धरती केवल उपभोग की वस्तु नहीं है

सप्ताहांत विशेष

 -ज्ञानेन्द्र रावत*

 

प्रकृति की अनदेखी के चलते मानवता और धरती के बीच असंतुलन दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद धरती की बेहतरी के बाबत हमारा मौन दुखद है। विडम्बना यह कि कोई यह नहीं सोचता कि धरती केवल उपभोग की वस्तु नहीं है। वह मानव जीवन के साथ साथ लाखों लाख वनस्पतियों, जीव जंतुओं की आश्रय स्थली भी है। जीवाश्म ईंधन का धरती विशाल भंडार है। इसके बेतहाशा दोहन,इस्तेमाल और खपत ने पर्यावरण के खतरों को निश्चित तौर पर चिंता का विषय बना दिया है। असल में प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन से जहां जैव विविधता पर संकट मंडराने लगा है, वहीं नदियाँ प्रदूषण के कारण अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। कोयला जनित बिजली से प्रदूषण यानी पारे का ही उत्सर्जन नहीं होता, समृद्ध हरे-भरे वनों का भी विनाश होता है। फिर बांध जो पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं,समूचे नदी बेसिन को तबाह करने पर तुले हैं।

तापमान में बढ़ोतरी का दुष्परिणाम मानसून की दिशा और चरित्र बदलने, कृषि उत्पादन में गिरावट, समुद्री सतह पर बदलाव, समुद्र के पानी के तेज़ाबी होने,जलीय प्रजातियों के खात्मे के रूप में सामने आया है। इस सच की स्वीकारोक्ति कि इसके लिए हम ही दोषी हैं, इस दिशा में पहला कदम होगा। इसलिए हमें अपनी जीवन शैली पर पुनर्विचार करना होगा। उपभोग के स्तर को कम करके स्वस्थ जीवन के लिए प्रकृति के करीब जाकर सीखना होगा। सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि वह पर्यावरण को विकास का आधार बनायें। यदि हम पृथ्वी के प्रहरी बनकर पर्यावरण बचाने में जुट जायें, तभी धरती को लम्बी आयु और मानव सभ्यता की रक्षा करने में समर्थ हो सकते हैं अन्यथा नहीं। इसलिये अब भी चेतो, पर्यावरण रक्षा का संकल्प लो अन्यथा मानव जीवन खतरे में पड़ जायेगा।

 पर्यावरण का संबंध मानव जीवन से जुड़ा है। इसके बिना मानव जीवन की कल्पना ही बेमानी है। हमारे ऋषि मनीषियों ने पर्यावरण चेतना को धर्म के माध्यम से हमारे जीवन से जोड़ा। यही वह वजह रही जिसके चलते नदियों को मां की तरह पूजा गया, वन्य जीवों को देवताओं के वाहन के रूप में मान्यता दी गयी और वृक्षों यथा वट, पीपल, तुलसी आदि को पूज्यनीय माना गया। यह सब पर्यावरण चेतना का ही प्रमाण है। आज नदी, जल, जमीन, वायु आदि सभी प्रदूषित हैं। जंगल विकास यज्ञ की समिधा बन रहे हैं। यह सब जीवन शैली में बदलाव और भौतिक सुख संसाधनों की अंधी चाहत का ही दुष्परिणाम है। जहरीली होती हवा, नदी-जल का भयावह स्तर तक प्रदूषण, भूजल का दिनोंदिन गिरता स्तर, जंगलों का अंधाधुंध कटान ,मौसम में आ रहा अभूतपूर्व बदलाव, ओजोन परत में छेद और तापमान में बतहाशा बढ़ोतरी , प्रकृति प्रदत्त संसाधनों पर अत्याधिक दबाव, जीव जंतुओं की हजारों-हजार प्रजातियों की विलुप्ति यह सब उसी का दुष्परिणाम है।

अब जरूरत है कि मानव जीवन से जुड़े इस मुद्दे को गंभीरता से समझा जाये। क्योंकि अब नयी पीढ़ी को जगाने की जिम्मेदारी हमारी है। ऐसा नहीं करने पर आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

*वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं पर्यांवरणविद।

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