कोटा में चम्बल रिवर फ्रंट की दीवाल के ऊपर घड़ियाल
– बृजेश विजयवर्गीय*
स्वच्छ पानी की तलाश में लौटा प्राचीन घड़ियाल
नमस्ते! मैं हूँ घड़ियाल। हाँ, वही प्राचीन सरीसृप, जिसकी लंबी, पतली और संकरी थूथन मछलियाँ पकड़ने के लिए बनी है। मेरे सिर पर गोल उभार — जिसे लोग ‘घड़ा’ कहते हैं — मेरी पहचान बताता है। मेरा शरीर सुदृढ़ शल्कों से ढका है, मेरी शक्तिशाली पूँछ और जालदार पैर मुझे जल में तेज़ी से तैरने में मदद करते हैं।
काफी समय तक लोग कहते रहे, “कोटा में तुम्हारा घर बदल गया।” आज जब मैं लौटकर आया, तो देखा कि रिवरफ्रंट बन चुका था। नदी के किनारे सुंदर पत्थरों से सजावट, नए पुल और रैंप। पर पानी… पानी अभी भी गंदा है। मैंने धीरे-धीरे तैरते हुए अपने आसपास देखा — शायद मैं स्वच्छ पानी की तलाश में ऊपर आया हूँ।
मैंने अपने पुराने रिश्तेदारों को देखा। मगरमच्छ अभी भी बचे खुचे हैं, ओटर मुश्किल से दिखाई दे रहे हैं, कछुए किनारों पर छिपकर रहते हैं, और मछलियाँ केवल कुछ स्वच्छ हिस्सों में तैर रही हैं। मैं उनके पास धीरे-धीरे तैरता हूँ और सोचता हूँ, “हमारा सह-अस्तित्व कितना नाजुक है।” कभी-कभी ओटर मेरे पास खेलते हैं, मगरमच्छ दूर से देख रहे हैं, और मछलियाँ डरकर पल भर में गायब हो जाती हैं।
एएच जैदी, वरिष्ठ वन्यजीव छायाकार, ने मुझे कैमरे में कैद किया। लोग मेरी वापसी देखकर खुश हुए। पर सच्चाई यह है कि नदी की स्थिति गंभीर है। स्टेड ब्रिज के नीचे पानी अब असंभव रूप से प्रदूषित है। केवल रिवरफ्रंट के कुछ हिस्सों में ही हमारी संभावनाएँ बची हैं। अगर वन और वन्यजीव विभाग मेरी निगरानी नहीं करेगा, तो भविष्य में मैं और मेरे साथी फिर दूर चले जाएंगे।
याद कीजिए, मैं सिर्फ एक प्राणी नहीं हूँ। मैं पारिस्थितिकी का शीर्ष उपभोक्ता हूँ। मछलियों की संख्या नियंत्रित करता हूँ, नदी के जैविक संतुलन को बनाए रखता हूँ। मेरा संरक्षण केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि पूरी नदी, उससे जुड़े जीव-जंतु और मानव जीवन के लिए जरूरी है। मेरी उपस्थिति नदी के स्वास्थ्य और स्वच्छता का संकेत देती है।
नयापुरा साइड की चम्बल में कई मगरमच्छ प्रदूषण के कारण मर चुके हैं। यहाँ कभी घड़ियालों की संख्या बहुत अधिक थी, इसलिए चम्बल अपस्ट्रीम को राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य में शामिल किया गया। लेकिन मानवीय गतिविधियाँ और प्रदूषण बढ़ने से कोटा से घड़ियाल गायब हो गए।
अभी भी धौलपुर क्षेत्र में प्रजनन केंद्र चल रहा है, जहाँ घड़ियालों के अंडों की सुरक्षा की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले (पचनदा क्षेत्र) में भी घड़ियालों की अच्छी संख्या देखी जाती है। यह दिखाता है कि अगर प्रयास किए जाएँ, तो हमारी प्राचीन प्रजाति सुरक्षित रह सकती है।
जब मैं तैरते हुए अपने पुराने घर के पास पहुँचा, तो देखा कि मेरा घर, जो मेरे पूर्वजों और मुझे राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य के नाम आवंटित था, अब किसी और के अधीन हो गया। मेरे चारों ओर पत्थर से बनी नई संरचनाएँ, रैंप और लोगों का हल्ला-गुल्ला। पर मैंने अपने भाई बंधुओं और पड़ोसियों की ओर देखा — ओटर, मगरमच्छ, कछुए, मछलियाँ, भालू, पैंथर, बंदर — सब अभी भी वहीं थे। कभी-कभी हम लड़ते भी हैं, पर सह-अस्तित्व हमारा पुराना है। हमारी नदियाँ हमारी माँ हैं, और हम सब उसकी गोद में एक साथ रहते हैं।
मैं आपसे सीधे बात करना चाहता हूँ — क्या आप मेरी मदद करेंगे? क्या आप मेरी नदी को फिर से स्वच्छ बनाएंगे? क्या आप देखेंगे कि हमारे जैसे दुर्लभ जीव सुरक्षित रह सकें? मेरा अस्तित्व केवल मेरा नहीं है; यह नदी, उसके जीव-जंतु और आपके भविष्य का प्रतीक है। अगर मेरी सुरक्षा नहीं हुई, तो मेरी वापसी केवल एक क्षणिक घटना बनकर रह जाएगी।
तो याद रखिए — मैं हूँ घड़ियाल। मैं लौट आया हूँ। मैं तैर रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ। और अब मैं आपको भी देख रहा हूँ। क्या आप भी देख रहे हैं?
*स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
