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January 27, 2026

3 thoughts on “रविवारीय: लखनऊ की एक सर्द रात

  1. बहुत खूब

    जनवरी की रात में ठिठुरता लखनऊ

    कोहरे की चादर से ढका लखनऊ

    नुक्कड पर एक रिक्शा अब भी खड़ा है

    सवारी की तलाश में जगा है लखनऊ

  2. बहुत ही संवेदनशील और जीवंत लेखन। लखनऊ की सर्द रात, हज़रतगंज का माहौल और रिक्शेवाले की ज़िंदगी—सब कुछ इतने सहज ढंग से उकेरा गया है कि पाठक खुद को कहानी के बीच पाता है। आम इंसान के दर्द, संघर्ष और भीतर की शांति को बेहद मानवीय रूप में प्रस्तुत किया गया है। सरल भाषा में गहरी बात कहने की यह कला सचमुच सराहनीय है

  3. श्री वर्मा जी की लेखनी लखनऊ की सर्द रात को केवल मौसम या शहर के दृश्य तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ का सशक्त प्रतीक बना देती है। गलन भरी ठंड, सुनसान सड़कें और थमती हुई रफ्तार के बीच लेखक ने उस वर्ग की पीड़ा को स्वर दिया है, जो प्रायः हमारी दृष्टि से ओझल रह जाता है। अमित और कमलेश का संवाद इस कथा की केन्द्रीय धुरी है। यह संवाद बनावटी नहीं, बल्कि जीवन के संघर्ष से उपजा हुआ है। कमलेश का अतीत बिना किसी अतिरंजना के प्रस्तुत हुआ है, जिससे उसकी वेदना और अधिक वास्तविक प्रतीत होती है। यह कहानी यह भी दर्शाती है कि आधुनिक साधनों और ई-रिक्शा जैसे परिवर्तनों ने किस तरह परंपरागत मेहनतकशों को हाशिये पर ला खड़ा किया है। रिक्शा यहाँ मात्र एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि स्मृतियों, संवादों और आत्मीयता का माध्यम बन जाता है। अमित का संवेदनशील स्वभाव यह संकेत देता है कि किसी को ध्यानपूर्वक सुन लेना भी अपने-आप में एक मानवीय सेवा है। कमलेश के चेहरे पर उभरती शांति इस बात की पुष्टि करती है कि जब मन का बोझ शब्दों में ढलता है, तो पीड़ा कुछ हल्की हो जाती है। अँधेरी रात और बढ़ती सर्दी एक ऐसे गहरे प्रतीक के रूप में सामने आती है जहां यह केवल मौसम की ठंड नहीं, बल्कि समाज की उस उदासीनता का संकेत है, जो ऐसे असंख्य कमलेशों को चुपचाप जीने पर विवश कर देती है।
    समग्र रूप से कहें तो श्री वर्मा जी ने अपनी लेखनी से संवेदना, यथार्थ और करुणा को संतुलित और प्रभावशाली ढंग से उकेरा है, जो पाठक को भीतर तक सोचने के लिए विवश करती है।

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