– चन्द्रशेखर जोशी*
2026 में फिर सजेगी नंदा राजजात, बसंत पंचमी को तिथि ऐलान की संभावना
चार सींग वाला मेढ़ा करता है नंदा देवी राजजात की अगुवाई
देहरादून: वर्ष 2026 में एक बार फिर हिमालय की गोद में आस्था, परंपरा और प्रकृति का अद्भुत संगम साकार होने जा रहा है। 12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद नंदा देवी राजजात यात्रा का आयोजन प्रस्तावित है। इसकी औपचारिक तिथि की घोषणा बसंत पंचमी के अवसर पर, 23 जनवरी 2026 को किए जाने की संभावना है, जबकि परंपरागत रूप से यह यात्रा अगस्त–सितंबर के महीनों में सम्पन्न होती रही है।
एशिया की सबसे प्राचीन और दुर्गम सांस्कृतिक यात्राओं में शुमार नंदा देवी राजजात की परंपरा आठवीं शताब्दी से चली आ रही है। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की सामूहिक स्मृति, लोक विश्वास और प्रकृति के साथ सहजीवन की जीवंत मिसाल है। उत्तराखंड ही नहीं, देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस कठिन यात्रा में सहभागी बनते हैं।

इस 280 किलोमीटर लंबी दुर्गम हिमालयी पदयात्रा की सबसे विशिष्ट और रहस्यमयी पहचान है चार सींग वाला मेढ़ा, जिसे स्थानीय बोली में ‘चौसिंग्या खाड़ू’ कहा जाता है। यह मेढ़ा यात्रा का केवल एक अंग नहीं, बल्कि उसका मार्गदर्शक और आत्मा माना जाता है। लोक मान्यता है कि यह माँ नंदा देवी का दूत और संदेशवाहक होता है, जो पूरी राजजात में सबसे आगे चलकर देवी की डोली का अगुआ बनता है।
यात्रा के दौरान रात्रि विश्राम के समय यह मेढ़ा नंदा देवी की पालकी के समीप ही सोता है और प्रतीकात्मक रूप से यात्रा की रक्षा करता है। चौसिंग्या खाड़ू का जन्म स्वयं में एक शुभ संकेत माना जाता है। यह दुर्लभ मेढ़ा चमोली जिले के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में ही पाया जाता है। लोक विश्वास के अनुसार, यदि ऐसा मेढ़ा उपलब्ध न हो, तो राजजात यात्रा को टालना भी पड़ सकता है, क्योंकि इसका जन्म इस बात का संकेत माना जाता है कि माँ नंदा देवी यात्रा के लिए तैयार हैं।
नंदा देवी राजजात की शुरुआत चमोली जिले के नौटी गांव से होती है। यह यात्रा ऊँची घाटियों, दुर्गम दर्रों और पर्वत श्रृंखलाओं को पार करती हुई त्रिशूल पर्वत के समीप स्थित होमकुंड तक जाती है, जहाँ अंतिम पूजा-अर्चना के बाद यात्रा पुनः नौटी लौटती है। इस दौरान 240 से अधिक डोलियां और प्रतिमाएँ यात्रा में सम्मिलित होती हैं, जो इसे एक विशाल सांस्कृतिक आयोजन का स्वरूप देती हैं।
मान्यता है कि माँ नंदा देवी का विवाह भगवान शंकर से हुआ था और यह राजजात उन्हें उनके ससुराल—शिवधाम—भेजने की प्रतीकात्मक परंपरा है। कहा जाता है कि नौवीं शताब्दी में राजा कनकपाल को स्वप्न में देवी ने कैलाश जाने की इच्छा प्रकट की थी, जिसके बाद पहली बार नंदा देवी राजजात का अनुष्ठान आरंभ हुआ।
करीब 20 दिनों तक चलने वाली इस कठिन यात्रा का सबसे भावुक क्षण तब आता है, जब अंतिम पड़ाव होमकुंड पर चौसिंग्या खाड़ू को माता के आभूषणों, वस्त्रों और प्रसाद से सुसज्जित कर विदा किया जाता है। लोक विश्वास है कि इसके बाद यह मेढ़ा स्वयं ही त्रिशूल पर्वत की ओर बढ़ जाता है, जो भगवान शिव के निवास कैलाश का प्रतीक माना जाता है। नंदा देवी राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि देवी और मनुष्य के बीच पवित्र रिश्ते का प्रतीक है, जिसमें चौसिंग्या खाड़ू उस सेतु की भूमिका निभाता है, जो माँ नंदा के कैलाश गमन का मार्ग प्रशस्त करता है।
*मुख्य संपादक, हिमालयायूके न्यूज; संस्थापक, बगला मुखी पीठ, देहरादून।
