संतों के समर्थन में मातृ सदन ने न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए अनशन शुरू किया
हरिद्वार: हरिद्वार के मातृ सदन में विवाद और तनाव पिछले कई सप्ताह से बढ़ता ही जा रहा है। इस धार्मिक और सामाजिक संस्था ने 28 जनवरी 2026 को नूरपुर पंजनहेड़ी में हुई भूमि पैमाइश और उससे जुड़े आपराधिक मामलों के विरोध में अपने ब्रह्मचारी संतों के समर्थन में अनशन और सत्याग्रह की चेतावनी दी है। ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द, जो आश्रम से जुड़े ब्रह्मचारी सुधानन्द के समर्थन में अनशन पर हैं, का कहना है कि यह आंदोलन किसी हिंसक घटना के पक्ष में नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।
मातृ सदन ने 18 फरवरी 2026 को जिला जज हरिद्वार श्री नरेंद्र दत्त को पत्र संख्या MS/2K26/HDR/15 प्रेषित किया था, जिसमें संस्था ने गंभीर आपत्तियों और सवालों को उठाया। मातृ सदन का दावा है कि इस पत्र के प्रति जिला जज द्वारा कोई उत्तर नहीं मिला और 24 घंटे की समय सीमा समाप्त होने के साथ ही संस्था ने पूर्व घोषित निर्णयानुसार आज अनशन और सत्याग्रह की घोषणा की।
संस्था ने आरोप लगाया कि 18 फरवरी की सुनवाई के दौरान, जो 28 जनवरी की नूरपुर पंजनहेड़ी घटना से संबंधित दो व्यक्तियों की अग्रिम जमानत याचिकाओं के लिए थी, जिला जज ने मातृ सदन और उसके संतों के बारे में टिप्पणियाँ कीं। मातृ सदन ने कहा कि इन टिप्पणियों में संतों के लिबास और ब्रह्मचारियों की आध्यात्मिक स्थिति पर सवाल उठाए गए और अदालत में उपस्थित न होने वाले व्यक्तियों के खिलाफ पीठ पीछे टिप्पणियाँ दर्ज की गईं। संस्था का दावा है कि अदालत में राज्य के अधिवक्ताओं से एकपक्षीय कथन लेकर उसे आदेश में शामिल करना और प्रशासनिक पत्राचार को आदेश का हिस्सा बनाना न्यायिक निष्पक्षता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं था।
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मातृ सदन का यह भी कहना है कि जिला जज पहले से ही अग्रिम जमानत याचिकाएँ निरस्त करने का निर्णय ले चुके थे और मातृ सदन से संबंधित पत्रों को सुनवाई से पहले अपने पास रखकर असंबद्ध व्यक्तियों की जमानत रद्द की। संस्था का मानना है कि यह न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और न्यायालय की गरिमा पर प्रभाव डालता है।
संस्था ने यह आरोप भी लगाया कि जिला जज द्वारा संतों के माननीय मुख्य न्यायाधीश उत्तराखंड को पत्र लिखने के संवैधानिक अधिकार को “दुराचार” बताना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर असर डालने वाला कदम था। मातृ सदन ने इसे पूर्वाग्रहपूर्ण और प्रतिशोध से प्रेरित टिप्पणी का दावा किया।
मातृ सदन ने अपने ऐतिहासिक संघर्ष और सामाजिक योगदान की पृष्ठभूमि भी उजागर की। यह आश्रम केवल धार्मिक गतिविधियों में ही नहीं, बल्कि गंगा संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के सामाजिक आंदोलन में भी सक्रिय रहा है। पिछले दशक में इसके संतों ने अवैध खनन, नदी तट पर अतिक्रमण और न्यायालयीन आदेशों के उल्लंघन के खिलाफ लंबे अनशन किए। संस्था ने बताया कि वर्ष 2010-11 में, जब श्री नरेंद्र दत्त उत्तराखंड उच्च न्यायालय में रजिस्ट्रार (न्यायिक) थे, तब उन्होंने हिमालयन स्टोन क्रशर के खिलाफ मातृ सदन के पर्यावरणीय संघर्ष में बाधा उत्पन्न करने के कई प्रयास किए। इसके अलावा, चमोली के पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री धनंजय चतुर्वेदी ने भी उनके विरुद्ध गंभीर आरोप न्यायिक अभिलेख में दर्ज किए हैं।
मातृ सदन ने बताया कि ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द केवल अपने आश्रम से जुड़े ब्रह्मचारी सुधानन्द के समर्थन में अनशन पर हैं। सुधानन्द के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और उन्होंने अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि वे घटना स्थल पर केवल उपस्थित थे, वाहन से बाहर नहीं उतरे और उनके पास वीडियो और कॉल रिकॉर्डिंग के रूप में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित हैं।
संस्था का कहना है कि यह मामला केवल आपराधिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि भूमि उपयोग, अवैध कॉलोनियों, न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन और प्रशासनिक निष्पक्षता से जुड़े व्यापक प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। मातृ सदन ने जोर देकर कहा कि उनका आंदोलन सत्य, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलने वाली संस्था के दृष्टिकोण से न्यायपालिका की गरिमा और जनता के न्याय में विश्वास बनाए रखने के लिए है।
मातृ सदन ने सीधे कहा, “मातृ सदन सत्य, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलने वाली संस्था है। न्याय के मंदिर की पवित्रता तथा जनता का न्यायपालिका में विश्वास, ऐसे असंगत वक्तव्यों और आचरण से गम्भीर रूप से आहत हुआ है। अतः इस अन्याय, अत्याचार एवं न्यायिक पद की गरिमा के प्रतिकूल व्यवहार के विरोध में मातृ सदन सत्याग्रह की घोषणा करती है। यह अविछिन्न अनशन / सत्याग्रह तब तक जारी रहेगा जब तक जिला जज श्री नरेंद्र दत्त द्वारा लिखित क्षमा-याचना प्रस्तुत न की जाए, आपत्तिजनक टिप्पणियाँ आदेश से निरस्त न की जाएँ तथा टिप्पणियों के संबंध में लिखित स्पष्टीकरण न दिया जाए।”
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
