– आलोक कुमार*
नौ साल बाद ‘सनम तेरी कसम’ ने थिएटरों में रच दिया जादू
बॉलीवुड में री-रिलीज का जादू एक बार फिर सिर चढ़कर बोल रहा है और इसकी सबसे सशक्त मिसाल बनकर उभरी है राधिका राव और विनय सप्रू की नौ साल पुरानी प्रेम कहानी “सनम तेरी कसम”। 2016 में औसत प्रदर्शन करने वाली यह फिल्म आज दोबारा रिलीज होकर थिएटरों में भावनाओं का ज्वार ले आई है। पहले हफ्ते में ही 50 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुकी यह फिल्म अब सौ करोड़ के क्लब की ओर बढ़ती दिख रही है, और इसके पीछे केवल नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि नौ वर्षों में पनपा एक गहरा दर्शक-संवाद है।

“ग्लोबल बिहारी” से विशेष बातचीत में विनय सप्रू और राधिका राव ने साफ कहा कि यह कोई अचानक घटा चमत्कार नहीं है। राधिका राव के अनुसार, फिल्म को दर्शकों ने बीते आठ-नौ वर्षों से ओटीटी, सैटेलाइट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगातार देखा, सराहा और सबसे ज्यादा यह अफसोस जताया कि वे इसे थिएटर में क्यों नहीं देख पाए। यही लगातार चलती रही ‘चैटर’—फैन से फैन के बीच—इस री-रिलीज की असली नींव बनी। निर्माताओं के मुताबिक, कश्मीर से कन्याकुमारी और बंगाल से पंजाब तक दर्शकों ने खुद वादा किया था कि अगर फिल्म फिर से आई तो वे थिएटर भर देंगे, और इस बार उन्होंने वह वादा निभाया।
विनय सप्रू ने बताया कि री-रिलीज का फैसला किसी ट्रेंड, प्रयोग या अचानक उठे विचार का नतीजा नहीं था। एक निर्णायक मोड़ तब आया जब सालों तक सोशल मीडिया और निजी संदेशों के जरिए दर्शक लगातार यह कहते रहे कि इस फिल्म को थिएटर में न देख पाने का उन्हें अफसोस है। यह दबाव इतना निरंतर और व्यापक था कि अंततः फिल्म को बड़े पर्दे पर वापस लाने का निर्णय लगभग अनिवार्य हो गया। उनके शब्दों में, यह फिल्म की नहीं, दर्शकों की जीत है।
2016 की पहली रिलीज से जुड़ी एक अहम परत भी उन्होंने साझा की। फिल्म को जानबूझकर नए कलाकारों—हर्षवर्धन राणे और मावरा होकेन—के साथ बनाया गया था, क्योंकि कहानी पर पूरा भरोसा था। लेकिन स्टार पावर न होने के कारण फिल्म को न तो पर्याप्त मार्केटिंग मिली और न ही व्यापक थिएटर सपोर्ट। पहले दिन सवा करोड़, दूसरे दिन सवा करोड़ और तीसरे दिन 1.35 करोड़ की कमाई के बावजूद फिल्म को जल्द ही स्क्रीन से हटाया जाने लगा। उस दौर में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स आज जितने प्रभावशाली नहीं थे और दर्शकों तक पहुंचने के रास्ते में कई बाधाएँ थीं।
नौ साल बाद वही डिजिटल क्रांति इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन गई। सोशल मीडिया, ओटीटी और यूट्यूब के जरिए फिल्म नई पीढ़ी तक पहुंची, जिन्होंने इसे पहले निजी तौर पर जिया और अब सार्वजनिक तौर पर थिएटर में मनाया। आज के थिएटर दृश्य किसी फिल्म स्क्रीनिंग से ज्यादा एक लाइव अनुभव बन चुके हैं—जैसे ही गाना शुरू होता है, पूरा हॉल साथ गाने लगता है, तालियां बजती हैं, लोग भावुक हो जाते हैं और अपने जज़्बात बिना झिझक जाहिर करते हैं।
