प्राचीन काल से भारत में लेखन कला और लेखन शैली के विकास पर ताशकन्द में भारतीय राजदूतावास व लाल बहादुर शास्त्री सांस्कृतिक केन्द्र ने उज़बेकिस्तान कला अकादमी में एक चित्र प्रदर्शनी लगायी जिसके लिए ऐतिहासिक दस्तावेज खुदाबख्श लाइब्रेरी, पटना, सालारजंग म्यूजियम, हैदराबाद, लाल किला, दिल्ली और इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला अकादमी, नयी दिल्ली के सौजन्य से प्राप्त हुए।
मनीष प्रभात, अकमल नरिददीनोव और प्रोफेसर चन्दर शेखर
सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक प्रो॰ चन्द्र शेखर जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय से हैं और फारसी के विशेषज्ञ हैं, इस प्रदर्शनी के सूत्रधार हैं और उन्होंने मुझे और अकादमी के अध्यक्ष, जानेमाने चित्रकार अकमल नूरिद्दीनोव को कई रोचक बातें इन प्रदर्शित चित्रों के बारे में बतायीं। चूँकि हिन्दुस्तान में कई लेखनीकार मध्य एशिया से गये, उज़बेकिस्तान के लिए यह प्रदर्शनी बहुत प्रासंगिक है।
कूफ़ी शैली: कुरान शरीफ़ से एक पृष्ठ – इस्लाम के उद्भाव तक अरबी भाषा की लिपि में नुक्तों का इस्तेमाल नहीं होता था। इस शैली को कूफ़ी कहते थे क्योंकि यह कूफ़ा शहर से आयी थी।
कूफ़ी की जगह नस्ख शैली को अपनाया गया। नस्ख यानि की आखिरी। इसको हम अंग्रेजी के ड्राफ्ट और फिर फाइनल की तरह समझ सकते हैं।
नस्ख
ताल्लीक: लेखनीकार – अख्तियार-उल मुल्की — दुनिया में हर जगह भाषा की लिपि के प्रारम्भिक स्वरूप में खड़ी रेखाओं की तरह के चिन्हों का उपयोग पाया जाता है। आरम्भिक हथियार जैसे कि लाठी, भाले इत्यादि से ये चिन्ह प्रेरित होते थे। अरबी में लेखन की इस शैली को ताल्लीक कहते थे।
उर्दू नस्तलीक: लेखनीकार- सय्यद अब्बास समसम शिराज़ी, हैदराबाद — कालांतर में नस्क और ताल्लीक की मिली-जुली शैली को नस्तलीक कहा गया जो लेखन के लिए सबसे लोकप्रिय हुई। राजदरबार में, शासन में, तेज लिखने की जरूरत पड़ती थी और इसके लिए नस्तलीक उपयुक्त थी। आधुनिक काल में किताबों की छपाई के लिए नस्तलीक टाइपसेट भी बने।
उर्दू नस्तलीक: एक अर्ज़ी, दिल्ली, 19वीं सदी
बिहारी या बाहरी शैली बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पनपी। हाशिए से बाहर छोटे अक्षरों में लिखे शब्दों को आज हम अंग्रेजी में फुटनोट कहते हैं।
शम्सा: सुसज्जन के लिए प्रयुक्त एक शैली — आठवीं सदी तक कागज चीन से आता था। अतः कागज पर हाशिया बनाकर ज्यादा से ज्यादा जगह का उपयोग लिखने में होता था। पर समरकन्द में कागज के उत्पादन शुरू हो जाने के बाद कागज पर लिखाई के अलावा सुन्दर कलाकारी, बेल-बूटे आदि बनाए जाने लगे।
जीवित चीज़ों के चित्रण पर इस्लाम में प्रतिबंध के कारण सुन्दर लेखनी को किसी जानवर के आकार में लिखना, जैसे कि शेर, मछली इत्यादि को तुघ़रा बोलते हैं।
तुघरा
जुल्फिकार: तलवार के आकार में आह्वान लिखा गया है।
नस्तलीक
अल तमग़ा: अकबर II का फ़रमान, 19वीं सदी — ये बादशाही अलंकरण है जो कि हर फ़रमान के ऊपर बनाया जाता था यानि कि आज का ऑफिशियल लेटरहेड।