निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस
– ओंकारेश्वर पांडेय*
मादुरो का आधी रात का ‘एक्सट्राडिशन’: प्रेम, सत्ता और वैश्विक भूचाल
कराकस से वॉशिंगटन तक: एक गिरफ्तारी के कई मायने
कराकस की आधी रात में अमेरिकी डेल्टा फोर्स द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस की गिरफ्तारी केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी—यह प्रेम, राजनीति और सत्ता की दशकों लंबी गाथा का नाटकीय अंत था। यह वही क्षण था, जब निजी जीवन और वैश्विक राजनीति एक-दूसरे में घुलते दिखाई दिए। वेनेज़ुएला के नागरिकों के लिए यह अविश्वास का क्षण था: उनकी “फर्स्ट कॉम्बैटेंट” कहलाने वाली फ्लोरेस को उनके पति के साथ ले जाया गया। दुनिया के लिए यह संप्रभुता, न्याय और महिला नेतृत्व पर बहस छेड़ने वाला भूचाल था, जिसकी गूँज लैटिन अमेरिका से लेकर यूरोप और एशिया तक सुनाई दी।
क्यों दोनों को पकड़ा गया?
इस प्रश्न ने उसी रात कराकस से लेकर वॉशिंगटन तक राजनीतिक बहस को जन्म दिया। अमेरिकी कार्रवाई का लक्ष्य मादुरो पर लगे नार्को-टेररिज़्म और भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तारी था। लेकिन फ्लोरेस केवल साथ में पकड़ी गई महिला नहीं थीं—वह सत्ता का अभिन्न हिस्सा थीं। वकील, नेशनल असेंबली की पूर्व अध्यक्ष और मादुरो की सबसे करीबी सलाहकार के रूप में उन्हें भी जिम्मेदार माना गया। इसीलिए यह कार्रवाई केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरे सत्ता-तंत्र पर केंद्रित थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे “30 मिनट की कानून प्रवर्तन कार्रवाई, न कि आक्रमण” बताया। यह बयान स्वयं में संदेश था। वेनेज़ुएला सरकार ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन कहा, जबकि अमेरिका ने इसे न्यायिक प्रत्यर्पण करार दिया। दोनों दावों के बीच सच्चाई का संघर्ष अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुलकर सामने आ गया।
आरोप
मादुरो पर नार्को-टेररिज़्म, ड्रग तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग, भ्रष्टाचार, चुनाव धांधली और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप हैं। 2020 से उन पर 15 मिलियन डॉलर का इनाम था। यह तथ्य लंबे समय से अमेरिकी नीति का आधार रहा। फ्लोरेस पर भी भ्रष्टाचार और रिश्तेदारों को सत्ता में बैठाने के आरोप लगे। उनके भतीजे 2016 में अमेरिका में ड्रग तस्करी के मामले में दोषी पाए गए। यह पारिवारिक प्रकरण उनके सार्वजनिक जीवन पर लगातार साया बनकर रहा।
वेनेज़ुएला की जनता की भावनाएँ
इन आरोपों और गिरफ्तारी के बाद जनता की प्रतिक्रिया एकरूप नहीं थी। कराकस की सड़कों पर प्रतिक्रियाएँ बंटी हुई थीं। विपक्षी समर्थक “¡लिबर्टाद, लिबर्टाद!” के नारे लगाते हुए झंडे लहरा रहे थे। वहीं मादुरो समर्थकों में शोक और गुस्सा था। फ्लोरेस को कई लोग “बोलीवारियन आंदोलन की माँ” मानते थे। उनका टीवी कार्यक्रम “कॉन सिलिया एन फामिलिया” घरेलू गर्माहट और मातृत्व का चेहरा दिखाता था, जबकि आलोचक उन्हें भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का प्रतीक मानते थे। इस विरोधाभास ने ही उन्हें एक साथ लोकप्रिय और विवादास्पद बना दिया।
अमेरिका और यूरोप की प्रतिक्रिया