इस सफलता में संगीत की भूमिका को रेखांकित करते हुए विनय सप्रू ने साफ कहा कि “सनम तेरी कसम” आज जिस मुकाम पर है, वहां तक पहुंचने में संगीत की भूमिका सबसे निर्णायक रही है। उन्होंने संगीतकार हिमेश रेशमिया का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि अगर इस फिल्म के गीत दर्शकों के दिलों में इतने गहरे न उतरते, तो न तो यह कहानी इतने वर्षों तक जीवित रहती और न ही री-रिलीज पर ऐसा भावनात्मक विस्फोट देखने को मिलता। राधिका राव ने भी माना कि यह फिल्म सीन-दर-सीन संगीत के साथ सांस लेती है, और यही वजह है कि नौ साल बाद भी दर्शक गानों के साथ खुद को उसी तीव्रता से जोड़ पाते हैं।
निर्माताओं का मानना है कि ओटीटी ने थिएटर को खत्म नहीं किया, बल्कि फिल्मों से गीत-संगीत को धीरे-धीरे हटाने की प्रवृत्ति ने दर्शकों को बड़े पर्दे से दूर किया। “सनम तेरी कसम” की री-रिलीज ने यह साफ कर दिया कि जब कहानी और संगीत दिल से जुड़े हों, तो दर्शक खुद थिएटर की ओर लौटते हैं। विनय सप्रू के मुताबिक, भारतीय दर्शक सिर्फ तकनीक, एक्शन या भव्यता से नहीं, बल्कि आत्मा को छू लेने वाले गीत-संगीत से जुड़ते हैं—और यही बॉलीवुड की मूल पहचान है।
फिल्म की कहानी को लेकर 2016 में जो आलोचनाएँ हुई थीं, उन पर भी दोनों ने खुलकर बात की। शादी, परिवार, पिता के प्रति सम्मान और ‘सनम’ व ‘कसम’ जैसे शब्दों को आउटडेटेड कहने वालों को समय ने खुद जवाब दे दिया है। विनय सप्रू ने बताया कि फिल्म का क्लाइमेक्स हरिवंश राय बच्चन की कविता से प्रेरित था, और यही भावनात्मक गहराई आज की युवा पीढ़ी को सबसे ज्यादा छू रही है।
इंटरव्यू का सबसे चौंकाने वाला पहलू युवा दर्शकों को लेकर सामने आया। विनय सप्रू के अनुसार, 18–20 वर्ष की उम्र के दर्शक—जिन्होंने 2016 में फिल्म को रिलीज के समय देखा ही नहीं था—आज सबसे ज्यादा भावनात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं। उनके लिए यह किसी पुराने दौर की कहानी नहीं, बल्कि पहले प्रेम की वही मासूमियत और सच्चाई है, जिसे वे खुद महसूस करना चाहते हैं। यही पीढ़ी थिएटरों में सबसे ज्यादा रोती, तालियां बजाती और गानों के साथ पूरी तरह जुड़ती नजर आ रही है।
राधिका राव और विनय सप्रू की जोड़ी, जिसने दो दशकों में 200 से ज्यादा म्यूजिक एल्बम और कई यादगार गीत दिए हैं, मानती है कि उनका साथ इसलिए टिका है क्योंकि वे असहमति को दबाते नहीं, लेकिन एक-दूसरे को माफ करना जानते हैं। यही दर्शन “सनम तेरी कसम” की आत्मा में भी दिखाई देता है—टूटे दिलों, जुड़ते रिश्तों और बिना शोर किए बहते प्रेम की कहानी।
इस तरह “सनम तेरी कसम” अब सिर्फ एक सफल री-रिलीज नहीं, बल्कि एक ऐसी फिल्म की पुनर्खोज बन चुकी है जिसे समय ने दोबारा परखा और दर्शकों ने उसे क्लासिक का दर्जा दिया। नौ साल पहले जिसे औसत कहकर आगे बढ़ा दिया गया था, वही फिल्म आज यह साबित कर रही है कि सच्चा प्रेम, संवेदनशील कहानी और रूहानी संगीत देर से ही सही, लेकिन अपना न्याय ज़रूर पाते हैं—और थिएटर फिर से जीवित हो उठते हैं।
*वरिष्ठ पत्रकार
