अरावली। फोटो पारस प्रताप सिंह
संवेदनशील पर्वत, बढ़ती खनिज मांग और नई चुनौतियाँ
जल सम्मेलन में अरावली के भविष्य पर विमर्श
उदयपुर: ऊर्जा संक्रमण, उन्नत प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय अवसंरचना के विस्तार के साथ दुर्लभ खनिज तत्वों तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती माँग ने पर्वतीय और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर अभूतपूर्व दबाव उत्पन्न कर दिया है। इस पृष्ठभूमि में उदयपुर में आयोजित एक जल सम्मेलन के प्रथम दिवस पर यह स्पष्ट किया गया कि अरावली जैसी पर्वतमालाओं का भविष्य अब केवल संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय, पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थिरता से जुड़ा एक व्यापक राष्ट्रीय और वैश्विक प्रश्न बन चुका है।
सम्मेलन में बताया गया कि रेयर अर्थ एलिमेंट्स और अन्य महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की भूमिका ऊर्जा संक्रमण, उन्नत तकनीक और राष्ट्रीय अवसंरचना के विकास में लगातार बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप पर्वतीय और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर दबाव भी तेज़ी से बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया के पारिस्थितिक, सामाजिक और राजनीतिक आयामों को रेखांकित करते हुए यह कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खनिज संसाधन महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु यह सुरक्षा तभी सार्थक होगी जब विकास की प्रक्रिया पर्यावरणीय न्याय, पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थिरता के सिद्धांतों पर आधारित हो। नीति निर्माण में वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय ज्ञान प्रणालियों और सामुदायिक सहभागिता को एकीकृत करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया और अरावली जैसे क्षेत्रों के लिए जिम्मेदार तथा संवेदनशील संसाधन प्रबंधन की दिशा में सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया गया।
जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश से आए विद्वानों, नीति निर्माताओं, पर्यावरणविदों और प्रायोगिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने अरावली पर्वतमाला के पारिस्थितिक महत्व, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में उसकी भूमिका, कृषि को समर्थन देने तथा मानव बस्तियों को स्थायित्व प्रदान करने की उसकी क्षमता पर गहन विमर्श किया। चर्चाओं का केंद्रीय बिंदु यह रहा कि अरावली को केवल खनिज संसाधनों के भंडार या भूगर्भीय संरचना के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिक और सांस्कृतिक तंत्र के रूप में समझा जाना चाहिए।

सम्मेलन की शुरुआत दो पुस्तकों के विमोचन के साथ हुई। पहली पुस्तक “आओ अरावली को जानें”, जिसका संपादन डॉ. राजेंद्र सिंह, डॉ. मंझल सारंगदेवोत और प्रो. युवराज सिंह द्वारा किया गया है, तथा दूसरी पुस्तक “स्वराज आदिज्ञान विरासत यात्रा”, जिसका संपादन प्रो. कर्नल एस. एस. सारंगदेवोत द्वारा किया गया है। इन पुस्तकों के माध्यम से अरावली की पारिस्थितिकी, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय ज्ञान परंपराओं को व्यापक समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया गया।
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए यह रेखांकित किया गया कि अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा अब तत्काल आवश्यकता बन चुकी है। पर्वतों को केवल भूगर्भीय संरचनाओं के रूप में देखने के बजाय उन्हें ऐसे जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में समझना चाहिए जो जल, जैव विविधता, संस्कृति और आजीविका का आधार हैं। अरावली को जीवनदायी प्रणाली बताते हुए इसके महत्व को पारिस्थितिक और सभ्यतागत दोनों दृष्टियों से समझने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
चर्चाओं में भारत के विकासात्मक लक्ष्यों और सततता के बीच संतुलन स्थापित करने की अनिवार्यता को रेखांकित किया गया। भूजल क्षरण, जैव विविधता ह्रास, भूमि क्षति और अनियंत्रित खनन को अरावली के समक्ष प्रमुख चुनौतियों के रूप में प्रस्तुत किया गया। समाधान के रूप में वैज्ञानिक विनियमन, ढाल स्थिरता, उन्नत खनिज प्रसंस्करण तथा परिपत्र पारिस्थितिक आर्थिक मॉडल अपनाने की आवश्यकता बताई गई। अरावली को पारिस्थितिक स्थायित्व की जीवनरेखा के रूप में निरूपित किया गया।
