मार्टिन लूथर किंग जूनियर
– रमेश चंद शर्मा
गांधी के देश में किंग की ऐतिहासिक तीर्थयात्रा
आज भी प्रासंगिक है किंग का भारत से दिया गया संदेश
आज 10 फरवरी है। ठीक इसी दिन 1959 में ‘मेरा एक सपना है’ भाषण के लिए प्रसिद्ध, नागरिक अधिकार आंदोलन के अग्रणी नेता, बैपटिस्ट पादरी और अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर अपनी पत्नी श्रीमती कोरेटा स्कॉट किंग के साथ भारत पहुंचे थे। उन्होंने इस यात्रा को स्वयं “तीर्थयात्रा” कहा था। उनका उद्देश्य सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी से जुड़े स्थलों, कार्यों और प्रयोगों को प्रत्यक्ष देखना और समझना था। यह यात्रा केंद्रीय गांधी स्मारक निधि के निमंत्रण पर 10 फरवरी से 10 मार्च 1959 तक चली और दिल्ली से आरंभ होकर बिहार, बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश होते हुए पुनः दिल्ली में संपन्न हुई। हवाई अड्डे पर श्रीमती सुचेता कृपलानी तथा गांधी स्मारक निधि के मंत्री जी. रामचंद्रन ने उनका स्वागत किया।

महज तीस वर्ष की आयु में मार्टिन लूथर किंग जूनियर गांधी के देश को देखने आए थे। यह उनके जीवन की एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा थी। यात्रा की समाप्ति पर दिल्ली में दिए गए अपने विदाई संदेश में उन्होंने कहा कि भारत की उनकी छोटी-सी तीर्थयात्रा समाप्त हो गई है, इसका उन्हें गहरा दुख है। उन्होंने सरकार, गांधी स्मारक निधि, क्वैकर सेंटर तथा उन सभी परिवारों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने उनके और उनकी पत्नी के लिए अपने घर और दिल खोल दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत जैसे विशाल उपमहाद्वीप को पूरी तरह जान लेना संभव नहीं है, फिर भी उन्होंने यह अनुभव साझा किया कि गांधी की आत्मा भारत में लोगों की सोच से कहीं अधिक जीवंत और सशक्त रूप में विद्यमान है। गांधीजी के पत्र, लेख, स्मारक, गांधी स्मारक निधि का कार्य और संत विनोबा भावे के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों ने इस भावना को स्थायी रूप दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि कई सरकारी अधिकारी, भले ही गांधी का अक्षरशः पालन न करते हों, फिर भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं में उनकी भावना को अपनाने का प्रयास करते हैं।
अपने संदेश में उन्होंने विश्व शांति और निरस्त्रीकरण का प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि दुनिया के शांतिप्रिय लोग अब तक अमेरिका और सोवियत रूस को भय त्याग कर निरस्त्रीकरण के लिए तैयार नहीं कर पाए हैं। विनोबा भावे से हुई बातचीत का उल्लेख करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि भारत जैसे नैतिक साहस वाले देश को एकतरफा निरस्त्रीकरण का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। जिस प्रकार भारत ने दुनिया को यह दिखाया कि स्वतंत्रता अहिंसक मार्ग से प्राप्त की जा सकती है, उसी प्रकार उसे सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण का नेतृत्व करना चाहिए। ऐसा साहसी कदम महात्मा गांधी की भावना का सच्चा प्रदर्शन होगा और शेष विश्व को प्रेरित करेगा। उन्होंने कहा कि ऐसा करने वाला राष्ट्र अपने आप ही मानवता का समर्थन प्राप्त करेगा और आक्रमणकारी शक्तियाँ जनमत के भय से पीछे हटेंगी।

इस यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात संत बाबा विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजाजी राजगोपालचारी, दादा जे.बी. कृपलानी, डॉ. जाकिर हुसैन, काका कालेलकर, यू.एन. ढेबर, मोरारजी देसाई, राजकुमारी अमृत कौर, डॉ. सुशीला नायर, प्यारे लाल नायर, डॉ. आर.आर. दिवाकर, जी. रामचंद्रन, चीनी चिंतक प्रो. तान युन शान, गांधीजी के सहयोगी निर्मल कुमार बोस, डॉ. सौंदरम रामचंद्रन, ई.एम.एस. नंबूदरीपाद, शांति लाल शाह तथा पूर्व राजदूत जी.एल. मेहता सहित अनेक प्रमुख व्यक्तियों से हुई।
दिल्ली में उन्होंने राजघाट पर प्रार्थना की, मुगल गार्डन देखा, प्रेस कॉन्फ्रेंस की, क्वैकर केंद्र और विभिन्न विशिष्ट व्यक्तियों से मिले। सप्रू हाउस में जनसभा को संबोधित किया और रामजस कॉलेज में छात्रों के बीच संवाद हुआ। कोरेटा स्कॉट किंग ने ऑल इंडिया रेडियो स्टूडियो में कार्यक्रम प्रस्तुत किया। पटना में राज्यपाल और मुख्यमंत्री से चंपारण सत्याग्रह पर चर्चा हुई। विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच संवाद हुआ। बोधगया में बुद्ध विहार और बोधि वृक्ष का दर्शन किया तथा विनोबा भावे द्वारा स्थापित समन्वय आश्रम में कार्यक्रम हुए। जयप्रकाश नारायण के सोखोदेवरा आश्रम में ग्राम जीवन की सादगी का अनुभव किया।
