कवि नागार्जुन
– विवेकानंद सिंह*
जब मढ़ौरा की धरती पर छलक पड़े कवि नागार्जुन के आँसू
बलिया: साहित्य और संघर्ष का अद्भुत संगम था वह मढ़ौरा सम्मेलन, जो 1976 में मढ़ौरा हाईस्कूल के प्रांगण में हुआ था। इस सम्मेलन का आयोजन बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था, जिसमें राज्य भर के मशहूर साहित्यकारों ने हिस्सा लिया। मढ़ौरा की यह घटना न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, बल्कि उस दौर के राजनीतिक और सामाजिक माहौल को भी उजागर करती है। एक ऐसे समय में जब आपातकाल का साया था और स्वतंत्रता की आवाज़ को दबाने की कोशिशें की जा रही थीं, मढ़ौरा में साहित्यकारों का यह सम्मेलन एक प्रगति और प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरा।
इस सम्मेलन में खगेंद्र ठाकुर, जो उस समय बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव थे, और पटनावासी कन्हैयाजी के नेतृत्व में साहित्यकारों ने अपनी आवाज़ को बुलंद किया। मढ़ौरा में 24-25 दिसंबर, 1976 को आयोजित यह राज्य सम्मेलन साहित्य जगत के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। सम्मेलन के दौरान सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’ की कविता ‘जनते तऽ जानऽत नइखे कि जनता के राज बा, खड़ा होके चौराहा पर सिपाही के जगाईलें’ पर तालियाँ बजीं, और सीवान के कवि मुँहदुबर ने अपनी कविता ‘हुरपेटीं मत मुँहदुबर के, हबड़ाईं मत, घबड़ाईं मत, हई चार सौ बीस के डाली लीं’ से पूरी महफिल लूट ली।
इस आयोजन को सफल बनाने के लिए स्थानीय लोगों का सहयोग भी बहुत महत्वपूर्ण था, जिनमें मढ़ौरा के मनोकामना प्रसाद सिंह (अब स्वर्गीय) का विशेष योगदान था। ब्रजेन्द्र कुमार सिंह ने, जो खुद इस आयोजन के एक महत्वपूर्ण सूत्रधार रहे हैं, ने इस सम्मेलन के ऐतिहासिक महत्व को उजागर करने के लिए मुझे प्रेरित किया। उन्होंने मुझसे साझा किया कि यह सम्मेलन उस समय के साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ था।उनका योगदान इस घटना को समझने और शोध करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी था, क्योंकि उन्होंने इसे सिर्फ साहित्यिक संदर्भ में नहीं, बल्कि उस समय के राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक बदलाव की दृष्टि से भी देखने के लिए प्रेरित किया।
1976 का यह सम्मेलन सिर्फ साहित्यकारों की एक सभा नहीं थी, बल्कि यह एक समय था जब आपातकाल का दबाव था और प्रगति, विचार और स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े होना एक साहसिक कार्य बन चुका था। उनका कहना था कि मढ़ौरा का यह आयोजन प्रगतिशील विचारों की आवाज़ को ज़िन्दा रखने का एक माध्यम था, और इसने बिहार के साहित्यकारों को एकजुट किया।
ब्रजेन्द्र सिंह ने सम्मेलन के उस समय की कठिन परिस्थितियों का भी जिक्र किया, जिसमें साहित्यकारों को राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि सम्मेलन के आयोजन से जुड़े व्यक्तिगत अनुभवों और संघर्षों को साझा करते हुए यह संदेश दिया कि उस समय के साहित्यकारों ने कैसे अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की दिशा में अपना योगदान दिया। उनके अनुसार, मढ़ौरा सम्मेलन न केवल एक साहित्यिक घटना थी, बल्कि यह एक प्रकार से प्रतिरोध और सामूहिक जागरूकता
स्वर्गीय खगेंद्र ठाकुर की पत्नी, इंदिरा ठाकुर से बातचीत के दौरान उन्होंने खगेंद्र जी की पुस्तक ‘प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष’ का जिक्र किया, जिसमें इस सम्मेलन का विस्तार से उल्लेख किया गया है। इंदिराजी ने बताया कि इस सम्मेलन में राज्यभर से बड़ी संख्या में लेखक और साहित्यकार पहुंचे थे, और स्थानीय लोग भी हजारों की संख्या में उपस्थित थे। बंगाल के लेखक दीपेंद्रनाथ बंध्योपाध्याय ने उद्घाटन किया था।