घटना की अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने इसके भू-राजनीतिक निहितार्थ और गहरे कर दिए। वॉशिंगटन में ट्रम्प की घोषणा को समर्थकों ने निर्णायक बताया, लेकिन आलोचकों ने इसे खतरनाक मिसाल कहा। सीएनएन ने लिखा: “गहरे में यह कार्रवाई अमेरिका की निकटवर्ती क्षेत्रों पर नियंत्रण की महत्वाकांक्षा है, जिसे उन्होंने अपडेटेड मोनरो डॉक्ट्रिन कहा।”
यूरोप में नेताओं ने संयम बरतने की अपील की। महिला नेताओं ने विशेष चिंता जताई, यह रेखांकित करते हुए कि मामला केवल राजनीति का नहीं, बल्कि प्रतीकवाद का भी है।
- जर्मन चांसलर एनालेना बेयरबॉक: “एक महिला नेता की गिरफ्तारी न्याय का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसे अपमान नहीं बनना चाहिए।”
- मिशेल बाचेलेट (पूर्व चिली राष्ट्रपति): “वह लोकप्रिय भी थीं और दोषी भी। न्याय निष्पक्ष होना चाहिए।”
- मलाला यूसुफज़ई: “महिला नेताओं को भी जवाबदेह ठहराना चाहिए, लेकिन उनके संघर्षों को याद रखना ज़रूरी है।”
प्रेम कहानी और निजी जीवन
इस वैश्विक घटनाक्रम के पीछे एक गहरी निजी कहानी भी है।
मादुरो और फ्लोरेस की कहानी राजनीति और प्रेम का संगम है। 1990 के दशक में फ्लोरेस ने ह्यूगो शावेज़ का बचाव किया, वहीं मादुरो बस ड्राइवर और यूनियन नेता थे। दोनों का रोमांस समाजवाद की लहर में पनपा।
2013 में उन्होंने विवाह किया। मादुरो उन्हें अपनी “आध्यात्मिक मार्गदर्शक” कहते हैं। फ्लोरेस ने कैथोलिक धर्म छोड़कर साईं बाबा, आई-चिंग और कब्बाला जैसी आध्यात्मिक साधनाएँ अपनाईं। परिवार राजनीति में डूबा रहा—उनके बेटे और मादुरो का बेटा निकोलासितो सभी सत्ता में सक्रिय रहे। यह निजी-सार्वजनिक घुलन ही उनके पतन की कहानी का हिस्सा बन गया।
भारत की रणनीतिक दुविधा
इस पूरी घटना का प्रभाव भारत तक भी स्पष्ट रूप से पहुँचता है।
भारत के लिए यह घटना केवल लैटिन अमेरिका की कहानी नहीं है। 2024 में भारत ने वेनेज़ुएला से 1.55 करोड़ बैरल (लगभग 42,500 बैरल प्रतिदिन) कच्चा तेल आयात किया, जिसकी कीमत लगभग 1.76 अरब डॉलर रही। ईरान से आयात 2019 में बंद हो गया और रूस से आयात 2025 के अंत तक घटा। ऐसे में वेनेज़ुएला भारत की ऊर्जा टोकरी में महत्वपूर्ण स्थान रखता था।
अब यह आपूर्ति बाधित हो सकती है, और इसके परिणाम बहुआयामी हैं।
- आपूर्ति संकट: भारत को सऊदी अरब या रूस से महंगे विकल्प लेने पड़ सकते हैं।
- कूटनीतिक दबाव: अमेरिका भारत से वेनेज़ुएला से दूरी बनाने को कह सकता है।
- रणनीतिक संतुलन: भारत को ब्रिक्स सहयोगियों (रूस-चीन) और अमेरिका के बीच संतुलन साधना होगा।
- संभावित अवसर: मादुरो के बाद स्थिर सरकार बनी तो निवेश के नए अवसर खुल सकते हैं।
असली बात
इन सभी परतों को समेटते हुए निष्कर्ष स्पष्ट होता है।
मादुरो और फ्लोरेस की आधी रात की गिरफ्तारी केवल सैन्य कार्रवाई नहीं है—यह प्रेम और सत्ता की गाथा का अंत है। वेनेज़ुएला के लिए यह एक युग का पतन है। अमेरिका के लिए यह शक्ति प्रदर्शन है। यूरोप के लिए यह संयम की परीक्षा है। और महिला नेताओं के लिए यह स्मरण है कि सत्ता में महिलाएँ भी लोकप्रिय और दोषी दोनों हो सकती हैं।
जब पुतिन “गंभीर परिणाम” की चेतावनी देते हैं, चीन इसे “संप्रभुता का उल्लंघन” कहता है और गुटेरेस आपात बैठक बुलाते हैं—भारत को भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन पर निर्णय लेना होगा।
यह क्षण भारत की रणनीतिक दुविधा को उजागर करता है: कच्चे तेल की ज़रूरतें बनाम भू-राजनीतिक स्वायत्तता, और एक ऐसी दुनिया में संतुलन जहाँ शीतयुद्ध जैसी टकराहट फिर लौट रही है।
*वरिष्ठ पत्रकार
