– डॉ. राजेन्द्र सिंह*
अरावली परिक्षा: हमारी चेतना और भविष्य का प्रश्न
अरावली केवल पर्वत-श्रेणी नहीं है। वह एक संपूर्ण परिस्थितिकी और पर्यावरणीय तंत्र है। मेवाड़ में इसे ‘अड़ावल संस्कृति’ कहा गया है—और यह नाम किसी भौगोलिक पहचान से अधिक एक सभ्यतागत सत्य को प्रकट करता है। ब्रज, मत्स्य, मेवात, ढूंढाड़, मगरा मेवाड़, मारवाड़, बागड़, शेखावाटी, हाड़ौती, डांग और चंबल—ये सभी मिलकर अरबों वर्षों में विकसित हुई एक संयुक्त संस्कृति का निर्माण करते हैं। यह कोई मिश्रित या असंगत परंपरा नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक, समृद्ध और पूर्ण भारतीय संस्कृति का जीवंत तंत्र है। इस तंत्र की बनावट मनुष्य की बनाई हुई नहीं, बल्कि प्रकृति की रची हुई है।
प्रकृति की प्रक्रिया में जब कहीं भी, किसी भी स्तर पर, कृत्रिम टूट-फूट होती है, तो वह केवल उसी स्थान को प्रभावित नहीं करती। वह उत्पादन, पुनरुत्पादन और प्राकृतिक निर्माण की पूरी श्रृंखला को बाधित कर देती है। अरावली को केवल ऊँचाई, ढलान या तकनीकी परिभाषाओं के आधार पर बाँटना उसके मौलिक प्राकृतिक अधिकारों का हनन है। यह किसी निर्जीव पत्थरों के ढेर का नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति और प्रकृति के अधिकारों का प्रश्न है।
भारत विश्व का शायद एकमात्र ऐसा देश है जहाँ सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ मिलकर प्रकृति का संरक्षण करती रही हैं। संरक्षण ही सनातनता का मूल है। संरक्षण ही आत्मा की अमरता का बोध कराता है। भारतीय परंपराओं में प्राचीन काल से ही सभी को जीवित मानने की दृष्टि रही है। ‘जियो और जीने दो’ कोई आधुनिक नारा नहीं, बल्कि व्यवहार का आधार रहा है।
हम पर्वत को जीवंत मानते आए हैं। आधुनिक विज्ञान भी आज इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है। समय और भौतिक सिद्धांतों से पहले भी इस भूमि की प्रकृति जीवात्मा की अमरता को स्वीकार करती रही है। किंतु आधुनिक भारतीय विकास ने भौतिक ढाँचे के विस्तार के लालच में अपने ही सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर जीवों, नदियों और पहाड़ों का विनाश शुरू कर दिया है।
भारतीय कालचक्र मानव जीवन को चार युगों और चार आश्रमों में देखता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। सतयुग में जीवन सहज, सरल और सौहार्दपूर्ण था। प्रकृति ही भगवान थी। हम उसके प्रेम, सम्मान, विश्वास, आस्था और श्रद्धा के साथ जीवन जीते थे। प्रकृति के हर अंग के अधिकार को अपने अधिकार के समान मानते थे। अन्य जीवों, पर्वतों, नदियों और समुद्रों के अधिकारों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करते थे। जीवन जटिलताओं से मुक्त था। न लालच था, न द्वेष, न ईर्ष्या, न हिंसा। सत्य ही जीवन था और सत्य ही कर्म।
त्रेता युग में राजा और विद्वान बनने की आकांक्षा जन्म लेती है। इसी आकांक्षा में सतयुग का एक पाद टूटता है। इसी काल में वेदों का सृजन होता है—जो जीवन की गति, विधि और तंत्र को समझने की सभ्यता का प्रारंभ है। इस युग का आदर्श राजा वह है जो सबको समान अवसर देता है, जंगलों में रहकर सतयुग के संस्कारों को बचाने के लिए प्रकृति-विरोधी संस्कृति से संघर्ष करता है। वह युद्ध में भी सत्य का सम्मान करता है, छल और झूठ का सहारा नहीं लेता। पर्वत और समुद्र उसके लिए माता-पिता समान हैं, और उन्हीं की ऊर्जा से वह प्रकृति-विरोधी शक्ति को पराजित करता है।