इस सम्मेलन में कवि नागार्जुन ने आपातकाल पर अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा कि उनका मनोद्रव्य कमजोर पड़ गया था क्योंकि जनता से उनका लगाव भी कमजोर हो गया था। बाबा के आँसू इस बात को और गहरा कर गए थे।खगेंद्र ठाकुर ने अपने संस्मरणों में लिखा, “उस सम्मेलन में बाबा (कवि नागार्जुन), जो हमारे साथ गये थे, ने आपातकाल को चुनौती देते हुए कहा था कि मेरा मनोद्रव्य कमज़ोर पड़ गया था, असल में जनता से ही लगाव कमज़ोर पड़ गया था, मनोद्रव्य तो जनता से ही मिलता है। यही कारण है कि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभुत्व वाले जनविरोधी आंदोलन को जन-आंदोलन समझ कर शामिल हो गया था। जेल में मुझे यह अनुभव हुआ, ऐसा कहते हुए बाबा रो पड़े।”
खगेंद्रजी ने आगे लिखा है कि यह (मढ़ौरा) साथी राजनंदन सिंह (उपाख्य राजन, जो ग्राम अवारी के निवासी थे) का गृह अंचल था. राजनंदन सिंह गम्भीर बीमारी के शिकार होकर अनेक वर्ष पहले दिवंगत हो चुके हैं. मढ़ौरा सम्मेलन उन्हीं के आमंत्रण पर हुआ था, वही स्वागत समिति के सचिव थे।
खगेंद्र ठाकुर ने अपने संस्मरणों में यह भी लिखा है कि सम्मेलन के आयोजन में कई कठिनाइयाँ आईं। सम्मेलन का आयोजन राजनंदन सिंह (उपाख्य राजन) के आमंत्रण पर हुआ था, जिनके प्रयासों से यह संभव हो पाया। खगेंद्र जी ने सम्मेलन की तैयारियों की कई बार समीक्षा की थी। इस दौरान एक सरकारी अधिकारी, जो मोतिहारी में कार्यरत थे, सम्मेलन के पहले दिन आए थे, लेकिन इंटेलिजेंस के डर से उन्होंने सम्मेलन छोड़ दिया।
सम्मेलन के बाद खगेंद्र ठाकुर ने दिल्ली से आए साहित्यकारों का जिक्र किया, जिनमें से एक प्रमुख नाम भीष्म साहनी का था। हालाँकि, वे किसी अन्य कार्यक्रम में व्यस्त होने के कारण मढ़ौरा नहीं आ सके, लेकिन सम्मेलन के बाद उन्होंने खगेंद्र जी को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा था, “दिल्ली वालों ने आपको ठगा।”
इंदिराजी ने बताया कि बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य प्रेमकुमार मणि, जो उस समय लगभग 23 वर्ष के थे, भी इस सम्मेलन में शामिल हुए थे।
इसके बाद, मैंने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर रवि रंजन से संपर्क किया, जिन्होंने प्रेमकुमार मणि का नंबर उपलब्ध कराया। मणिजी ने सम्मेलन के बारे में अपनी यादें साझा करते हुए लिखा कि 1976 में मढ़ौरा में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य सम्मेलन में वे भी शामिल थे। उस समय का माहौल बहुत ही अद्भुत था। नागार्जुन और नामवर सिंह जैसे साहित्यकार पुआल पर सोते थे, जबकि सर्दी में भोजन पत्तल पर परोसा जाता था। मणिजी ने कहा कि उस सम्मेलन के विमर्श में समाज और राजनीति के गहरे सवाल उठाए गए थे, और आज भी उन दिनों की यादें उन्हें रोमांचित कर देती हैं।
*1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सेना के लिए धन संग्रहण हेतु प्रथम मंचारोहण, विद्यालीय मंचों के साथ ही अन्य मंचों पर सक्रिय, तत्पश्चात् रंगमंच एवम् ललित कलाओं के लिए समर्पित संस्था, संस्कार भारती से जुड़ाव और रंगमंच, लोकगीत तथा लोक परंपराओं के संरक्षण हेतु प्रयत्नरत। 1857 के प्रथम चिंगारी, अमरशहीद मंगल पाण्डे की जीवनी, 1942 में हुए भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान हुई बलिया जनक्रान्ति और भोजपुरी क्षेत्र में 1764 से लेकर 1947 तक की तमाम घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भों पर शोध, लेख एवम् पुस्तक लेखन।
