– डॉ राजेंद्र सिंह*
तिमनगढ़ डांग: जहां पत्थर से पानी निकला
कभी चंबल के बीहड़ और बागियों की पहचान रहे तिमनगढ़ की डांग के गांव आज अपनी नई पहचान खुद गढ़ रहे हैं। तरेहटी, आलमपुर, ऊमरी, जमूरा, मेवला, टिमकोली, कंचनपुर, भोजपुर, मोहमनत, चिलपुरा, सिंगनपुर, कोरीपुरा, खिलपुरा, बीरबल का बेड़ा, खंडपुरा, नयापुरा, झज्जरपुरा, कारेन का पुरा, सिंघनिया, मांगरोल, कांसगी बावड़ी, उतारी जैसे गांव अब न डरते हैं और न डराते हैं। ये गांव अब पानीदार, इज्जतदार, समझदार और मालदार बन चुके हैं।
जो लोग कभी पत्थरों से टकराते हुए डर और हिंसा की जिंदगी जीते थे, वही लोग आज पानी सहेजने की साधना में जुटे हैं। पुनर्जीवित नहरो नदी, खेतों में लहलहाती फसलें, बीरबानियों के चेहरों पर साझा सुख की चमक, मोट्यारों के हाथों में कुदाल-फावड़ा और तगारी—यही अब डांग की पहचान है। बच्चों की नियमित पढ़ाई इस कठिन भूगोल में जीवन की नई इबारत लिख रही है। डांग का पानी अंधेरी जिंदगी में रोशनी का प्रतीक बन गया है, ऐसा प्रतीक जो दूसरों को भी जीवन दे सकता है।
डांग का भूगोल और उसका पुराना किस्सागोई भरा इतिहास बाहरी दुनिया को डराता रहा, पर इसी कठिनाई ने तरुण भारत संघ के कार्यकर्ताओं को हमेशा आकर्षित किया। उनका विश्वास रहा कि जहां संकट बड़ा होता है, वहीं साझा समाधान भी उतना ही बड़ा निकल सकता है। डांग की विषमताएं भूगोल की भी हैं और अतीत की भी, पर यह मान लेना कि यहां बदलाव संभव नहीं, स्वयं एक संकट है। तरुण भारत संघ ने इस क्षेत्र की ऊर्जा और असंतोष को पानी के रचनात्मक कार्य में लगाया और परिणाम आज सबके सामने है।
तिमनगढ़ डांग की 21 ग्राम सभाओं और तरुण भारत संघ के संयुक्त प्रयास से 20 जल संरचनाएं बनीं। इनमें लगभग ढाई करोड़ रुपये की श्रम और सामग्री लगी। कई गांव काम की सघनता के उदाहरण बने, तो कई गांव बदलाव की मिसाल। मात्र बीस वर्षों में इन छोटे-छोटे प्रयासों ने इतना बड़ा परिवर्तन ला दिया कि नहरो नदी सदानीरा हो उठी। इस कार्य में डांग की महिलाओं की सक्रिय भागीदारी अविस्मरणीय रही। आज भी जरूरतें बहुत हैं और काम शेष है, पर इतना तय है कि नहरो नदी का फिर से बहना पूरे क्षेत्र के लिए एक सुखद अनुभूति है।
नहरो नदी घाटी की महिलाओं के शब्द कभी करुणा से भरे थे—“हम इंसान नहीं, जानवर हैं। अगले जन्म में औरत मत बनाना, चाहे जानवर बना देना।” यही पीड़ा एक पत्रकार के पीछे चली और पुस्तक बनी—‘छोटी दरबी और नर्बदा’। डांग की स्त्रियों को पत्थरों से रोज टकराना पड़ता था, पर उन्होंने प्रेम और परिश्रम से पत्थरों को ही पानी में बदल दिया।
जब शराबमुक्त ऊमरी की कहानी सुनी तो आंखों के सामने सदानीरा नहरो नदी बहने लगी। तालाबों में पानी लबालब, कुओं में जलस्तर ऊपर, बीरबानियों की चटकदार ओढ़नियों के बीच सोना-चांदी जड़े दांत और बाजूबंद, मोट्यारों के पैरों में रंगीन जूतियां और नोंकदार मूंछें। जहां तक नजर जाती, धान की हरियाली और धरती की मुस्कान दिखाई देती। यह किसी कथा जैसा लगता है, पर यह सच है।
