– विवेकानंद सिंह*
दिल्ली से संगम तक: महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा
12 फ़रवरी, 1948 भारतीय इतिहास में एक अत्यंत भावपूर्ण और स्मरणीय दिन के रूप में दर्ज है। इसी दिन महात्मा गांधी की अस्थियाँ त्रिवेणी संगम में विसर्जित की गईं और राष्ट्र ने अपने सबसे महान सत्याग्रही को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि उस युग की सामूहिक संवेदना, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। प्रयागराज रेलवे स्टेशन से पुष्पाच्छादित ट्रक द्वारा कलश को त्रिवेणी संगम तक ले जाया गया, जिसकी सुरक्षा गोरखा सैनिकों ने संभाली। इस सुरक्षा व्यवस्था का नेतृत्व राजपूत रेजिमेंट के ब्रिगेडियर (बाद में मेजर-जनरल) शारदानन्द सिंह ने किया।
इस ऐतिहासिक यात्रा में लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़े। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गाँधी, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गोविन्द बल्लभ पंत सहित अनेक प्रमुख नेता और जनप्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। संगम तट पर उपस्थित जनसमूह के लिए यह क्षण केवल विदाई का नहीं, बल्कि गांधी के जीवन मूल्यों को आत्मसात करने की मौन प्रतिज्ञा जैसा था।
इस ऐतिहासिक विसर्जन से एक दिन पहले, 11 फ़रवरी, 1948 की सुबह 6:30 बजे महात्मा गाँधी की अस्थियों को दिल्ली से प्रयागराज ले जाने के लिए एक विशेष ट्रेन रवाना हुई थी। रेलवे गजट इंटरनेशनल द्वारा 5 मार्च, 1948 को प्रकाशित विवरण के अनुसार, इस स्पेशल ट्रेन में पाँच नए पेंट किए गए थर्ड क्लास डिब्बे लगाए गए थे। इनमें से मध्य डिब्बे को तांबे के कलश को सुरक्षित ले जाने के लिए विशेष रूप से परिवर्तित किया गया था।
मध्य डिब्बे के कंपार्टमेंट में लकड़ी की बेंच हटाकर एक हॉल बनाया गया था। हॉल के बीच तिरंगे राष्ट्रीय ध्वज से ढकी एक बड़ी मेज रखी गई, जिस पर कलश को सहारा देने वाली पालकी स्थापित की गई। इसके ऊपर एक और राष्ट्रीय ध्वज को छतरी की तरह लगाया गया था। पूरे फर्श को सफेद, हाथ से बुने खादी के कपड़े से ढक दिया गया था और दरवाजों के लिए भी खादी के पर्दे लगाए गए थे। मेज के दोनों ओर पेडस्टल पर तीन लाइटें लगाई गई थीं, ताकि कलश पर निरंतर प्रकाश पड़ता रहे। यह दृश्य उन लाखों लोगों को दिखाई दे रहा था, जो 11 फ़रवरी की सुबह नई दिल्ली में और रात भर रास्ते के विभिन्न स्टेशनों पर ट्रेन के दर्शन के लिए एकत्र हुए थे।
स्पेशल डिब्बे को दोनों ओर झुके हुए राष्ट्रीय ध्वजों से पहचाना जा सकता था। डिब्बे के बाहरी हिस्से पर अशोक चक्र और शेर की मुहर, जो राष्ट्रीय प्रतीक हैं, चित्रित की गई थीं। अस्थि कलश वाले कंपार्टमेंट और उससे जुड़े दोनों कंपार्टमेंटों के बीच लकड़ी के पार्टीशन हटाकर आपसी संपर्क और सुरक्षा व्यवस्था सुगम बनाई गई थी। इन कंपार्टमेंटों में महात्मा गांधी के करीबी रिश्तेदार, उनके सहयोगी, वरिष्ठ राजनीतिक नेता और अधिकारी सवार थे, जबकि ट्रेन के अन्य हिस्सों में उनके भक्त और पत्रकार मौजूद थे।
हॉल के चारों कोनों में पुलिस और सैन्य गार्ड तैनात थे और कंपार्टमेंट के दोनों ओर पहरा दिया जा रहा था। ट्रेन में यात्रा करने वाले सभी लोगों को अपना भोजन साथ लाना अनिवार्य था, ताकि भीड़ के बीच किसी विक्रेता की आवाजाही से व्यवस्था बाधित न हो। यात्रियों और प्लेटफॉर्म पर मौजूद लोगों को सिर ढके बिना रहने, धूम्रपान करने और पान खाने से सख्ती से मना किया गया था।
इस ऐतिहासिक यात्रा की गरिमा बनाए रखने के लिए स्टेशन पर स्पेशल ट्रेन के आने और जाने के समय घंटियाँ नहीं बजाई गईं। केवल गार्ड की एक छोटी सीटी और ड्राइवर का हल्का हॉर्न ही प्रस्थान का संकेत था। भारी भीड़ के बावजूद ट्रेन बिल्कुल समय पर चली और बिना किसी घटना के अपनी लंबी यात्रा पूरी की। यह भारतीय रेल कर्मचारियों की ओर से महात्मा गांधी को दी गई अनुशासन और समयपालन की सच्ची श्रद्धांजलि थी, क्योंकि गांधी स्वयं समय की पाबंदी और व्यवस्था को अत्यंत महत्व देते थे।
इस कार्य की सराहना करते हुए ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर ने 16 फ़रवरी, 1948 को भारतीय संसद में अपने बजट भाषण के दौरान रेलवे कर्मचारियों की भूमिका को विशेष रूप से उल्लेखनीय बताया।
11 फ़रवरी की सुबह दिल्ली से शुरू हुई यह रेल यात्रा और 12 फ़रवरी को त्रिवेणी संगम पर हुआ अस्थि विसर्जन—दोनों मिलकर भारतीय इतिहास के सबसे भावनात्मक अध्यायों में से एक बन गए। यह यात्रा केवल एक भौतिक मार्ग नहीं थी, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना, अनुशासन और श्रद्धा का प्रतीक बनकर उभरी।
*पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र में 1764 से लेकर 1947 तक की तमाम घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भों पर शोध, लेख एवम् पुस्तक लेखन।
