रविवारीय: परीक्षा
– मनीश वर्मा ‘मनु’
पूरे देश भर में विभिन्न बोर्डों द्वारा संचालित दसवीं और बारहवीं कक्षा की परीक्षाएँ अब कुछ ही दिनों में शुरू होने वाली हैं। जनवरी की शुरुआत से ही परीक्षार्थी परीक्षा मोड में आ जाते हैं। धीरे-धीरे वे अपना गियर बदलना शुरू करते हैं। अब तक जो रफ़्तार थोड़ी सुस्त और धीमी थी, वह अब ज़ोर पकड़ लेती है।
अब समय कहाँ बचा है! अब तो, अब तक की गई पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने का वक़्त आ गया है। पढ़ाई अब फ़ोकस्ड हो चुकी है। माँ-बाप की आकांक्षाएँ चुपचाप परवान चढ़ने लगती हैं, लेकिन इन सबसे परे आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने की ज़रूरत है। परेशान बिल्कुल भी नहीं होना है—बस अपने आप पर भरोसा रखना है। सोशल मीडिया से कुछ दिनों के लिए दूरी बना लेनी है ।
एक दिन में रोम नहीं बना था। यह बात आपको बख़ूबी समझ लेनी है ।पढ़ाई एक सतत साधना है, एक तपस्या है। यह बात आपको अच्छे से समझ में आनी चाहिए ।
विद्यार्थियों के संदर्भ में एक बात कही गई है—
“ काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च।
अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं॥”
यह श्लोक एक विद्यार्थी के आदर्श गुणों की ओर संकेत करता है— “कौवे जैसी चेष्टा, बगुले जैसा ध्यान और कुत्ते जैसी नींद। “ अर्थात् सफल होने के लिए ज्ञान की तीव्र इच्छा, एकाग्रता और अनुशासित जीवन अनिवार्य है।
ख़ैर, यह सारी बातें तब बेमानी लगने लगती हैं जब आपकी मेहनत रंग लाती है। सामाजिक पैमानों के अनुसार आप अच्छे अंकों से पास होते हैं। पर क्या अच्छे नंबरों से पास होना ही सफलता है? मेरे विचार से नहीं। अच्छे नंबर बहुत-सी बातों पर निर्भर करते हैं। हाँ, सफलता के लिए यह एक पैमाना अवश्य है—पर अकेला नहीं।
इसलिए पढ़ाई करें ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ। अपने आप पर भरोसा रखें। जैसा कि पहले कहा गया है। पढ़ाई एक सतत साधना है, एक तपस्या है—इस बात को हमेशा ध्यान में रखें। मन में नकारात्मक विचार न आने दें। समय-प्रबंधन की तकनीक अपनाएँ। एक-एक मिनट का सदुपयोग करें।
अब जब परीक्षा की तिथियाँ नज़दीक आ रही हैं, तो शायद बहुत कुछ नया करने की गुंजाइश नहीं है। इसलिए ज़रूरी है कि आपके तरकश में जो तीर पहले से हैं, उनका सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए—इसी पर ध्यान दें। अर्थात् अब तक जो पढ़ा है, उसी को मज़बूत करें। कुछ दिनों के लिए सब कुछ भूलकर अपनी दुनिया—अपनी पढ़ाई—में डूब जाएँ। बहुत जल्द आप महसूस करेंगे कि आपका आत्मविश्वास कितना बढ़ गया है, आपकी सोच कितनी सकारात्मक हो गई है। परीक्षा को लेकर आपका नज़रिया बदल जाएगा और जब यह अवस्था आती है, तो सफलता स्वयं आपके क़दम चूमती है।
हमारा क्या! बतौर माता-पिता हम सब यही चाहते हैं कि हमारा बच्चा सबसे अव्वल हो। दसवीं की परीक्षा से पहले मेरे पिताजी कहा करते थे—
“बेटा, यह आयरन गेट है। यहाँ से बढ़िया से निकलोगे, तो दुनिया तुम्हारे क़दमों में होगी।”
तब ये बातें पूरी तरह समझ में नहीं आती थीं, आज उसका अर्थ साफ़ दिखता है। आज हम आप बच्चों से बस यही चाहेंगे कि आप अपनी क्षमता के अनुरूप सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें और अपने माता-पिता व परिवार का नाम रोशन करें।
और अंत में—
“ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
बस अपना कर्म करते जाएँ, फल की चिंता छोड़ दें । आप सभी परीक्षार्थियों को आने वाली परीक्षाओं के लिए अनंत, असीम शुभकामनाएँ।
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