हम लंबी गुलामी के कारण अपने मूल रास्ते से भटक गए। मूल रास्ते के भटकाव ने प्रकृति का विनाशकारी प्राकृतिक शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण करने वाला यंत्र हमारे हाथ में दे दिया है। आज हमें जरूरत है प्रकृति के विनाशकारी यंत्र से बचने के लिए भारतीय आस्था और पर्यावरण रक्षा का नया डिजाइन तैयार करने की। इसकी शुरूआत प्रकृति के प्यार, विश्वास और आस्था से करनी होगी। यही हमारी श्रद्धा, ईष्ट, और भक्ति भाव है। इन्हें ध्यान में रखकर बना डिजाइन हमें प्रकृति संरक्षण हमारे व्यवहार में लाते है।
हमारा जो भी भू सांस्कृतिक विविधता का डिजाइन बनेगा, उस डिजाइन की शुरुआत पर्यावरणीय आस्था से शुरू होगी और पर्यावरण आस्था ही हमें आगे लेकर जाएगी। इसलिए आज भी भारतीय आस्था प्रकृति-पर्यावरण के साथ जुड़ी हुई है। हमारी सारी पूजा जल से होती है, हमारी अर्चना सूर्य भगवान से होती है। हमारी चिता का संचार अग्नि और हवाओं से होता है। जिसको हमें धारण करना चाहिए वह हमारी धरती माता है। हमारे शरीर को आकार देने का काम आकाश में हुआ है। इसलिए यह पंचमहाभूत हमारे स्वरूप है। हम इन्हीं में विश्वास रखते हैं और इन्हीं के प्रति हमारी आस्था, श्रद्धा, भक्ति, ईष्ट है। यही योग आत्मा और परमात्मा है।
पंचमहाभूत के विविध रूप है। इन विविध रूपों को समझने के लिए भारतीय सांस्कृतिक विविधता का एक नया डिजाइन भारत के 92 वृहद स्वरूप के क्षेत्रों की विविध जानकारी से बनाना होगा। इस नए डिजाइन का आधार आधुनिक अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी और विज्ञान का योग जो प्रकृति के अनुकूलन और आज के संकटों का उन्मूलन कर सके। मैं जब अपने जीवन में निर्णय की प्रक्रिया को जांचने की कोशिश करता हूँ तो मुझे सबसे पहले यही समझ में आता है कि, मेरे काम के निर्णय मैं स्वयं नहीं कर रहा था। मेरे काम के निर्णय समुदाय, गांव और पंच परमेश्वर करते थे। मैं उनका पालन करता और साधन जुटाता था। ज्यादातर साधन समाज ही जुटता था। इन साधनों से ही आज 15800 जल संरचनाओं का निर्माण कर सका और 23 नदियों को शुद्ध सदानीरा बनाकर, पुनर्जीवित कर सका।
इससे लाखों बेरोजगारों के उजड़नें से गांव की जमीन पर पानी करके खेती में रोजगार दे सका। 6332 चंबल के डाकुओं की बंदूकों को छुड़वाकर अहिंसामय खेती करने के लिए तैयार कर सका। इसलिए हिंसक अर्थतंत्र को अहिंसक अर्थतंत्र में बदलने का डिजाइन तरुण भारत संघ ने बनाया। ऐसी डिजाइन के पोषणकारी संयंत्रों की खोज में हमें लगना होगा क्योंकि आज शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण करने वाले संयंत्र हमारे चारों तरफ है; जिससे जलवायु परिवर्तन का संकट, बाढ़ और सुखाड़ बढ़े है। इसीलिए लोग भी अपनी जमीन से विस्थापित होने लगे है। इस संकट से बचने के लिए प्रसन्नता की बात है कि, भारत सरकार ने अपनी आधुनिक शिक्षा नीति 2020 में इस आदिज्ञान के लिए एक विशेष व्यवस्था की है। सभी विश्वविद्यालयों में आदिज्ञान शोध संस्थान बन रहे हैं।
आदिज्ञान को अपने व्यवहार में उतारने वाले यंत्र, संयंत्र और डिजाइनों की तैयारी हो रही है। इसलिए हम इतना ही कहना चाहते हैं कि दुनिया को यदि फिर से अपने आनंद से जीना सीखना है तो प्रकृति का सम्मान करने वाले विज्ञान की ओर आना होगा। हमारा अध्यात्म और विज्ञान का योग ही हमें दुनिया को फिर से आनंद से जीने का तरीका सिखा सकता है। इस तरीके को सीखने के लिए हमें अब नए तरह का अभ्यास, नए तरह के काम करने होंगे। जिसके लिए अभी भी वक्त है। हम लोग खड़े होकर आदिज्ञान को फिर से व्यवहार में उतरने की पेशकश में जुट जाएं। क्यों ना हम एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाएं जिसमें दीवारें ना हो और जो देश की राष्ट्रीय सीमाओं से ना बंधे। एक ऐसा विश्वविद्यालय जहां लोग प्रकृति और पानी के संरक्षण का काम कर रहे हैं, उनको उनकी जरूरत अनुरूप मदद, शिक्षण और प्रशिक्षण दिया जाए। उसी तरह की सीख दी जाए, जिससे उनके काम पूरे हो सके। यह विश्वविद्यालय प्रकृति के रक्षण-संरक्षण का शिक्षण, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उन्मूलन की सीख और प्रकृति के प्रति आस्था, निष्ठा, भक्ति भाव पैदा करने वाला हो। तरुण भारत संघ भी पिछले 50 वर्षों से दिवारों से नहीं बल्कि जल, जमीन, हवा, सूरज और खुले आकाश में इनकी जरूरत का अहसास व इसके हेतु प्रत्यक्ष कार्य करने का आभास करवाता है। अब दुनिया को ऐसे ही विश्वविद्यालय की जरूरत है जो जल और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उन्मूलन का जमीनी काम करता आ रहा है। इस अनुभव के विस्तार हेतु इस तरह के चलते-फिरते अनुभव की अनुभूति से प्रत्यक्ष सीख देने वाले विश्वविद्यालय की पूरी दुनिया में बहुत जरूरत है।
*जल पुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक।

