– ज्ञानेन्द्र रावत*
तालाब, झील और अमृत सरोवर: संरक्षण की विफल कहानी
प्रकृति से संघर्ष ने आद्रभूमियों को संकट में डाला
आज विश्व आद्रभूमि दिवस है, लेकिन दावों और वास्तविकता के बीच गहरा अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। देश में आद्रभूमियों के नाम पर अब बहुत सीमित क्षेत्र ही बचे हैं जिन्हें वास्तव में आद्रभूमि कहा जा सकता है। अधिकांश स्थानों पर अतिक्रमण हो चुका है और जो भूमि बची है, वह भी प्रदूषण और उपेक्षा के कारण अनुपयोगी होती जा रही है।
तालाब भारतीय समाज की पारंपरिक जल संचयन व्यवस्था की आधारशिला रहे हैं। लेकिन भौतिकवाद और निजी स्वार्थ ने उस सामाजिक संरचना को कमजोर कर दिया है। पर्यावरणविद और जल विज्ञानी अनुपम मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में उल्लेख किया है कि एक समय देश में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग पाँच से छह लाख गांव और शहर थे और तालाबों की संख्या करीब तीस लाख के आसपास थी।
विशेषज्ञों और पर्यावरण अध्ययनों के अनुसार, लालच और अतिक्रमण के कारण बीस लाख से अधिक तालाब या तो समाप्त हो चुके हैं या अपनी पहचान खो चुके हैं। वर्तमान में देश में अनुमानतः केवल आठ से नौ लाख तालाब ही बचे हैं। इनमें से भी बड़ी संख्या भूमाफियाओं के कब्जे में चली गई है, जहां कहीं बहुमंजिला इमारतें और कहीं व्यावसायिक परिसर खड़े कर दिए गए हैं। कई तालाबों को सरकारी कूड़ाघर में बदल दिया गया है।
आद्रभूमि संरक्षण: योजनाएँ बहुत, परिणाम कम
सरकार संरक्षण के दावे तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत दिखाई देती है। विभिन्न योजनाओं के तहत तालाबों के पुनरुद्धार और पुनर्जीवन की बातें होती हैं, जबकि व्यवहार में उनमें सीवर का पानी भरकर उनके ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व को समाप्त किया जा रहा है। जो तालाब जल संचयन, खेती, पशुपालन, मत्स्य पालन और जलजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे तथा पूरे पारिस्थितिकीय तंत्र की रीढ़ माने जाते थे, उन्हें ही धीरे-धीरे नष्ट किया जा रहा है। ऐसे हालात में पशुपालन, कृषि और जल संरक्षण की कल्पना भी निरर्थक प्रतीत होती है।
यही स्थिति झीलों के साथ भी देखने को मिलती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन परिस्थितियों में भूजल के शुद्ध बने रहने की संभावना बेहद कम हो जाती है। सौंदर्यीकरण और विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन उनका लाभ पारिस्थितिक संतुलन को नहीं मिल पा रहा है। यह सरकारी नीतियों की अविवेकपूर्ण दिशा को दर्शाता है।
राजधानी दिल्ली का उदाहरण इस संकट को और स्पष्ट करता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण की विभिन्न टिप्पणियों और रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में अधिकांश तालाब अब केवल सरकारी अभिलेखों में ही शेष रह गए हैं। कहीं उन्हें समतल कर व्यावसायिक परिसरों में बदल दिया गया है, कहीं वे बदबूदार गंदे पानी से भरे हैं और कहीं कूड़े-करकट के डंपिंग ग्राउंड बन चुके हैं। अब सरकार सीवर के पानी को शुद्ध कर तालाबों में भरने की योजना बना रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि तालाब एक जीवित पारिस्थितिकीय तंत्र होते हैं और जब तक उनका जलग्रहण क्षेत्र मुक्त नहीं होगा तथा प्राकृतिक बहाव बहाल नहीं होगा, तब तक केवल उपचारित सीवर जल से तालाबों का वास्तविक स्वरूप वापस नहीं आ सकता।
अमृत सरोवर योजना की जमीनी स्थिति भी कई सवाल खड़े करती है। मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय निरीक्षणों के अनुसार, अनेक स्थानों पर केवल गड्ढे दिखाई देते हैं, कहीं पानी नहीं है और कहीं वे दलदल व कीचड़ से भरे हुए हैं। कुछ क्षेत्रों में उनका नामोनिशान तक नहीं मिलता। जब इनकी स्थिति की जांच के लिए गांवों में जाया जाता है, तो कई बार ग्राम प्रधान, सरपंच और ग्रामीण विकास विभाग के संबंधित कर्मचारी अनुपस्थित पाए जाते हैं। यह अमृत सरोवरों की वास्तविक तस्वीर को उजागर करता है।
आद्रभूमि संरक्षण अपने आप में एक जटिल चुनौती है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और अन्य अध्ययनों के अनुसार, देश की लगभग 27 से 30 प्रतिशत भूमि किसी न किसी रूप में क्षरण या बंजरपन की स्थिति में पहुंच चुकी है और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। इस तथ्य से नीति निर्धारक और देश का नेतृत्व भी भलीभांति अवगत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बुजुर्गों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव के बिना आद्रभूमियों का संरक्षण संभव नहीं है। लेकिन जब विकास के नाम पर स्वयं सरकारी नीतियां ही प्रकृति के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर रही हों, तब आद्रभूमि संरक्षण की राह और कठिन हो जाती है। ऐसे हालात में यह स्पष्ट है कि जब तक प्रकृति के साथ संतुलन नहीं साधा जाएगा, तब तक आद्रभूमियों का संरक्षण केवल कागजी दावा बनकर रह जाएगा।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