द्वापर युग में छल और झूठ बढ़ते हैं। लालच मनुष्य को अंधा करने लगता है, फिर भी प्रकृति का सहारा पूरी तरह समाप्त नहीं होता। बाढ़ और सूखे से बचने के लिए अरावली की ही एक श्रृंखला—गोवर्धन पर्वत—ब्रज क्षेत्र में स्थित है, जहाँ यमुना प्रवाहित होती है। इस युग का नायक पर्वत और नदी का सहारा लेकर जीवन की रक्षा करता है। उपयोग होता है, पर अधिकारों का सम्मान बना रहता है। समग्रता टूटती नहीं।
कलियुग के आरंभ में तात्कालिक लाभ और भौतिक विस्तार प्रकृति की चिंता से मुक्त होकर आगे बढ़ने लगते हैं। प्राकृतिक शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण सामान्य हो जाते हैं। प्रकृति के अधिकारों का हनन आरंभ होता है। समाज, सत्ता और नैतिक नेतृत्व—तीनों इस प्रवृत्ति में बहते दिखाई देते हैं। पंचमहाभूत, जिन्हें भगवान माना गया था, भोग की वस्तु में बदल दिए जाते हैं।
इसी कलियुगी दृष्टि की पृष्ठभूमि में अरावली से जुड़ा हालिया घटनाक्रम सामने आता है। एक सरकारी हलफनामे के आधार पर अरावली की परिभाषा को संकुचित करने वाला न्यायिक आदेश यदि प्रभावी होता, तो उसके परिणाम केवल कानूनी नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी और सभ्यता के स्तर पर गहरे होते। खनन से जुड़ी क्षणिक आय के बदले जल-संकट, भूमि क्षरण और तापमान असंतुलन जैसी स्थायी समस्याएँ जन्म लेतीं। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि अनुभव से सिद्ध सत्य है।
इसके बाद जन-विरोध हुआ। यह विरोध किसी राजनीतिक षड्यंत्र का नहीं, बल्कि समाज की सहज चेतना का प्रकटीकरण था। न्यायालय द्वारा स्वयं संज्ञान लेकर अपने ही आदेश पर रोक लगाना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह संस्थागत आत्म-सुधार की क्षमता को दर्शाता है। साथ ही यह प्रश्न भी उठाता है कि क्या प्रकृति से जुड़े निर्णयों में प्रारंभिक स्तर पर ही अधिक सावधानी, व्यापक परामर्श और समग्र दृष्टि की आवश्यकता नहीं है।
यह आलोचना किसी संस्था की गरिमा को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं है। यह उस दृष्टिकोण पर प्रश्न है जो प्रकृति को केवल काग़ज़ी परिभाषाओं में सीमित कर देता है। लोकतंत्र में संस्थाएँ आलोचना से कमजोर नहीं होतीं; वे उससे अधिक उत्तरदायी बनती हैं।
जब शहर प्रदूषण के घर बन जाते हैं, तो पहाड़ों को काटकर वहाँ घर और फार्महाउस बनाए जाते हैं। अरावली की परिभाषा बदली जाती है। जिनके पास पूँजी है, वही नीति को दिशा देने लगते हैं। इतिहास बताता है कि जब व्यापारी राजा बनता है, तब प्रजा भिखारी बनती है।
मानव जीवन में बाल्यकाल सतयुग जैसा होता है। युवा अवस्था त्रेता जैसी। प्रौढ़ावस्था में त्याग और वानप्रस्थ की ओर बढ़ना चाहिए, और संन्यास में प्रकृति में लीन हो जाना चाहिए। किंतु आज स्थिति उलट है। अंतिम यात्रा तक सत्ता-भोग की कामनाएँ बनी रहती हैं। स्वयं भोग करने के साथ-साथ दूसरों को भी उसी भोग में धकेला जाता है। यही कलियुग का दर्शन है।
ऐसे समय में अरावली को उसका अधिकार केवल जन-चेतना से ही मिल सकता है। अरावली संस्कृति में भूख सहकर, घास की रोटी खाकर, सत्याग्रह के माध्यम से संघर्ष करने की परंपरा रही है। वही परंपरा आज भी प्रासंगिक है। अरावली खनन नहीं, अपना मिट्टी-पानी और संरक्षण का अधिकार माँग रही है।
यदि कलियुग में अरावली को उसका जीवनाधिकार मिलता है, तो यह संकेत होगा कि सतयुग, त्रेता और द्वापर के कुछ बीज अभी शेष हैं। अरावली को काटना उसे मारने जैसा कर्म है। उस पाप से मुक्ति ही हमारा धर्म और हमारी संस्कृति है।
अरावली आज भी खड़ी है—मौन, सहनशील और प्रतीक्षारत। अब परीक्षा उसकी नहीं, हमारी चेतना की है।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता। प्रस्तुत लेख उनके निजी विचार हैं।