कानूनी और संस्थागत दृष्टिकोण से यह प्रश्न भी सामने आया कि पर्वतों को कैसे परिभाषित और शासित किया जाना चाहिए। उपग्रह चित्रों, स्थलाकृतिक मानचित्रण, इंटरएक्टिव टेरेन ग्रिड्स और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर अरावली को एक कार्यात्मक पारिस्थितिक गलियारे के रूप में देखने का प्रस्ताव रखा गया, जो संयुक्त राष्ट्र की कॉम्पोज़िट माउंटेन सिस्टम अवधारणा से मेल खाता है। पर्यावरण संरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार, अनुच्छेद 48A, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत और अंतरपीढ़ी समानता के सिद्धांत से जोड़ा गया।
सम्मेलन में यह विचार प्रमुख रूप से उभरा कि अरावली की मूल शक्ति वहाँ के समुदायों और उनके दीर्घकालिक पारिस्थितिक संबंधों में निहित है। यह प्रश्न भी उठाया गया कि ऐसे परिदृश्यों की पहचान और भविष्य का निर्धारण सरकार, न्यायपालिका या समुदाय में से कौन करे, और इसके लिए बहु-स्तरीय निर्णय निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है। सतत खनन और वैश्विक अनुभवों के संदर्भ में अरावली की विशिष्ट पहचान पर भी विस्तार से विचार रखा गया।
दार्शनिक दृष्टिकोण से पर्वतों को पवित्र पारिस्थितिक इकाइयों के रूप में देखने की बात कही गई और मानव-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर प्रकृति के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। अरावली को एक पोषण देने वाली माँ के रूप में वर्णित करते हुए इसके अंतर्गत आने वाले बारह भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों—ब्रज, दिल्ली गेट, मेवात, मत्स्य, हाड़ौती, डूंगर, मगरा, मेवाड़, डांग, बागड़, मारवाड़ और शेखावाटी—का उल्लेख किया गया। साथ ही यह भी बताया गया कि भारत में कुल 86 भू-सांस्कृतिक और 50 भौगोलिक इकाइयाँ हैं।
वैज्ञानिक मानचित्रण और जैव विविधता प्रलेखन को संरक्षण प्रयासों की आधारशिला बताया गया और यह कहा गया कि संरक्षण की दिशा में टकराव की बजाय सहमति आधारित दृष्टिकोण अधिक प्रभावी होगा। इस संदर्भ में संस्थागत अनुभवों, विशेषकर केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी), का उल्लेख किया गया। अरावली क्षेत्र में व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की आवश्यकता पर बल देते हुए यह जानकारी दी गई कि सम्पूर्ण अरावली क्षेत्र में 20 विश्वविद्यालयों, 40 महाविद्यालयों और 100 विद्यालयों को जोड़ते हुए जागरूकता एवं जनचेतना कार्यक्रमों के लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने जैविक खेती, मृदा संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों को अरावली क्षेत्र की पहचान का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और आजीविका रणनीतियों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके। साथ ही, लिवेबिलिटी और क्षेत्रीय पहचान जैसे ढाँचों को भू-सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में विकसित करने की जरूरत बताई गई। पारिस्थितिक चिंतन, भू-सांस्कृतिक मानचित्रण और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के समेकन को भविष्य की नीति का आधार माना गया।
सम्मेलन में जिन प्रमुख वक्ताओं और विशेषज्ञों ने विचार रखे, उनमें जल संरक्षण कार्यकर्ता डॉ. राजेंद्र सिंह, जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ के प्रो. कर्नल एस. एस. सारंगदेवोत, विधिक विशेषज्ञ अनुपम सराफ, अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता बैस्टियन मोहरमान, दार्शनिक चिंतक हेल्मुट किन्ज़ेलमैन, वैज्ञानिक मानचित्रण के क्षेत्र से अशोक खुराना, जनार्दन राय नगर विश्वविद्यालय के प्रो. युवराज सिंह, टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख के प्रतिनिधि मैक्स, अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रो. पुनीत कुमार तथा जल और पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. इंदिरा खुराना शामिल रहे। इनके साथ देश-विदेश के अनेक नीति विशेषज्ञ, पर्यावरणविद और अकादमिक प्रतिनिधि भी इस चर्चा में सहभागी बने।
समग्र रूप से, प्रथम दिवस की कार्यवाही ने यह स्पष्ट किया कि अरावली का भविष्य उसे एक पारिस्थितिक गलियारे, सांस्कृतिक परिदृश्य और जीवंत तंत्र के रूप में स्वीकार करने में निहित है। चर्चाओं में समेकित शासन, सामुदायिक सहभागिता, वैज्ञानिक मानचित्रण, सतत कृषि और नैतिक संसाधन प्रबंधन को केंद्रीय तत्व के रूप में रेखांकित किया गया, ताकि अरावली आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्यावरणीय संतुलन और मानव जीवन को सहारा देती रहे।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
