हरिद्वार में अदालती प्रतिबंधों के बीच कॉलोनी विवाद, साधु का अनशन
अनशन से उठे प्रशासनिक सवाल
हरिद्वार: 31 जनवरी से हरिद्वार स्थित मातृ सदन आश्रम में ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द अनिश्चितकालीन अनशन पर हैं। यह सत्याग्रह 28 जनवरी को ग्राम नूरपुर पंजनहेड़ी में हुई राजस्व पैमाइश से जुड़े घटनाक्रम और उससे उत्पन्न आपराधिक मामले के विरोध में शुरू किया गया है। मातृ सदन का कहना है कि इस प्रकरण में उसके एक संत ब्रह्मचारी सुधानन्द को गलत तरीके से अभियुक्त बनाया गया है और यह आंदोलन उसी के विरोध तथा निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच की माँग को लेकर किया जा रहा है।
मातृ सदन ने स्पष्ट किया है कि ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द स्वयं इस आपराधिक मामले में न तो अभियुक्त हैं और न ही प्रत्यक्ष पक्षकार। वे अपने आश्रम से जुड़े ब्रह्मचारी सुधानन्द के समर्थन में अनशन कर रहे हैं। आश्रम का तर्क है कि यह आंदोलन किसी हिंसक घटना के पक्ष में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया के विरोध में है जिसके तहत एक संत को कथित रूप से अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। संस्थान के अनुसार यह मामला केवल एक प्राथमिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि भूमि उपयोग, प्रशासनिक कार्रवाई और न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन चुका है।
हरिद्वार स्थित मातृ सदन केवल एक धार्मिक आश्रम नहीं, बल्कि गंगा संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा से जुड़ा एक सक्रिय सामाजिक मंच रहा है। पिछले एक दशक में यह आश्रम तब राष्ट्रीय चर्चा में आया था, जब इसके संतों ने गंगा में अवैध खनन, नदी तट पर अतिक्रमण और न्यायालयीन आदेशों के उल्लंघन के खिलाफ लंबे अनशन किए थे। वर्ष 2018 में गंगा संरक्षण से जुड़े अनशन के दौरान कुछ संतों की मृत्यु के बाद मातृ सदन के आंदोलनों को प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर विशेष ध्यान मिला था। आश्रम अपने आंदोलनों को अहिंसक सत्याग्रह की परंपरा में प्रस्तुत करता रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में मातृ सदन के वर्तमान आरोपों को एक लंबे सामाजिक संघर्ष की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है। आश्रम का कहना है कि यह पूरा प्रकरण भूमि माफिया, अवैध कॉलोनियों और प्रशासनिक उदासीनता से जुड़ा हुआ है और एक संत को अभियुक्त बनाकर वास्तविक प्रश्नों से ध्यान हटाने का प्रयास किया गया है। संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी प्रमुख माँग ब्रह्मचारी सुधानन्द का नाम प्राथमिकी से हटाने और पूरे मामले की स्वतंत्र तथा उच्चस्तरीय जाँच कराए जाने की है।
ब्रह्मचारी सुधानन्द ने अपने विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी को चुनौती देते हुए अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दाख़िल की है, जो वर्तमान में विचाराधीन है। जमानत आवेदन में कहा गया है कि प्राथमिकी में उन्हें जिस रूप में अभियुक्त बनाया गया है, वह वास्तविक घटनाक्रम से मेल नहीं खाता। याचिका के अनुसार वे पेशे से अधिवक्ता हैं, संन्यास ग्रहण करने के बाद मातृ सदन, जगजीतपुर हरिद्वार में निवासरत हैं और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
जमानत याचिका के अनुसार 28 जनवरी की सुबह लगभग 10 बजे पटवारी द्वारा शिकायतकर्ता अतुल चौहान को पैमाइश के लिए फोन किया गया था। अतुल चौहान वही व्यक्ति हैं जिन्होंने कथित अवैध निर्माण को लेकर शिकायत की थी और इस विषय से संबंधित याचिका में भी जुड़े रहे हैं। ब्रह्मचारी सुधानन्द का कहना है कि वे उसी सूचना पर घटनास्थल के पास पहुँचे थे, लेकिन वाहन से बाहर नहीं उतरे और कुछ दूरी पर गाड़ी खड़ी कर दी। उनके अनुसार पूरे घटनाक्रम की एक वीडियो क्लिप तथा संबंधित कॉल रिकॉर्डिंग उनके पास सुरक्षित है, जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि ये साक्ष्य प्राथमिकी में वर्णित कथन से भिन्न स्थिति दर्शाते हैं।
प्राथमिकी अमित चौहान की शिकायत पर दर्ज की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पैमाइश के दौरान विवाद बढ़ने पर फायरिंग हुई और सचिन चौहान तथा एक अन्य व्यक्ति घायल हुए। पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 109 (हत्या के प्रयास) सहित अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि मुख्य अभियुक्त अतुल चौहान ने आत्मसमर्पण कर दिया है और मामले की जाँच जारी है।\मातृ सदन का तर्क है कि यह घटना केवल एक आपराधिक विवाद नहीं है, बल्कि कृषि और बाग भूमि पर गैर-कृषि उपयोग को लेकर वर्षों से चल रहे संघर्ष की एक कड़ी है। आश्रम के अनुसार उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में कृषि एवं बाग भूमि पर कॉलोनी कटान, समूह आवास और अन्य गैर-कृषि निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल 2024 को भी यथावत रखा। इसके बावजूद नूरपुर पंजनहेड़ी और आसपास के क्षेत्रों में कथित रूप से बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग परिवर्तन और अवैध प्लॉटिंग की गई।
मातृ सदन का कहना है कि उसने इस संबंध में 14 जनवरी 2026 को जिला प्रशासन और हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण को खसरा संख्या 154 और 158 में स्वीकृत क्षेत्र से कहीं अधिक भूमि पर प्लॉटिंग किए जाने की शिकायत दी थी। इसके बाद अपर जिलाधिकारी कार्यालय और विकास प्राधिकरण की ओर से रिपोर्ट तलब की गई, लेकिन 27 जनवरी तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। आश्रम का दावा है कि इसी पृष्ठभूमि में 28 जनवरी की पैमाइश के दौरान विवाद उत्पन्न हुआ।
जमानत याचिका में यह भी कहा गया है कि प्राथमिकी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के रूप में दर्ज की गई है और यदि आवेदक को गिरफ्तार किया जाता है तो इससे न केवल उनके मौलिक अधिकार प्रभावित होंगे, बल्कि एक संत, अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी अपूरणीय क्षति पहुँचेगी। याचिका में अदालत से अग्रिम जमानत का संरक्षण देने और निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।’
इन कानूनी दलीलों और प्रशासनिक विवादों के बीच ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द का अनशन लगातार जारी है। मातृ सदन का कहना है कि यह सत्याग्रह किसी एक व्यक्ति की रिहाई तक सीमित नहीं, बल्कि भूमि संरक्षण, न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन और कानून के शासन की कसौटी बन चुका है। अब अदालत द्वारा जमानत याचिका पर लिया जाने वाला निर्णय और प्रशासन की प्रतिक्रिया इस पूरे प्रकरण की दिशा तय करेगी, जबकि मातृ सदन में जारी यह अनशन इस मामले को स्थानीय विवाद से आगे बढ़ाकर राज्यव्यापी बहस का विषय बना चुका है।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
