क्या नदी चेतना यात्रा कर पायेगी बिहार की नदियों का पुनरुद्धार ?

– ग्लोबलबिहारी ब्यूरो

पटना:  बिहार की नदियों के अध्ययन के लिए एक नयी पहल कल विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर की गयी है। इस अध्ययन के लिए पटना से पानी रे पानी अभियान के तहत एक नदी चेतना यात्रा की शुरुआत हुई जो २७ सितम्बर, नदी दिवस तक, बिहार की विभिन्न नदियों से गुजरेगी और इन नदियों में हो रहे परिवर्तनों को चिन्हित करते हुए यह जानने का प्रयास करेगी कि नदियों को जिन्दा करने के लिए क्या किया जाना आवश्यक है। नदी चेतना यात्रा के पहले चरण के दौरान मिथिलांचल की कमला नदी, शाहाबाद की काव नदी, सीमांचल की सौरा नदी और चम्पारण की धनौती नदी का अध्ययन किया जाएगा।

इस यात्रा के संयोजक और बिहार के जाने माने पत्रकार पंकज मालवीय के अनुसार नदियों के प्रति सामाजिक चेतना जगाना भी इस यात्रा का एक उद्देश्य है। इसी सन्दर्भ में इस अभियान से जुड़े सामाजिक संगठन और कार्यकर्ताओं ने गंगा दशहरा से लेकर पर्यावरण दिवस तक राज्य की नदियों कमला नदी (नेपाल), सौरा नदी (पुर्णिया), धनौती नदी (चम्पारण), अजय नदी (देवघर), प्रेमा नदी (पुर्णिया) और काव नदी (रोहतास) के तट पर वृक्षारोपण कार्यक्रम और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के लिये चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया।

संवाद कार्यक्रम में भोपाल के भूवैज्ञानिक के.जी. व्यास ने कहा कि यह पहला अवसर है जब नदियों की मूल समस्या को जानने का प्रयास हो रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले साल भागलपुर जिले की चम्पा नदी के लिये अभियान के क्रम मे बिहार की नदियों को देखने का अवसर मिला था और उन्होंने कैमूर की पहाड़ियों से निकलने वाली काव नदी की यात्रा भी की था। “यात्रा में गंगा की सहायक, इन नदियों के अविरल प्रवाह और बढ़ते प्रदूषण की बेहद दर्दनाक और चिंताजनक तस्वीर देखी थी। उस स्थिति को देखकर प्रश्न उठता है कि नदियों की यह दुर्दशा उस संस्कारित समाज की आंखों के सामने है, जो आदिकाल से नदियों को देवी मानकर कर पूजता रहा है। नदियों की यह दुर्दशा सरकार के लिए भी चुनौती है,” उन्होंने कहा। वरिष्ठ पर्यावरणविद पद्मश्री डॉ अनिल जोशी जी ने भी प्रकृति से बिहार के जुड़ाव की चर्चा की और कहा कि बिहार की धरती पर सूर्य देव की अराधना जैसे महान पर्व को मनाया जाना, इसका प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यहां के लोग बहुत ही जमीनी स्तर से जुड़े हुए हैं और अगर अपने प्रकृति को लेकर थोड़े गंभीर हो जाएं तो प्रकृति की रक्षा में अमुल्य योगदान दे सकते हैं। “इसके लिये बस हमें अपनी परंपराओं को फिर से अपनाना होगा,” उन्होंने कहा।

बिहार से गंगा नदी गुजरती है। गंगा आंदोलन में सक्रिय रहे सन्यासी और द्वारिका के शंकराचार्य के प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मुख्य अतिथि के तौर अपने सम्बोधन में कहा कि नदियों आदि प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बिहार हमेशा गम्भीर रहा है। उन्होनें गंगा नदी के हालत की चर्चा करते हुये कि यदि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने विरोध नहीं किया होता तो केंद्रीय योजना के तहत इलाहाबाद से हल्दिया तक जल मार्ग विकसित करने के क्रम में केंद्र सरकार ने तो गंगा जी को 16 छोटे तालाब में बदल दिया होता। गंगा जी के संकट की चर्चा करते उन्होंने कहा कि नदी की धारा को लेकर सरकार के किसी योजना में गम्भीरता नहीं दिखती है, लेकिन नदी के किनारे को चमकाया जा रहा है।

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