बाँध भी मेरे छोटे-छोटे एक हज़ार बाँधों से स्वतः ही हार गया है। इनसे किसी का विस्थापन या बिगाड़ नहीं हुआ। यह सभी के लिए शुभ है।
इस हार-जीत का इतिहास लिखने की चिन्ता किये बिना भी समर तो जारी रहा। तेजस्वी सम्मान की खोज किये बिना, अपना बताये बिना, नीचे वालों के साथ काम करके ऊपर उठाते-उठाते आगे बढ़ते ही रहे। सुख-दुःख का भेद किए बिना सब कुछ सहते हुए, जो भी सामने आया उसे अपनाते हुए काम में लगे रहे। इसके प्रेरणा स्रोत बापू, तिलक और प्रत्यक्ष तो माँगू काका और श्री दिनकर जी व उनकी कृति ‘रश्मिरथी’ रहे हैं।
इसमें भी उनकी एक ही पंक्ति ‘‘मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है’’, यह मेरे लिए महामन्त्र रही। यह मात्र एक कविता न होकर जीवन का एक अमोघ मन्त्र है, जो सबसे महŸवपूर्ण है। इसे जो भी समझ लेता है, वह वीरता और दृढ़ता से कभी मरता नहीं है। मेरे हृदय में प्राण फूँकने वाली ‘रश्मिरथी’ ही है। मैंने इसे अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से गुणा और जिया है। यह पुस्तक मरे और डरे को पानीदार, इज्जतदार बनाने वाली कृति ही नहीं, अपितु एक महाकाव्य ‘ग्रन्थ’ है। निस्सन्देह यह जीवन का एक महामन्त्र है। यह अपने 75वें वर्ष में, जब हीरक जयन्ती मना रहे हैं, तभी आज होली के दिन इस पर लेख लिखने की प्रेरणा हुई।
