– डॉ राजेंद्र सिंह*
अरावली बचाओ, नदियाँ बचाओ: चंबल तट से नई मुहिम
विंध्य और अरावली से ‘अरावली संतान संकल्प’ के साथ, सदस्य बनने की एक बड़ी मुहिम शुरू हुई।
चंबल नदी के तट स्थित रामेश्वर स्थान पर, जहाँ 12 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की अस्थि-भस्म का विसर्जन किया गया था, श्योपुर, शिवपुरी और ग्वालियर (मध्य प्रदेश) तथा करौली और धौलपुर (राजस्थान) से आए साथियों द्वारा महात्मा गांधी की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया।
आज भी चंबल नदी की पवित्रता, शुद्धता, निर्मलता और अविरलता रामेश्वरम तक बनी हुई है। यह नदी आज भी भारत में वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से एक योग्य नदी मानी जाती है। चंबल की यह योग्यता सीधे अरावली पर्वतमालाओं की रक्षा से जुड़ी हुई है। यदि पूरी अरावली खनन-ग्रस्त हो जाती, तो आज चंबल और बनास नदी के जल की गुणवत्ता बची नहीं रहती।
रामेश्वर स्थान पर चंबल नदी में बनास और सिंध नदी का संगम होता है। इन तीनों नदियों के इस योग को स्थानीय लोग ‘त्रिवेणी’ कहते हैं। यह तीनों नदियाँ अरावली और विंध्य पर्वतमालाओं से निकलकर इसी क्षेत्र में आकर मिलती हैं।
इस त्रिवेणी स्थल पर सभा को संबोधित करते हुए मैंने कहा कि यहीं से ‘अरावली संतान मंच’ की शुरुआत हुई है। मैंने कहा कि हम अरावली की संतानों ने अरावली को बचाने के लिए 1980 के दशक से निरंतर संघर्ष किया है और आगे भी यह लड़ाई जारी रहेगी। हमारा संकल्प है कि अरावली हरी-भरी बनी रहे, ताकि बनास और चंबल नदियाँ सदैव शुद्ध और निर्मल होकर बहती रहें। यह क्षेत्र अरावली-विंध्य पर्वतमालाओं का योग क्षेत्र है।

इसी भावना के साथ आज हम सब चंबल तट पर अरावली और देश की सभी पर्वतमालाओं को बचाने का सामूहिक संकल्प लेते हैं। इस अवसर पर आज अरावली की संतानों को अरावली का संकल्प दिलाया और कहा, “पर्वत श्रृंखलाएँ हमारी माँ के स्तन समान पोषक हैं।” जो लोग इस सिद्धांत को स्वीकारते हैं और व्यवहार में भी इसे जीते हैं, वही अरावली संतान के सदस्य बन सकते हैं।
सभा में उपस्थित लोगों ने निम्न शपथ ली— “मैं शपथपूर्वक आज से अरावली को माँ मानकर इसकी सेवा करूंगा और इसे स्वस्थ रखने हेतु संपूर्ण शक्ति से संघर्षशील, सक्रिय होकर इसके पुनर्जीवन हेतु आजीवन कार्य करता रहूंगा।”
आगे कहा गया कि आज गांधी जी को हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही है कि हम भारत के लोग पर्वत-श्रृंखलाओं को माँ के स्तन की संतान मानें। हम अपनी माँ के स्तन से पोषित हैं, इसलिए अपनी पर्वतमालाओं को हरा-भरा बनाए रखने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। हमारी पर्वतमालाएँ हरी रहेंगी, तभी हमारी नदियाँ भी अविरल और निर्मल होकर बहती रहेंगी।
इस अवसर पर गांधी यात्रा करते हुए श्योपुर से रण सिंह यात्रा दल त्रिवेणी संगम तट पहुँचा। चंबल तट पर एकत्रित लोगों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि अरावली संतान को पूरे अरावली क्षेत्र में एक परिवार के रूप में संगठित किया जाएगा। इसके साथ ही अरावली संतान संकल्प के माध्यम से सदस्य बनाने की एक बड़ी मुहिम शुरू की गई।
आज ही के दिन लगभग 250 नए सदस्य इस अभियान से जुड़े। इस प्रकार यह संगठन अब पूरे देश में सक्रिय होगा। आज से यह संगठन पर्वतों के संरक्षण के लिए कानून बनवाने तथा पर्वतमालाओं को बचाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करेगा। अंत में सभी उपस्थित लोगों ने अरावली को बचाने का सामूहिक संकल्प लिया और आगे की कार्ययोजना तथा रणनीति पर चर्चा कर उसे अंतिम रूप दिया।
*लेखक जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।