शांतिनिकेतन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सांस्कृतिक विरासत का दर्शन किया और चीनी चिंतक प्रो. तान युन शान से भेंट हुई। कलकत्ता में मजदूर नेताओं से बातचीत का अवसर मिला। इस दौरान उन्होंने ट्रेन और ट्रक दोनों से यात्रा की और भारत के सामाजिक विरोधाभासों को निकट से देखा। गांधीजी के सहयोगी निर्मल कुमार बोस से उनकी विशेष भेंट हुई।
दक्षिण भारत की यात्रा में मद्रास में उन्होंने राजभवन में निवास किया और जनसभा व छात्र सभाओं को संबोधित किया। महाबलीपुरम, मदुरै और मीनाक्षी मंदिरों की विशालता देखी। गांधी ग्राम में खादी, ग्रामोद्योग, ग्रामदान और समतामूलक स्वावलंबी समाज के प्रयोगों ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। हरिजन बस्तियों में कार्यक्रम हुए और उन्होंने केले के पत्ते पर जमीन पर बैठकर भोजन किया। पहली बार नारियल पानी और नारियल गिरी का स्वाद चखा। मदुरै के गांधी संग्रहालय में भी उनका विशेष कार्यक्रम हुआ। राजाजी से हुई मुलाकात ने इस यात्रा को और अधिक अर्थपूर्ण बना दिया।
त्रिवेंद्रम में गैर-कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद और राज्यपाल से भेंट हुई। यहां उच्च शिक्षा दर के साथ-साथ शिक्षित बेरोजगारी और खाद्यान्न सामग्री के अभाव की स्थिति सामने आई। उन्होंने समुद्र स्नान और तैराकी का आनंद लिया। कोरेटा स्कॉट किंग ने यहां गीत प्रस्तुत किया और एक विशाल जनसभा को संबोधित किया।
कन्याकुमारी में समुद्र के तट पर एकांत ध्यान किया, गांधी मंडपम देखा और पश्चिम में सूर्यास्त तथा पूर्व में चंद्रमा के उदय का अद्भुत दृश्य एक साथ देखा। बंगलौर और मैसूर में उद्योगों, फैक्ट्रियों और औद्योगिक विकास की झलक देखी। पशु मेला देखा और राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री सहित विभिन्न व्यक्तियों से मुलाकात की। समयाभाव के कारण वृंदावन गार्डन का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। विश्व सांस्कृतिक संस्थान में जनसभा को संबोधित किया।
बंबई में मणि भवन में गांधीजी के जीवन से जुड़ी सामग्री—उनके पत्र, चरखा, बिस्तर और दैनिक उपयोग की वस्तुएं—देखीं। गांधी पर आधारित फिल्म ‘भारत की आवाज’ देखी। ग्रीन होटल में नागरिकों की सभा में उन्होंने अपने अनुभव विस्तार से साझा किए। पूर्व राजदूत जी.एल. मेहता के निवास पर प्रमुख व्यक्तियों की बैठक हुई। अफ्रीकी छात्रों से भेंट और संवाद हुआ। राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मुलाकात की तथा एक अलग से प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की गई।
साबरमती नदी के किनारे स्थित साबरमती आश्रम में उन्होंने प्रार्थना सभा में भाग लिया, जहां से गांधीजी ने दांडी यात्रा आरंभ की थी। विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों से मुलाकात हुई। संत विनोबा भावे से मिलने और भूदान यात्रा में भाग लेने के लिए वे अजमेर और किशनगढ़ पहुंचे। जयप्रकाश नारायण उनके साथ रहे। एक गांव में विनोबा भावे से हुई बातचीत उनकी स्मृतियों में सदा के लिए अंकित हो गई। भूदान यात्रा में बाबा के साथ पैदल चलना उनके लिए विशेष अनुभव रहा।
स्वास्थ्य कारणों से मार्टिन लूथर किंग शांति सेना सम्मेलन में भाग नहीं ले सके, जिसका उन्हें खेद रहा। आगरा में ताजमहल देखकर उन्होंने कहा कि भारत में हिमालय, गांधी और ताजमहल उन्हें सबसे बड़े आश्चर्य लगे। गांधी रचनात्मक कार्यों, स्थलों के दर्शन, गांधीजी से जुड़े व्यक्तियों से मुलाकात और विभिन्न वर्गों के लोगों से संवाद ने इस यात्रा को सार्थक और उपयोगी बनाया।
आज जब दुनिया हिंसा, द्वेष, हथियारों की होड़, शोषण और झूठ के अंधकार में डूबी हुई है, तब मार्टिन लूथर किंग जूनियर का भारत से दिया गया यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। तथाकथित विकास के नाम पर मानवता और प्रकृति दोनों को संकट में डाला जा रहा है। मूल्य और मर्यादा टूट रही हैं। सेवा, सादगी और श्रम के सम्मान की भावना लुप्त होती जा रही है। ऐसे समय में गांधी और किंग द्वारा दिखाया गया सत्य, अहिंसा और करुणा का मार्ग ही मानव समाज को विनाश से बचा सकता है।
यह विडंबना है कि अहिंसा में विश्वास रखने वाले महात्मा गांधी को भारत में तीन गोलियां लगीं और मार्टिन लूथर किंग जूनियर को अमेरिका में बम विस्फोट और गोली का सामना करना पड़ा। फिर भी गांधी का देश भारत आज भी दुनिया को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की राह दिखाने की क्षमता रखता है। गांधी विचार विश्व की धरोहर है और इसे आगे बढ़ाने का साहस हमें ही जुटाना होगा।
आज, 10 फरवरी को, मार्टिन लूथर किंग जूनियर की भारत तीर्थयात्रा की 67वीं वर्षगांठ हमें यह स्मरण कराती है कि अहिंसा केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मानवता की सबसे बड़ी आशा है।