कभी यह इलाका बेकारी, बीमारी और बदहाली के शिकंजे में था। जयपुर से मात्र 200 किलोमीटर दूर होने पर भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ। प्रकृति का कोप और इंसानी लालच ने इसे और कमजोर किया। लेकिन गरीब-गुरबा आबादी और तरुण भारत संघ के साझा प्रयासों ने इस धरती का चेहरा बदल दिया। यही प्रेरणा बनी और उसी से जन्मी पुस्तक—‘तिमनगढ़ डांग का पानी’। यह दस्तावेज बताता है कि कोई आबादी कमजोर नहीं होती, ग्राम गुरु सदा बड़ा होता है। संकल्प हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है। यहां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां सार्थक हो उठती हैं—
“मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।”
फैली बाजुओं वाली पहाड़ियों को डांग कहते हैं। जिला करौली के तीस से अधिक गांव इसी कठिन क्षेत्र में बसे हैं। दक्षिण-पूर्व में चंबल नदी करौली और मुरैना की सीमा बनाती है। बनास नदी पश्चिम से पूर्व बहती हुई रामेश्वर के पास चंबल में मिलती है। यह संगम क्षेत्र का तीर्थ है। करौली का इतिहास 1348 से जुड़ा है और 19 जुलाई 1997 को इसे जिला बनाया गया।
स्थानीय निवासी डॉ. रूप सिंह गुर्जर बताते हैं कि 2006 में तरुण भारत संघ के अध्यक्ष के नाते मैं तिमनगढ़ किले में आयोजित गुर्जर गीत सम्मेलन में आया तभी उनके मन में संकल्प जगा कि इस क्षेत्र को शाप मुक्त कर पानीदार बनाना है। आज वही सपना हकीकत बन चुका है।
2024 में आलमपुर के पास बनी जल संरचनाओं से बैना नदी सदानीरा हुई और आगे चलकर नहरो नदी का रूप लेती है। भोजपुर, आलमपुर और उमरी में बने एनीकटों से कुओं का जलस्तर ऊपर आया। ग्रामीण रामवीर सिंह कहते हैं कि यह कार्य शाप से मुक्ति दिलाने वाले भगीरथ जैसा है।
जो काम आजादी के बाद सरकारें नहीं कर पाईं, वह ग्रामीणों ने तरुण भारत संघ के साथ मिलकर कर दिखाया। आत्मनिर्भर किसान की मिसाल कायम हुई। पीने और खेती दोनों के लिए पानी मिला, पैदावार दोगुनी हुई, पशुओं का स्वास्थ्य सुधरा, पक्षियों का कलरव बढ़ा और कदंब, खैर, शतावरी जैसी दुर्लभ वनस्पतियां लौट आईं।
गढ़मंडोरा गांव में पोखर और एनीकट बने तो खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ा। अब मार्च-अप्रैल में ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की कतारें मंडियों तक जाती हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि कभी यहां झरने बहते थे, फिर सब सूख गया। आज वे कहते हैं कि तरुण भारत संघ ने पानी रूपी पारस निकाल लिया है और पूरी डांग को नई उमंग दे दी है।
अब युवा किसान आधुनिक खेती—औषधीय पौधे, बागवानी—की ओर बढ़ रहे हैं। उनका विश्वास है कि परंपरागत खेती से आगे बढ़कर ही गांव और देश समृद्ध हो सकता है।
यह तिमनगढ़ डांग की नई कहानी है—जहां कभी डर और सूखा था, वहां आज पानी, भरोसा और भविष्य है।
*‘जल पुरुष’ के नाम से विख्यात जल संरक्षणकर्ता।
